ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे जहां तहां चहूं ओर। तेरे वदन हैं भयंकर। वहां सिंहसे दांत प्रखर। दीखते क्रोधाग्निसे ॥ ४४ ॥ देख जैसे काल रात्रिका अंधार। करते हैं पिशाच घोर संचार। वैसे वदनमें प्रलय रुधिर। भरे हैं दांत ॥ ४५ ॥ कालने किया है जैसे युद्ध-निमंत्रण। उन्मत्त हुआ सर्व संहारक मरण। वैसे दीखते हैं मुखमें भय लक्षण। तेरे आज ॥ ४६ ॥ बेचारे उस त्रिभुवन पर। सहज दृष्टि डाली इक बार। वह दुःख कालिंदी तट पर। हो गया है वृक्ष ॥ ४७ ॥ रूप है यह महा-मृत्युका सागर। उठते हैं उसमें दुर्वातां भंवर। त्रैलोक्य-जीवित डोंगी खाती चक्कर। उलटी आंधीमें ॥ ४८ ॥ क्रोधसे तू यदि यह कहता। लोगोंकी बात क्यों व्यर्थ करता। इसमें तेरा क्या आता जाता। भोग तू ध्यान सुख ॥ ४९ ॥ देव ! लोगोंकी बात क्या साधारण। किया है यह परदा स-कारण। कांप रहे हैं मेरे स-देहप्राण। देखकर रूप ॥ ३५० ॥ संहार-रुद्र भी घबड़ाता जिससे। मृत्यु भी छिप जाता जिसके डरसे। ऐसा महाबली मैं कांपता भयसे। ऐसा किया तूने ॥ ५१ ॥ महामारीका यह कराल रूप। भयको जो छिपाने लगता आप। इसको कहना यदि विश्व-रूप। आश्चर्य है यह ॥ ५२ ॥ नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥ आकाश भेदे बहुरंगवाले खुले मुखोंके विशाल नेत्र। ज्वलंत तू देव तुझ देख जीव अधीर होता सुख शांति खोता ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६६