ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥
देखता मैं दिव्य चक्षुसे । जहां तहां सभी ओरसे । भुजदंडमें भरे जैसे । महा आकाश ॥ ६६ ॥ वैसे एक ही निरंतर । देखनेसे हैं तेरे कर । करते संपूर्ण व्यापार । एक कालमें ॥ ६७ ॥ तथा ब्रह्मका है विस्तार । खोलता ब्रह्मांड भांडार । वैसा दीखता उदर । तेरा असीम ॥ ६८ ॥ कहते हैं सहस्रशीर्ष पुरुष । देखता मैं अनंत-शीर्ष पुरुष । लगता पर-ब्रह्म हो आया मुख । इसं समय ॥ ६९ ॥ जहां तहां देखता तेरे वदन । विश्व-रूपमें जो है विराजमान । वहीं दीखते हैं अनंत नयन । पंक्ति बद्ध हो ॥ २७० ॥ रहने दो यह स्वर्ग पाताल । तथा धरणी दिशा अंतराल । इसी रूपमें भरा है सकल । मूर्तिमय हो ॥ ७१ ॥ कहीं नहीं है तेरे बिन । परमाणु-सा रिक्त स्थान । यह देख कहता मन । कितना व्यापक तू ॥ ७२ ॥ नाना प्राणि जात सहित । भरे हुए जो महाभूत । तूने व्यापलिये अनंत । देखता मैं ॥ ७३ ॥
विश्व-रूपके संबंधमें अर्जुनकी जिज्ञासा—
अनेक आंखें मुख हाथ पेट जहां तहां देखूं अनंत मूर्ति । दीखे नहीं अंत न मध्य मूल विश्वेश्वरा जो तव विश्वरूप ॥ १६ ॥
३५७ विश्व-रूप-दर्शनयोग
ऐसा तू कहांसे आया है। बैठा है खड़ा या सोया है। तेरी आकृति कितनी है। किस मांके उदरमें ? ॥ ७४ ॥ तेरा रूप कैसा वय कितना । तेरे आदि औ' अंतकी भावना । तू किस भांति है यह जानना । चाहता अब ॥ ७५ ॥ देख लिया मैने यह संपूर्ण । तू ही है अपना स्थान श्रीकृष्ण । न तू किसीका औ' न है कारण । अनादि सिद्ध तू ॥ ७६ ॥ न तू बैठा है न खड़ा है । न छोटा है या न बड़ा है। नीचे ऊपर सर्वत्र है । केवल तू ही ॥ ७७ ॥ रूपमें है तू अपनासा । वयमें भी तू है तुझ-सा । उदर पीठ भी परेशा । तेरा तू है ॥ ७८ ॥ क्या कहना है अब बात । तुझमें तू पूर्ण अनंत । बार बार सोचके ज्ञात । हुवा यह मुझको ॥ ७९ ॥ किंतु तेरे इस रूपमें एक । रह गया व्यंग कहता देख । आदि मध्य अंतका निकष । नहीं दीखता ॥ २८० ॥ देखा मैंने सर्वत्र कहीं । इन बातोंका पता नहीं । तुझमें तीनों कहीं नहीं । ये विशुद्ध रूप ॥ ८१ ॥ ऐसा आदि मध्यांत रहित । विश्वेश्वर तू अपरिमित । देखा है मैंने आज तत्वतः । विश्व-रूप ॥ ८२ ॥ तू है ऐसा महा विश्व-रूप । तेरे तनमें हैं अन्य रूप । तभी नाना वस्त्र अपरूप । पहने हैं तूने ॥ ८३ ॥ अथवा नाना रूप द्रुमांकुर । तेरे स्वरूप-महाचल पर । दिव्यालंकार फल पुष्प धर । उमड आये हैं ॥ ८४ ॥ अथः तू है स्वरूप सागर । अनेक रूप मात्र ये लहर । या तू एक महा-वृक्ष सुंदर । फला रूप-फलोंसे ॥ ८५ ॥ भूतोंसे भरा जैसे भूतल । या नक्षत्रोंसे नभ-मंडल । वैसे तू मूर्ति-मय सकल । बना स्वामी ॥ ८६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३५८
तेरा एकेक अंग-प्रांत । होता जाता है त्रि-जगत । विश्व-रूप ऐसा है मूर्त । रोम रोममें भरा ॥ ८७ ॥ लगाकर तू ऐसा विश्व-पसारा । कौन कहांसे ले आया है शरीर । सोच देखा तो सारथी तू हमारा । वही जो जनार्दन ॥ ८८ ॥ सोचना हूं तब तू मुकुंद । ऐसा ही व्यापक सर्वदा । भक्तानुकंपार्थ तू हो मुग्ध । बना है सारथी ॥ ८९ ॥ चतुर्भुज तू शाम मनमोहन । देखकर होते हैं तृप्त नयन । करनेमें तब प्रेमालिंगन । आना भुजाओंमें ॥ २९० ॥ ऐसी सुंदर मूर्ति तू स्रूप । भक्तसे हो आता है विश्व-रूप । किंतु हमारी दृष्टि है सलेप । देखते हम सामान्य ॥ ९१ ॥ गयी है अब दृष्टिकी मलीनता । सहज दी तूने दृष्टिमें दिव्यता । इसीलिये जाना मैंने यथार्थता । महिमा तेरी ॥ ९२ ॥ उस मरियलके उस पार । छिपा था रूप जो ना ओर छोर । वह सम्मुख आया भयंकर । पहचाना मैंने ॥ ९३ ॥ किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोरार्शि सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥ वही मुकुट जो पस्तक पर । दीखता है यहां धरणी धर । अज है उसका तेज अपार । है अति विस्मय ॥ ९४ ॥ प्रभो गदा चक्र किरीट धारी प्रकाश सर्वत्र भरा प्रचंड । देखा न जाता वह अप्रमेय जला रहे सूरज अग्नि ज्योति ॥ १७ ॥ ३५९ विश्व-रूप-दर्शनयोग
भक्त मनोरथार्थ विश्व-रूप बना ऋषिकेश— ऊपरका जो यह हाथ । चक्रचलानेमें है रत । वह चिन्ह स्पष्ट है तात । विश्व-मूर्तिका ॥ ९५ ॥ वहीं दूसरे हाथमें गदा । नीचेका हाथ है निरायुध । रास संभालते है गोविंद । सरसाते जो ॥ ९६ ॥ तथा उसी वेगसे तू सहसा । मेरे मनोरथार्थ ऋषीकेश । विश्व-रूप बना है विश्वेश । जानता हूं मैं ॥ ९७ ॥ किंतु है क्या यह अतिओज । मौका है न सोचनेका आज । हुवा है मेरा चित्त अबूझ । अतिशय तात ॥ ९८ ॥ यह विश्व-रूप है भी या नहीं । सोच ऐसा श्वास चलता नहीं । अंग-प्रभाकी जो यह नवाई । भरी है सर्वत्र ॥ ९९ ॥ इस तेजसे नयन झुलसता । सूर्य मलिन खद्योतसा भासता । ऐसी तीव्र है जिसकी अद्भुतता । यहां आज ॥ ३०० ॥ यह मानो महा-तेजका महार्णव । विश्वको डुबो देता है कर तांडव । युगांतका वज्रपात जैसे देख । ढक देता है ॥ १ ॥ अथवा संहार तेजकी जो ज्वाल । तोड़के मंडप बांधा अंतराल । दिव्य-चक्षुसे अब नभ-मंडल । देखा नहीं जाता ॥ २ ॥ अधिकाधिक प्रकाश उज्ज्वल । जलाता बनकर महाज्वाल । देखनेसे होती दृष्टि व्याकुल । दिव्यता होने पर भी ॥ ३ ॥ अथवा महा-प्रलयका प्रचंड । होता है जो कालाग्निरुद्रमें गूढ़ । उस तीसरे नयनके प्रगाढ़ । खुले हैं पलक ॥ ४ ॥ तथा फैला यह प्रकाश । पंचाग्नि-ज्वालाओंके पाश । करते ब्रह्मांडका शोष । अळकर ॥ ५ ॥ तेजाराशी है जो ऐसी अद्भुत । देखता मैं आज ही हो चकित । तेरी कांतिकी व्याप्ति है अनंत । विश्व-रूप ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६०
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥ अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम् स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥ तेरे तेजसे सारा विश्व संतप्त है प्रभो— हे देव तू है अक्षर । त्रिअर्थ मात्रासे पर । श्रुति है जिसका घर । ढूंढती है ॥ ७ ॥ आकारका तू आयतन । विश्व निक्षेपका निधान । वह अव्यय तू गहन । अविनाशी जो ॥ ८ ॥ धर्मका है तू जीवन । अनादि नित्य-नूतन । सैंतीसवा तू महान । पुरुष विशेष ॥ ९ ॥ तू है आदि मध्यांत रहित । सर्व सामर्थ्यसे तू है अनंत । विश्व-बाहु तू अपरिमित । विश्व-चरण तू ॥ ३१० ॥ असीम तू अक्षर जाननेका तू ही महा आश्रय विश्वका है । तू राखता शाश्वत-धर्म नित्य मैं जानता तू परमात्म तत्व ॥ १८ ॥ अनादि मध्यांत अनंत शक्ति अनेक भुजा मुख अग्नि-ज्योति । आंखें दिखे उज्ज्वल चन्द्र सूर्य स्वतेजसे तू जगको तपाता ॥ १९ ॥ (46) ३६१ विश्व-रूप-दर्शनयोग
मानो सूर्य चंद्रकी जो कला । तेरी कोप-प्रसाद लीला । कृपा दृष्टिसे कर संभाल । कोप कटाक्षसे क्रोध ॥ ११ ॥ इस भांति मैं अब देखता । प्रख्याग्नि तेज-सा अनंत । तेरे बदनकी जो दिव्यता । विस्मित होकर ॥ १२ ॥ आगसे धधकते पर्वत । निकलती ज्वालायें अद्भुत । जैसे चाटते हैं दाढं दांत । ज्वाला जिव्हा ॥ १३ ॥ इस बदनकी जो है ऊब । तथा सर्वांग-कांतिकी प्रभा । करती विश्वमें अति क्षोभ । अकुलाहट भरा ॥ १४ ॥ द्यावापृथिव्योरिदमंतरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥ जो देख अकुला रहा त्रिलोक — भूलोक और पाताल । पृथ्वी तथा अंतराल । दश दिशायें आकुल । है दिशा चक्र ॥ १५ ॥ तुझसे है जो यह संपूर्ण एक । भरा हुवा देखता मैं सकौतुक । गगन सह डूबा है, भयानक । विश्व-रूपमें ॥ १६ ॥ या रस लहरोंसे अद्भुत । चतुर्दश भुवन हैं व्याप्त । वैसे मैं हो अत्यंत विस्मित । देखूं क्या क्या ॥ १७ ॥ अनाकलित व्याप्ति जो असाधारण । सही न जाती रूपकी उग्रता-तीक्ष्ण । सुख गया दूर, यहां विश्वके प्राण । निकले भयसे ॥ १८ ॥ सभी दिशा विस्तृत अंतरिक्ष सर्वत्र तू एक हि छा रहा है । तेरा यही अद्भुत उग्र रूप जो देख अकुला रहा त्रिलोक ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी ३६२
तुझको देखकर हे विश्वेश्वर । न जाने आया कैसे भय उभर । डूब रहा है अब दुःख सागर । लहरियोंमें त्रिलोक ॥ १९ ॥ वैसे तुझ महात्माका दरशन । वहां क्या है भय दुःखका स्थान । जिससे न होता सुखका ज्ञान । इसका भान है मुझे ॥ ३२० ॥ जब तक तेरा रूप नहीं देखा । तब तक जगको संसार चोखा । देखने पर विजय विष चरखा । हुई अरुचि ॥ २१ ॥ आगे रूप नहीं होता आकलन । जिससे नहीं होता प्रेमालिंगन । पीछे दीखता है संसार मलिन । ऐसा उभय संकट ॥ २२ ॥ तभी पीछे हठे तो संसार । जो है रुकावट अनिवार । आगे तू अनिवार अपार । न होता आकलन ॥ २३ ॥ ऐसा है उभय संकटग्रस्त । त्रिभुवन होता है अतित्रस्त । मेरा मत हुव ऐसा निश्चित । यह रूप देखके ॥ २४ ॥ संतापसे जो ऐसा झुरसा हुआ । उपशमार्थ सिंधुपे आया हुआ । तरंग तांडव देख डरा हुआ । रहता है जैसे ॥ २५ ॥ ऐसा हुआ यह विश्व समस्त । तुझे देख तड़पनेमें रत । उससे भला पैर तीर प्राप्त । ज्ञान-संपन्न देव ॥ २६ ॥ अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥ अविद्या-सिंधु और स्वर्ग संसार फंदोंसे मुक्तिके लिये तेरी प्रार्थना— ये देव सारे तुझमें समाये कोई भयग्रस्त हो बद्ध-हस्त । मांगल्य गाके तब सिद्ध-संत स्तवते तुझीको अनेक भांति ॥ २१ ॥ ३६३ विश्व-रूप-दर्शनयोग
तेरे शरीरका यह जो तेज । जलाता है सारे कर्मका बीज । जिससे तुझमें मिलते निज । सद्भावनासे ॥ २७ ॥ तथा जो हैं सहज भय-भीत । होकर तेरे पथके अमित । गाते हैं तेरी प्रार्थनाके गीत । कर जोड करके ॥ २८ ॥ देव ! डूबे हैं अविद्या-सिंधुमें । फंसे हैं विषय-विष-जालमें । फंसे हैं स्वर्ग-संसार फंडोंमें । दोनों ओरसे ॥ २९ ॥ ऐसे हमको करनेमें मुक्त । कौन हैं त्रिभुवनमें समस्त । आये हैं हम सो शरणागत । कहते हैं ये ॥ ३० ॥ तथा महर्षि अथवा सिद्ध । विद्याधर संघ जो विविध । गाते हैं तेरा ही स्वस्तिवाद । तथा शुभ-स्तवन ॥ ३१ ॥ रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गंधर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥ रुद्र-आदित्योंके ये समुदाय । वसु साध्य आदि ये देव । अश्विनी विश्वे-देव स-वैभव । मरुत भी वहां ॥ ३२ ॥ सुनो अग्नि तथा गंधर्व । यक्ष राक्षस गण सर्व । महेंद्रादि जो मुख्य देव । तथा सिद्धादिक ॥ ३३ ॥ ये सब धर अपना स्वस्थान । विस्मित करते अवलोकन । महा-मूर्तिका है दिव्य-दर्शन । देखता हूँ मैं ॥ ३४ ॥ आदित्य विश्वे वसु रुद्र साध्य कुमार दोनों पितृ-देव वायु । गंधर्व दैत्यों सह यक्ष सिद्ध सारे तुझे विस्मित देखते हैं ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६४
