ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजी कोई किसीको न मारता । मैं ही सबका संहार करता । विश्व-रूप निमित्तसे बताता । यहां श्रीहरि ॥ ८ ॥ नहीं जाननेसे यह बात । पार्थ हुवा है व्याकुलचित्त । तथा कांपता रहा है व्यर्थ । देखके रूप ॥ ९ ॥ वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥ कहता है वह देखकर अर्जुन । कवच सह ये दोनों दल महान । खो जाते हैं जैसे गगनमें घन । वैसे जाते मुखमें ॥ ४१० ॥ या अया है अब कल्पांतका अंत । या हुवा है क्रुद्ध विश्वपे कृतांत । जो है स्वर्ग पाताळ सह जगत । निगलता आप ॥ ११ ॥ होता जब प्रतिकूल दैव । तब सभी संचित वैभव । जहांका तहां ही हो गलात्र । होता नष्ट ॥ १२ ॥ दोनों ओरकी एकत्रित सेना । जाती है मुखमें एक समान । किंतु वहांसे कभी लौटना । नहीं दीखता ॥ १३ ॥ अशोकके पात जैसे । चबाता है ऊट वैसे । सेना समूह व्यर्थ वैसे । मुखमें जाता ॥ १४ ॥ यहां मुकुट सह मस्तक । दांतोंमें चूर्ण होते अनेक । देखता मैं यह भयानक । दृश्य इस रूपमें ॥ १५ ॥ सबको तेरे ये दांत पीस रहे हैं — जाते त्वरासे मुखमें हि तेरे भयान जिसमें कराल दाढ । चिपके हुए हैं अनेक मुंड दीखे वहां चून बना हुवा जो ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३७२