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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अजी कोई किसीको न मारता । मैं ही सबका संहार करता । विश्व-रूप निमित्तसे बताता । यहां श्रीहरि ॥ ८ ॥ नहीं जाननेसे यह बात । पार्थ हुवा है व्याकुलचित्त । तथा कांपता रहा है व्यर्थ । देखके रूप ॥ ९ ॥ वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥ कहता है वह देखकर अर्जुन । कवच सह ये दोनों दल महान । खो जाते हैं जैसे गगनमें घन । वैसे जाते मुखमें ॥ ४१० ॥ या अया है अब कल्पांतका अंत । या हुवा है क्रुद्ध विश्वपे कृतांत । जो है स्वर्ग पाताळ सह जगत । निगलता आप ॥ ११ ॥ होता जब प्रतिकूल दैव । तब सभी संचित वैभव । जहांका तहां ही हो गलात्र । होता नष्ट ॥ १२ ॥ दोनों ओरकी एकत्रित सेना । जाती है मुखमें एक समान । किंतु वहांसे कभी लौटना । नहीं दीखता ॥ १३ ॥ अशोकके पात जैसे । चबाता है ऊट वैसे । सेना समूह व्यर्थ वैसे । मुखमें जाता ॥ १४ ॥ यहां मुकुट सह मस्तक । दांतोंमें चूर्ण होते अनेक । देखता मैं यह भयानक । दृश्य इस रूपमें ॥ १५ ॥ सबको तेरे ये दांत पीस रहे हैं — जाते त्वरासे मुखमें हि तेरे भयान जिसमें कराल दाढ । चिपके हुए हैं अनेक मुंड दीखे वहां चून बना हुवा जो ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३७२

दांतोंमें फंसे हैं कुछ रत्न । कुछ चूर्ण हो गये हो भग्न । जिव्हा-मूलमें फंसा चूरन । कुछ दांतोंमें ॥ १६ ॥ विश्व-रूप है यह महाकाल । चबाता लोगोंकी देह सबल । किंतु जीव देहका शिर-कमल । रखता आवश्य ॥ १७ ॥ वैसे शरीरमें है चोख । उत्तमांग जो शिर सम्मुख । महाकालके मुखमें देख । शेष रहे हैं ॥ १८ ॥ कहता है फिर अपनेसे अर्जुन । अन्य गति नहीं जो कुछ हुवा है जनन । करते हैं वे इस मुखमें गमन । अपने आप ॥ १९ ॥ यहा हुवा है जो सृष्ट । होता है इस मुखमें प्रविष्ट । निगलकर सब होता पुष्ट । विश्व-रूप काल ॥ ४२० ॥ समस्त हैं जो ब्रह्मादिक । स-वेश जाते ऊंचे मुख तक । पड़ते हैं जाके सामान्य लोक । इसी ओरके मुखमें ॥ २१ ॥ अन्य सभी हैं जो भूत-जात । जन्मते वही होते ग्रसित । किंतु इनका मुख निर्भ्रांत । न छूटता कोई ॥ २२ ॥ यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवंति । तथा तवामी नरलोकवीरा 'विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वल॑ति ॥ २८ ॥ जैसे हैं महानदीके ओघ । डूबते हैं सिंधुमें अथांग । वैसे सभी ओरसे हैं जग । जाता इस मुखमें ॥ २३ ॥ आयुष्य पथमें प्राणि-गण । करके अहो रात्र प्रयाण । इस मुखमें पाते निधान । अति-वेगसे ॥ २४ ॥ जैसे नदीके जलके प्रवाह दौडे हुए सागरमें समाते । वैसे समाते नर वीर सारे सवेग तेरे जलते मुखों में ॥ २८ ॥ ३७३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥ जलते पर्वत-दरीमें जैसे । पतंग-समूह पडते वैसे । समस्त लोक पडते वेगसे । इस मुखमें आज ॥ २५ ॥ प्राणिमात्र जो है इसमें जाता । उसका नाम भी नहीं रहता । जैसे सारा पानी है सोख लेता । तपा हुवा लोह ॥ २६ ॥ लेलिह्यसे ग्रसमानः समंता- ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपंति विष्णो ॥ ३० ॥ तथा कर इतना आरोगन । नहीं होता तेरा क्षुधा-शमन । कैसा असामान्य यह दीपन । हुवा उदय ॥ २७ ॥ जैसे ज्वरसे उठा हुवा रोगी । या अकाल मुक्त भिक्षुक भोगी । वैसे तेरी जिव्हा है सदा लगी । चरनेमें ही । २८ । आहारका वैसे जो जो है नाम । आता तेरे निगलनेका काम । नहीं देखी ऐसी क्षुधा असीम । विस्मय जनक ॥ २९ ॥ उडते हुए ये जैसे पतंग सवेग जाते जलते दियेपे । वैसे विनाशार्थ तेरे मुखोंमें ये लोग सारे सवेग उड़ते ॥ २९ ॥ संसार सारा कर ग्रास होठ तू चाटता है जलती जिभोंसे । लपेट सारा तव उग्र तेज है तीन लोगोंको जला रहा जो ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी ३७४