फिर देखते हैं क्षणक्षण । विस्मययुत अंतःकरण । नत-मस्तक हो समर्पण । करते निज मुकुट ॥ ३५ ॥ जय घोषके कलरव मधुर । गूंजते हैं स्वर्गमें जो सुंदर । रखे हैं ललाट पर सुंदर । कर संपुट नमनार्थ ॥ ३६ ॥ वह नम्रता-वृक्ष बन सकळ । खिला सात्विक वसंतसे सकाळ । तभी उस कर-संपुटमें फल । लगा यह तेरा ॥ ३७ ॥ रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥ नयनोंका हुवा यह भाग्योदय । या जीवोंका सुख सुकाळ उदय । तभी हुवा तेरे रूपका सदय । भव्य दर्शन ॥ ३८ ॥ रूप है जो यह लोक-व्यापक । चहूं ओरसे देखता सम्मुख । देवोंके लिये भी जो भयानक । देखके चौंकते हैं ॥ ३९ ॥ ऐसा एक किंतु है विचित्र । तथा भयानक हैं वक्त्र । बहु लोचन तथा सशस्त्र । भुजा असंख्य ॥ ३४० ॥ अनेक जो चारु-चरण । बहु उदर नाना-वर्ण । प्रति वदन मद-पूर्ण । आवेशसे ॥ ४१ ॥ अथवा महा-प्रलय समय । पाशमें बांधकर यमराय । प्रलयाग्नि जलाता भयमय । जहां तहां सर्वत्र ॥ ४२ ॥ या संहार त्रिपुरारिका यंत्र । या प्रलय-भैरवका जो क्षेत्र । अनेक युगांत शक्तिका पात्र । आगे किये विनाशाथर्य ॥ ४३ ॥ विशाल है रूप असंख्य नेत्र करालं दाढें मुख हाथ पैर । अनेक हैं ऊरु विशाल पेट ये देख हूँ व्याकुल लोक मैं भी ॥ २३ ॥ ३६५ विश्व-रूप-दर्शनयोग
अध्याय ८: अक्षरब्रह्मयोग
वैसे जहां तहां चहूं ओर। तेरे वदन हैं भयंकर। वहां सिंहसे दांत प्रखर। दीखते क्रोधाग्निसे ॥ ४४ ॥ देख जैसे काल रात्रिका अंधार। करते हैं पिशाच घोर संचार। वैसे वदनमें प्रलय रुधिर। भरे हैं दांत ॥ ४५ ॥ कालने किया है जैसे युद्ध-निमंत्रण। उन्मत्त हुआ सर्व संहारक मरण। वैसे दीखते हैं मुखमें भय लक्षण। तेरे आज ॥ ४६ ॥ बेचारे उस त्रिभुवन पर। सहज दृष्टि डाली इक बार। वह दुःख कालिंदी तट पर। हो गया है वृक्ष ॥ ४७ ॥ रूप है यह महा-मृत्युका सागर। उठते हैं उसमें दुर्वातां भंवर। त्रैलोक्य-जीवित डोंगी खाती चक्कर। उलटी आंधीमें ॥ ४८ ॥ क्रोधसे तू यदि यह कहता। लोगोंकी बात क्यों व्यर्थ करता। इसमें तेरा क्या आता जाता। भोग तू ध्यान सुख ॥ ४९ ॥ देव ! लोगोंकी बात क्या साधारण। किया है यह परदा स-कारण। कांप रहे हैं मेरे स-देहप्राण। देखकर रूप ॥ ३५० ॥ संहार-रुद्र भी घबड़ाता जिससे। मृत्यु भी छिप जाता जिसके डरसे। ऐसा महाबली मैं कांपता भयसे। ऐसा किया तूने ॥ ५१ ॥ महामारीका यह कराल रूप। भयको जो छिपाने लगता आप। इसको कहना यदि विश्व-रूप। आश्चर्य है यह ॥ ५२ ॥ नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥ आकाश भेदे बहुरंगवाले खुले मुखोंके विशाल नेत्र। ज्वलंत तू देव तुझ देख जीव अधीर होता सुख शांति खोता ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६६
