भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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फिर देखते हैं क्षणक्षण । विस्मययुत अंतःकरण । नत-मस्तक हो समर्पण । करते निज मुकुट ॥ ३५ ॥ जय घोषके कलरव मधुर । गूंजते हैं स्वर्गमें जो सुंदर । रखे हैं ललाट पर सुंदर । कर संपुट नमनार्थ ॥ ३६ ॥ वह नम्रता-वृक्ष बन सकळ । खिला सात्विक वसंतसे सकाळ । तभी उस कर-संपुटमें फल । लगा यह तेरा ॥ ३७ ॥ रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥ नयनोंका हुवा यह भाग्योदय । या जीवोंका सुख सुकाळ उदय । तभी हुवा तेरे रूपका सदय । भव्य दर्शन ॥ ३८ ॥ रूप है जो यह लोक-व्यापक । चहूं ओरसे देखता सम्मुख । देवोंके लिये भी जो भयानक । देखके चौंकते हैं ॥ ३९ ॥ ऐसा एक किंतु है विचित्र । तथा भयानक हैं वक्त्र । बहु लोचन तथा सशस्त्र । भुजा असंख्य ॥ ३४० ॥ अनेक जो चारु-चरण । बहु उदर नाना-वर्ण । प्रति वदन मद-पूर्ण । आवेशसे ॥ ४१ ॥ अथवा महा-प्रलय समय । पाशमें बांधकर यमराय । प्रलयाग्नि जलाता भयमय । जहां तहां सर्वत्र ॥ ४२ ॥ या संहार त्रिपुरारिका यंत्र । या प्रलय-भैरवका जो क्षेत्र । अनेक युगांत शक्तिका पात्र । आगे किये विनाशाथर्य ॥ ४३ ॥ विशाल है रूप असंख्य नेत्र करालं दाढें मुख हाथ पैर । अनेक हैं ऊरु विशाल पेट ये देख हूँ व्याकुल लोक मैं भी ॥ २३ ॥ ३६५ विश्व-रूप-दर्शनयोग