भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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दांतोंमें फंसे हैं कुछ रत्न । कुछ चूर्ण हो गये हो भग्न । जिव्हा-मूलमें फंसा चूरन । कुछ दांतोंमें ॥ १६ ॥ विश्व-रूप है यह महाकाल । चबाता लोगोंकी देह सबल । किंतु जीव देहका शिर-कमल । रखता आवश्य ॥ १७ ॥ वैसे शरीरमें है चोख । उत्तमांग जो शिर सम्मुख । महाकालके मुखमें देख । शेष रहे हैं ॥ १८ ॥ कहता है फिर अपनेसे अर्जुन । अन्य गति नहीं जो कुछ हुवा है जनन । करते हैं वे इस मुखमें गमन । अपने आप ॥ १९ ॥ यहा हुवा है जो सृष्ट । होता है इस मुखमें प्रविष्ट । निगलकर सब होता पुष्ट । विश्व-रूप काल ॥ ४२० ॥ समस्त हैं जो ब्रह्मादिक । स-वेश जाते ऊंचे मुख तक । पड़ते हैं जाके सामान्य लोक । इसी ओरके मुखमें ॥ २१ ॥ अन्य सभी हैं जो भूत-जात । जन्मते वही होते ग्रसित । किंतु इनका मुख निर्भ्रांत । न छूटता कोई ॥ २२ ॥ यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवंति । तथा तवामी नरलोकवीरा 'विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वल॑ति ॥ २८ ॥ जैसे हैं महानदीके ओघ । डूबते हैं सिंधुमें अथांग । वैसे सभी ओरसे हैं जग । जाता इस मुखमें ॥ २३ ॥ आयुष्य पथमें प्राणि-गण । करके अहो रात्र प्रयाण । इस मुखमें पाते निधान । अति-वेगसे ॥ २४ ॥ जैसे नदीके जलके प्रवाह दौडे हुए सागरमें समाते । वैसे समाते नर वीर सारे सवेग तेरे जलते मुखों में ॥ २८ ॥ ३७३ विश्व-रूप-दर्शनयोग