महाकालसे हठ छोड़कर । अनेक मुख जो क्रोधसे भर । आकाशको ओछा मान विस्तार । दिखाते हैं अपना ॥ ५३ ॥ नभ-विस्तार न करता आकलन । त्रिलोक पवन न करता वेष्टन । जिसमेंसे ज्वाला निकलती महान । धधकती हुई ॥ ५४ ॥ इनमें हैं विविध आकार । वैसे ही हैं वर्णके प्रकार । प्रलयाग्नि भी लेता आधार । इन मुखोंका ॥ ५५ ॥ इतना है इनके अंगका तेज । इनसे राख होता विश्व सहज । एक मुखमें मुख उनमें तेज । दांत औ' दाढ भी ॥ ५६ ॥ हुवा यहां मानो वायुको धनुर्वात । समुद्र हुवा महापूरमें पतित । विषाग्नि मारनेमें हुवा प्रवृत्त । बड़वानलको ॥ ५७ ॥ पीता है जैसे अग्नि हालाहल । मृत्यु मरनेमें सन्नद्ध है नवल । संहार तेज आज निगलता खोल । मुख बन कर ॥ ५८ ॥ किंतु कैसे हैं ये विशाल । जैसे टूटा हुवा अंतराल । मानो आकाशका ही बिल । पड़ा है यह ॥ ५९ ॥ या वसुंधराको बगलमें दबाकर । हिरण्याक्ष घुसा जब पाताल गव्हर । पाताल कुहर खोला हाटकेश्वर । वक्त्र दीखते ऐसे ॥ ३६० ॥ तेरे मुखोंका ऐसा विकास । उसमें जिह्वाओंका आवेश । विश्व बनता अधूरा ग्रास । इसीलिये नहीं खाता ॥ ६१ ॥ तथा पातालव्यालोंका फूत्कार । विष ज्वाला जा छूती हैं अंबर । वैसी फैली है जिव्हा भयंकर । बदन-दरीमें ॥ ६२ ॥ प्रलय-विद्युतके झुंड लेकर । सजाये हैं जैसे गगन शिखर । मुखमें दीखते हैं दांत प्रखर । तथा दाढ भी वैसे ॥ ६३ ॥ जैसे ललाट परके अंचलमें । भयको ही डराते हैं अंधारमें । महा-मृत्युके हैं आवेग वेगमें । अंगार-सी आंखें ॥ ६४ ॥ ऐसा ले यह महा-भयका भोज । यहां क्या करने आया है तू काज । समझ न पा करके यह मुझ । मरण भय आया है ॥ ६५ ॥ ३६७ विश्व रूप-दर्शनयोग
देव ! विश्व रूप देखनेकी आस । उसका प्रतिफल है यह खास । उसको देखा है मैंने स-हव्यास । हुईं अब आंखें शांत ॥ ६६ ॥ शरीर है यह नाशवंत पार्थिव । उसका नहीं है यहां विशेष भाव । अविनाशी चैतन्यका न रहा ठाव । जीने मरनेका ॥ ६७ ॥ भयमें है वैसे अंग कांपता । बढता है तब मन तापता । अथवा बुद्धिका बल हिलता । गलता अभिमान ॥ ६८ ॥ इन सबसे जो है निराला । केवल जो आनंदैककळ । वह अंतरात्मा भी निश्चळ । कांपता यहां ॥ ६९ ॥ लगा साक्षात्कारका वेध । नष्ट किया है सब बोध । ऐसा गुरु-शिष्य संबंध । मिलेगा कहां ॥ ३७० ॥ देवेश ! तेरा जो यह दर्शन । शिथिल करता अंतःकरण । उसको संभालनेमें जतन । करता हूं मैं ॥ ७१ ॥ धैर्य जो मेरा संपूर्ण खो गया । तूने यह विश्व-रूप दिखाया । तथा मुझको है उलझा दिया । उपदेशमें ॥ ७२ ॥ यहां आसरा पानेमें जीव । करता है चारों ओर धांव । उसको नहीं मिलता ठाव । इस रूपमें ॥ ७३ ॥ विश्व-रूप ऐसा महामार । निर्जीव करता है चराचर । तब रहे कैसे मौन होकर । देव देवेश ॥ ७४ ॥ दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्रैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥ कल्पांत अग्नीसम दीखतें है प्रचंड मुख औ' कराल दाढ । दिशा न सूझे मुख-शांति नाशे प्रसन्न हो तू जगके निवास ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३६८
सबका नाश करनेवाली दैवी शक्ति— फूटा महा-मृत्युका मशक । ऐसे जो तेरे मुख अनेक । नाचते हैं आंखोंके सम्मुख । फैले हुए ॥ ७५ ॥ दांत औ' डाढोंकी खुली कतार । ओंठ न छिपा सकते प्रखर । प्रलय-शस्त्रोंका पडा है घेर । लगा है जैसे ॥ ७६ ॥ तक्षमें भरा हालाहल जहर । काल-रात्रिमें हुवा भूत-संचार । या आया वज्राग्नि-अग्न्यस्त्र धर । वैसा यह रूप ॥ ७७ ॥ वैसे ही तेरा वदन बिकराल । उसमें मृत्यु-रसका रेलारेल । फिर आवेश उमडता विपुल । हम पर ही ॥ ७८ ॥ संहार-कालका चंडानिल । महाकल्पका प्रलयानल । हुवा दोनोंका संहार-मेल । फिर न जलेगा क्या ॥ ७९ ॥ वैसे तेरे ये संहारमुख । देखा हुवा मेरा धैर्य खाख । भूला मैं अब दिशा भी देख । तथा अपनेको भी ॥ ३८० ॥ विश्व-रूप देखा क्षण काल । तथा पडा सुखका अकाल । समेट ले तू रूप विशाल । जो है अस्त-व्यस्त ॥ ८१ ॥ ऐसा करेगा तू यह यदि जानता । विश्व-रूपकी मैं बात भी क्यों करता । रक्षा कर तू प्राणकी परम-पिता । इस स्वरूप प्रलयसे ॥ ८२ ॥ भगवानका हेतु अर्जुनका मोह —- यदि तू स्वामी है हमारा अनंत । रक्षण कर डाल बन जीवित । समेटले फैलाव अपरमित । महा-मृत्युका ॥ ८३ ॥ सुन तू सकल देवोंका परम देव । चैतन्य तू तुझमें बसता विश्व सर्व । भूला तू सबको जीवन देना सदैव । और लगा संहारमें ॥ ८४ ॥ प्रसन्न हो त्वरित देवराय । समेट ले अपना महाकाय । उद्धार कर मेरा भय-मय । मृत्यु वशासे ॥ ८५ ॥ करता हूं पुनः पुनः ऐसा विनय । हुआ है इतना भय-ग्रस्त हृदय । विश्व रूप देख कर खाया भय । मैने जनार्दन ॥ ८६ ॥ ३६९ विश्व-रूप-दर्शनयोग (47)
हुवा अमरावति पर आक्रमण । किया है मैने अकेलेने निवारण । ऐसा मैं महाकालको भी कठिन । डरानेमें ॥ ८७ ॥ किंतु हे यह प्रसंग दुर्धर । मृत्युको भी तूने निगलकर । भर लिया है मेरा भी जो कौर । विश्व सह सकल ॥ ८८ ॥ ऐसा नहीं था अब प्रलय काल । बनकर आया है तू महाकाल । बेचारा बना त्रिभुवन सकल । अल्पायुषी आज ॥ ८९ ॥ विधि-विधान है यह विपरीत । उठा हुवा बिघ्न करनेमें शांत । मह-विघ्न उठ आया अकल्पित । विश्व-प्रलयका ॥ ३९० ॥ बात नहीं यह काल्पनिक । खेलकर तू अनंत-मुख । सैन्यका कौर लेता है देख । चहूं ओरसे तू ॥ ९१ ॥ अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः । भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥ ये सब कुरु-कुलके वीर । अंध धृतराष्ट्रके कुमार । गये रे गये स-परिवार । तेरे कराल मुखमें ॥ ९२ ॥ तथा आये हैं यहां जो देश देशके । इनके सहायक हो दौड़ दौड़के । न रहेंगे ये तेरे कौर बनके । नाम कहनेको भी ॥ ९३ ॥ मद-मस्त हाथियोंके जो झुंड । निगलता तू पकड पकड़ । तथा योद्धाओंको भी धड़ाधड । निगलता जाता ॥ ९४ ॥ शातघ्निके संहारक । पदचारी जो कटक । भरता है तेरा मुख । पता न चलता ॥ ९५ ॥ अहा ! सभी ये धृतराष्ट्र पुत्र लेके सभी राज समूह साथ । ये भीष्म ये द्रोण ये सूत पुत्र औ' वीर सारे अपने अनेक ॥ २६ ॥ ज्ञानेश्वरी ३७०
कृतांतके जो जो हथियार क्रूर । निगलते एकेक स-चराचर । निगलता तू ऐसा शस्त्र भांडार । करोडोंका ॥ ९६ ॥ चतुरंग-सेना परिवार । स-अश्व-रथ पकड़कर । दांत न लगाते विश्वेश्वर । निगलता तू ॥ ९७ ॥ भीष्मसे ऐसा है कौन । सत्यशौर्यमें प्रवीण । तथा जो द्रोण ब्राह्मण । तूने चबाया ॥ ९८ ॥ ओ ! वह सहस्र-कर-कुमार । गयारे गया व्यर्थ जो कर्ण वीर । तथा हमारे अनेक महावीर । खा गया तू ॥ ९९ ॥ कैसा हे देव ! यह विधि विधान । मेरी मांगसे विश्व-रूप-दर्शन । करता वह विश्वका निकंदन । चाहता था मै शांति ॥ ४०० ॥ तूने कही पहले उपपत्ति । बताई थी यहां कुछ विभूति । छोडके वह मैं हो मंदमति । मांगा दर्शन ॥ १ ॥ होनी है जो त्रिकालमें भी नहीं चूकती । बुद्धि भी उसका अनुकरण करती । मेरे दैवमें अजी ! यही बात बधीथी । उसका उपाय क्या ? ॥ २ ॥ अमृत भी पहले हाथ आया । देवोंको उससे तोष न भया । फिर कालकूटको जन्म दिया । अंतमें जैसे ॥ ३ ॥ किंतु वह था जो किंचित । निराकरण योग्य बात । उसे किया है तब शांत । पीके शंभुने ॥ ४ ॥ जलता बवंडर अब कौन लपेटता । विष भरा आकाश कौन निगलता । महाकालके कालसे कौन खेलता । सामर्थ्यवान हो ॥ ५ ॥ अर्जुन ऐसे शोकमें गळता । हृदयमें अति संतप्त होता । मनोगत वह नहीं जानता । देवदेवेशका यहां ॥ ६ ॥ परमात्मका मनोगत— कौरव मरते और मैं मारता । अर्जुन ऐसे मोहग्रस्त हुवा था । श्रीकृष्णको उसे दूर करना था । यह रूप दिखाके ॥ ७ ॥ ३७१ विश्व-रूप-दर्शनयोग
