ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेव ! विश्व रूप देखनेकी आस । उसका प्रतिफल है यह खास । उसको देखा है मैंने स-हव्यास । हुईं अब आंखें शांत ॥ ६६ ॥ शरीर है यह नाशवंत पार्थिव । उसका नहीं है यहां विशेष भाव । अविनाशी चैतन्यका न रहा ठाव । जीने मरनेका ॥ ६७ ॥ भयमें है वैसे अंग कांपता । बढता है तब मन तापता । अथवा बुद्धिका बल हिलता । गलता अभिमान ॥ ६८ ॥ इन सबसे जो है निराला । केवल जो आनंदैककळ । वह अंतरात्मा भी निश्चळ । कांपता यहां ॥ ६९ ॥ लगा साक्षात्कारका वेध । नष्ट किया है सब बोध । ऐसा गुरु-शिष्य संबंध । मिलेगा कहां ॥ ३७० ॥ देवेश ! तेरा जो यह दर्शन । शिथिल करता अंतःकरण । उसको संभालनेमें जतन । करता हूं मैं ॥ ७१ ॥ धैर्य जो मेरा संपूर्ण खो गया । तूने यह विश्व-रूप दिखाया । तथा मुझको है उलझा दिया । उपदेशमें ॥ ७२ ॥ यहां आसरा पानेमें जीव । करता है चारों ओर धांव । उसको नहीं मिलता ठाव । इस रूपमें ॥ ७३ ॥ विश्व-रूप ऐसा महामार । निर्जीव करता है चराचर । तब रहे कैसे मौन होकर । देव देवेश ॥ ७४ ॥ दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्रैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥ कल्पांत अग्नीसम दीखतें है प्रचंड मुख औ' कराल दाढ । दिशा न सूझे मुख-शांति नाशे प्रसन्न हो तू जगके निवास ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६८