ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 434, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरे शरीरका यह जो तेज । जलाता है सारे कर्मका बीज । जिससे तुझमें मिलते निज । सद्भावनासे ॥ २७ ॥ तथा जो हैं सहज भय-भीत । होकर तेरे पथके अमित । गाते हैं तेरी प्रार्थनाके गीत । कर जोड करके ॥ २८ ॥ देव ! डूबे हैं अविद्या-सिंधुमें । फंसे हैं विषय-विष-जालमें । फंसे हैं स्वर्ग-संसार फंडोंमें । दोनों ओरसे ॥ २९ ॥ ऐसे हमको करनेमें मुक्त । कौन हैं त्रिभुवनमें समस्त । आये हैं हम सो शरणागत । कहते हैं ये ॥ ३० ॥ तथा महर्षि अथवा सिद्ध । विद्याधर संघ जो विविध । गाते हैं तेरा ही स्वस्तिवाद । तथा शुभ-स्तवन ॥ ३१ ॥ रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गंधर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥ रुद्र-आदित्योंके ये समुदाय । वसु साध्य आदि ये देव । अश्विनी विश्वे-देव स-वैभव । मरुत भी वहां ॥ ३२ ॥ सुनो अग्नि तथा गंधर्व । यक्ष राक्षस गण सर्व । महेंद्रादि जो मुख्य देव । तथा सिद्धादिक ॥ ३३ ॥ ये सब धर अपना स्वस्थान । विस्मित करते अवलोकन । महा-मूर्तिका है दिव्य-दर्शन । देखता हूँ मैं ॥ ३४ ॥ आदित्य विश्वे वसु रुद्र साध्य कुमार दोनों पितृ-देव वायु । गंधर्व दैत्यों सह यक्ष सिद्ध सारे तुझे विस्मित देखते हैं ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६४