अजी कोई किसीको न मारता । मैं ही सबका संहार करता । विश्व-रूप निमित्तसे बताता । यहां श्रीहरि ॥ ८ ॥ नहीं जाननेसे यह बात । पार्थ हुवा है व्याकुलचित्त । तथा कांपता रहा है व्यर्थ । देखके रूप ॥ ९ ॥ वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥ कहता है वह देखकर अर्जुन । कवच सह ये दोनों दल महान । खो जाते हैं जैसे गगनमें घन । वैसे जाते मुखमें ॥ ४१० ॥ या अया है अब कल्पांतका अंत । या हुवा है क्रुद्ध विश्वपे कृतांत । जो है स्वर्ग पाताळ सह जगत । निगलता आप ॥ ११ ॥ होता जब प्रतिकूल दैव । तब सभी संचित वैभव । जहांका तहां ही हो गलात्र । होता नष्ट ॥ १२ ॥ दोनों ओरकी एकत्रित सेना । जाती है मुखमें एक समान । किंतु वहांसे कभी लौटना । नहीं दीखता ॥ १३ ॥ अशोकके पात जैसे । चबाता है ऊट वैसे । सेना समूह व्यर्थ वैसे । मुखमें जाता ॥ १४ ॥ यहां मुकुट सह मस्तक । दांतोंमें चूर्ण होते अनेक । देखता मैं यह भयानक । दृश्य इस रूपमें ॥ १५ ॥ सबको तेरे ये दांत पीस रहे हैं — जाते त्वरासे मुखमें हि तेरे भयान जिसमें कराल दाढ । चिपके हुए हैं अनेक मुंड दीखे वहां चून बना हुवा जो ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३७२
दांतोंमें फंसे हैं कुछ रत्न । कुछ चूर्ण हो गये हो भग्न । जिव्हा-मूलमें फंसा चूरन । कुछ दांतोंमें ॥ १६ ॥ विश्व-रूप है यह महाकाल । चबाता लोगोंकी देह सबल । किंतु जीव देहका शिर-कमल । रखता आवश्य ॥ १७ ॥ वैसे शरीरमें है चोख । उत्तमांग जो शिर सम्मुख । महाकालके मुखमें देख । शेष रहे हैं ॥ १८ ॥ कहता है फिर अपनेसे अर्जुन । अन्य गति नहीं जो कुछ हुवा है जनन । करते हैं वे इस मुखमें गमन । अपने आप ॥ १९ ॥ यहा हुवा है जो सृष्ट । होता है इस मुखमें प्रविष्ट । निगलकर सब होता पुष्ट । विश्व-रूप काल ॥ ४२० ॥ समस्त हैं जो ब्रह्मादिक । स-वेश जाते ऊंचे मुख तक । पड़ते हैं जाके सामान्य लोक । इसी ओरके मुखमें ॥ २१ ॥ अन्य सभी हैं जो भूत-जात । जन्मते वही होते ग्रसित । किंतु इनका मुख निर्भ्रांत । न छूटता कोई ॥ २२ ॥ यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवंति । तथा तवामी नरलोकवीरा 'विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वल॑ति ॥ २८ ॥ जैसे हैं महानदीके ओघ । डूबते हैं सिंधुमें अथांग । वैसे सभी ओरसे हैं जग । जाता इस मुखमें ॥ २३ ॥ आयुष्य पथमें प्राणि-गण । करके अहो रात्र प्रयाण । इस मुखमें पाते निधान । अति-वेगसे ॥ २४ ॥ जैसे नदीके जलके प्रवाह दौडे हुए सागरमें समाते । वैसे समाते नर वीर सारे सवेग तेरे जलते मुखों में ॥ २८ ॥ ३७३ विश्व-रूप-दर्शनयोग