सागरका जैसे आपोशन करना । तथा मेरु-पर्वतका कौर भरना । संपूर्ण ब्रह्मांड ही धरके चबाना । अपनी डाढोंसे ॥ ४३० ॥ सभी दिशाओंको निगल जाना । तारागण नभके चाट जाना । ऐसी सहज-लालसा धरना । यह है तेरा काम ॥ ३१ ॥ जैसे भोगसे है काम बढ़ता । ईंधनसे अग्नि धू धू करता । वैसे खा खा कर होठ चाटता । अधिक आशासे ॥ ३२ ॥ किया कैसा यह एक ही पसारा । जिह्वाग्रे रखा त्रिभुवन सारा । डाला है यह एक छोटासा कौर । वडवानलमें ॥ ३३ ॥ ऐसे हैं जो अगणित वदन । आर्थ कैसे इतने त्रिभुवन । इससे क्षुधा न होती सहन । बढती असह्य ॥ ३४ ॥ अजी ! है यह विश्व बेचारा । वदन-ज्वालामें पडा सारा । दावानलका पडा है घेरा । भेडों पर यहां ॥ ३५ ॥ विश्वका ऐसा हुआ अब । दैव कर्म नहीं आया तब । चराचर पर फैला सब । अकालका जाल ॥ ३६ ॥ विश्व-रूपका यह तेज-मंडल । बहुलियाका फैलाया हुआ जाल । मुख नहीं लाक्षाग्नि-ज्वाल । घेरता चराचरको ॥ ३७ ॥ जलाती कैसी अपनी दाहकता । इस बातको अग्नि नहीं जानता । किंतु जो जलता है वह जानता । नहीं बचते उसके प्राण ॥ ३८ ॥ अजी ! अपनी तीखी धारसे कैसे । न जानता शस्त्र-घात होता जैसे । अपना विनाश न जानता वैसे । हालाहल विष ॥ ३९ ॥ वैसे तुझको भी ज्ञात है नहीं । अपनी उग्रताकी बात सही । प्रत्येक मुखसे यहां हो रही । विनाश-लीला ॥ ४४० ॥ यदि तू है आत्मा एक । सकल विश्व-व्यापक । तब हमारा अंतक । हो आया कैसे ॥ ४१ ॥ छोडी मैंने जीवितकी आस । तू भी छोड दे संकोच खास । कह अपनी भानकी क्या खास । बात है आज ॥ ४२ ॥ ३७५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

अपनी उग्रताको क्यों बढ़ाता जाता । अपना ईशत्व तू क्यों नहीं स्मरता । विश्व संभालना यदि नहीं चाहता । मेरे लिये ही स्मर तू ॥ ४३ ॥ आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥ तुम कौन हो प्रभो ! — एक बार वेद-वेद्य । त्रिभुवनका तू आद्य । विनति है विश्व-वंद्य । सुन तू मेरी ॥ ४४ ॥ ऐसा कह वह वीर । चरणपे रख शिर । कहता है सर्वेश्वर । सुन तू विनय ॥ ४५ ॥ अपना करने समाधान । मांग विश्व-रूपका दर्शन । औ' एक कालमें त्रिभुवन । निगल उठा तू ॥ ४६ ॥ अजी ! कह तू तब है भी कौन । कहांसे पाये भीषण आनन । शस्त्र क्यों लिये इतने महान । चमकाये हैं जो ॥ ४७ ॥ तेरा रुद्र-क्रोध भडक कर । दिखाता गगनको ओछा कर । दिखाता है आंखें निकालकर । भयग्रस्त होता विश्व ॥ ४८ ॥ कृतांतसे क्यों इतनी होड़ । कर रहा क्यों तू ऐसा अड़ । कह तू मुझसे यह गूढ़ । बात जो देव ॥ ४९ ॥ सुन यह कहता अनंत । कौन तू यह पूछता पार्थ । औ' होता क्यों ऐसा वृद्धिगत । उग्रतासे ॥ ४५० ॥ हो कौन बोलो विकराळ रूपी तुझे नमस्कार देवेश बोलो । पहचान चाहूँ देवादिदेव जानी न जाती करती तुम्हारी ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरी ३७६

भगवान् उवाच कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥ मैं सबको संहारनेवाला काल हूं— जान तू मैं सम्मुख हूं महाकाल। लोक-संहारार्थ बढ़ता कराल। फैलाये हैं ये जो मुख विकराल। सबको निगलने ॥ ५१ ॥ सुनकर यह अकुलाता पार्थ। पहली बातसे मैं ही संकट-ग्रस्त। विनय की थी तेरी मैंने अनंत। हुवा प्रकट तू काल ॥ ५२ ