भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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महाकालसे हठ छोड़कर । अनेक मुख जो क्रोधसे भर । आकाशको ओछा मान विस्तार । दिखाते हैं अपना ॥ ५३ ॥ नभ-विस्तार न करता आकलन । त्रिलोक पवन न करता वेष्टन । जिसमेंसे ज्वाला निकलती महान । धधकती हुई ॥ ५४ ॥ इनमें हैं विविध आकार । वैसे ही हैं वर्णके प्रकार । प्रलयाग्नि भी लेता आधार । इन मुखोंका ॥ ५५ ॥ इतना है इनके अंगका तेज । इनसे राख होता विश्व सहज । एक मुखमें मुख उनमें तेज । दांत औ' दाढ भी ॥ ५६ ॥ हुवा यहां मानो वायुको धनुर्वात । समुद्र हुवा महापूरमें पतित । विषाग्नि मारनेमें हुवा प्रवृत्त । बड़वानलको ॥ ५७ ॥ पीता है जैसे अग्नि हालाहल । मृत्यु मरनेमें सन्नद्ध है नवल । संहार तेज आज निगलता खोल । मुख बन कर ॥ ५८ ॥ किंतु कैसे हैं ये विशाल । जैसे टूटा हुवा अंतराल । मानो आकाशका ही बिल । पड़ा है यह ॥ ५९ ॥ या वसुंधराको बगलमें दबाकर । हिरण्याक्ष घुसा जब पाताल गव्हर । पाताल कुहर खोला हाटकेश्वर । वक्त्र दीखते ऐसे ॥ ३६० ॥ तेरे मुखोंका ऐसा विकास । उसमें जिह्वाओंका आवेश । विश्व बनता अधूरा ग्रास । इसीलिये नहीं खाता ॥ ६१ ॥ तथा पातालव्यालोंका फूत्कार । विष ज्वाला जा छूती हैं अंबर । वैसी फैली है जिव्हा भयंकर । बदन-दरीमें ॥ ६२ ॥ प्रलय-विद्युतके झुंड लेकर । सजाये हैं जैसे गगन शिखर । मुखमें दीखते हैं दांत प्रखर । तथा दाढ भी वैसे ॥ ६३ ॥ जैसे ललाट परके अंचलमें । भयको ही डराते हैं अंधारमें । महा-मृत्युके हैं आवेग वेगमें । अंगार-सी आंखें ॥ ६४ ॥ ऐसा ले यह महा-भयका भोज । यहां क्या करने आया है तू काज । समझ न पा करके यह मुझ । मरण भय आया है ॥ ६५ ॥ ३६७ विश्व रूप-दर्शनयोग