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥ जलते पर्वत-दरीमें जैसे । पतंग-समूह पडते वैसे । समस्त लोक पडते वेगसे । इस मुखमें आज ॥ २५ ॥ प्राणिमात्र जो है इसमें जाता । उसका नाम भी नहीं रहता । जैसे सारा पानी है सोख लेता । तपा हुवा लोह ॥ २६ ॥ लेलिह्यसे ग्रसमानः समंता- ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपंति विष्णो ॥ ३० ॥ तथा कर इतना आरोगन । नहीं होता तेरा क्षुधा-शमन । कैसा असामान्य यह दीपन । हुवा उदय ॥ २७ ॥ जैसे ज्वरसे उठा हुवा रोगी । या अकाल मुक्त भिक्षुक भोगी । वैसे तेरी जिव्हा है सदा लगी । चरनेमें ही । २८ । आहारका वैसे जो जो है नाम । आता तेरे निगलनेका काम । नहीं देखी ऐसी क्षुधा असीम । विस्मय जनक ॥ २९ ॥ उडते हुए ये जैसे पतंग सवेग जाते जलते दियेपे । वैसे विनाशार्थ तेरे मुखोंमें ये लोग सारे सवेग उड़ते ॥ २९ ॥ संसार सारा कर ग्रास होठ तू चाटता है जलती जिभोंसे । लपेट सारा तव उग्र तेज है तीन लोगोंको जला रहा जो ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी ३७४
सागरका जैसे आपोशन करना । तथा मेरु-पर्वतका कौर भरना । संपूर्ण ब्रह्मांड ही धरके चबाना । अपनी डाढोंसे ॥ ४३० ॥ सभी दिशाओंको निगल जाना । तारागण नभके चाट जाना । ऐसी सहज-लालसा धरना । यह है तेरा काम ॥ ३१ ॥ जैसे भोगसे है काम बढ़ता । ईंधनसे अग्नि धू धू करता । वैसे खा खा कर होठ चाटता । अधिक आशासे ॥ ३२ ॥ किया कैसा यह एक ही पसारा । जिह्वाग्रे रखा त्रिभुवन सारा । डाला है यह एक छोटासा कौर । वडवानलमें ॥ ३३ ॥ ऐसे हैं जो अगणित वदन । आर्थ कैसे इतने त्रिभुवन । इससे क्षुधा न होती सहन । बढती असह्य ॥ ३४ ॥ अजी ! है यह विश्व बेचारा । वदन-ज्वालामें पडा सारा । दावानलका पडा है घेरा । भेडों पर यहां ॥ ३५ ॥ विश्वका ऐसा हुआ अब । दैव कर्म नहीं आया तब । चराचर पर फैला सब । अकालका जाल ॥ ३६ ॥ विश्व-रूपका यह तेज-मंडल । बहुलियाका फैलाया हुआ जाल । मुख नहीं लाक्षाग्नि-ज्वाल । घेरता चराचरको ॥ ३७ ॥ जलाती कैसी अपनी दाहकता । इस बातको अग्नि नहीं जानता । किंतु जो जलता है वह जानता । नहीं बचते उसके प्राण ॥ ३८ ॥ अजी ! अपनी तीखी धारसे कैसे । न जानता शस्त्र-घात होता जैसे । अपना विनाश न जानता वैसे । हालाहल विष ॥ ३९ ॥ वैसे तुझको भी ज्ञात है नहीं । अपनी उग्रताकी बात सही । प्रत्येक मुखसे यहां हो रही । विनाश-लीला ॥ ४४० ॥ यदि तू है आत्मा एक । सकल विश्व-व्यापक । तब हमारा अंतक । हो आया कैसे ॥ ४१ ॥ छोडी मैंने जीवितकी आस । तू भी छोड दे संकोच खास । कह अपनी भानकी क्या खास । बात है आज ॥ ४२ ॥ ३७५ विश्व-रूप-दर्शनयोग
अपनी उग्रताको क्यों बढ़ाता जाता । अपना ईशत्व तू क्यों नहीं स्मरता । विश्व संभालना यदि नहीं चाहता । मेरे लिये ही स्मर तू ॥ ४३ ॥ आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥ तुम कौन हो प्रभो ! — एक बार वेद-वेद्य । त्रिभुवनका तू आद्य । विनति है विश्व-वंद्य । सुन तू मेरी ॥ ४४ ॥ ऐसा कह वह वीर । चरणपे रख शिर । कहता है सर्वेश्वर । सुन तू विनय ॥ ४५ ॥ अपना करने समाधान । मांग विश्व-रूपका दर्शन । औ' एक कालमें त्रिभुवन । निगल उठा तू ॥ ४६ ॥ अजी ! कह तू तब है भी कौन । कहांसे पाये भीषण आनन । शस्त्र क्यों लिये इतने महान । चमकाये हैं जो ॥ ४७ ॥ तेरा रुद्र-क्रोध भडक कर । दिखाता गगनको ओछा कर । दिखाता है आंखें निकालकर । भयग्रस्त होता विश्व ॥ ४८ ॥ कृतांतसे क्यों इतनी होड़ । कर रहा क्यों तू ऐसा अड़ । कह तू मुझसे यह गूढ़ । बात जो देव ॥ ४९ ॥ सुन यह कहता अनंत । कौन तू यह पूछता पार्थ । औ' होता क्यों ऐसा वृद्धिगत । उग्रतासे ॥ ४५० ॥ हो कौन बोलो विकराळ रूपी तुझे नमस्कार देवेश बोलो । पहचान चाहूँ देवादिदेव जानी न जाती करती तुम्हारी ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी ३७६