भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥ जलते पर्वत-दरीमें जैसे । पतंग-समूह पडते वैसे । समस्त लोक पडते वेगसे । इस मुखमें आज ॥ २५ ॥ प्राणिमात्र जो है इसमें जाता । उसका नाम भी नहीं रहता । जैसे सारा पानी है सोख लेता । तपा हुवा लोह ॥ २६ ॥ लेलिह्यसे ग्रसमानः समंता- ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपंति विष्णो ॥ ३० ॥ तथा कर इतना आरोगन । नहीं होता तेरा क्षुधा-शमन । कैसा असामान्य यह दीपन । हुवा उदय ॥ २७ ॥ जैसे ज्वरसे उठा हुवा रोगी । या अकाल मुक्त भिक्षुक भोगी । वैसे तेरी जिव्हा है सदा लगी । चरनेमें ही । २८ । आहारका वैसे जो जो है नाम । आता तेरे निगलनेका काम । नहीं देखी ऐसी क्षुधा असीम । विस्मय जनक ॥ २९ ॥ उडते हुए ये जैसे पतंग सवेग जाते जलते दियेपे । वैसे विनाशार्थ तेरे मुखोंमें ये लोग सारे सवेग उड़ते ॥ २९ ॥ संसार सारा कर ग्रास होठ तू चाटता है जलती जिभोंसे । लपेट सारा तव उग्र तेज है तीन लोगोंको जला रहा जो ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी ३७४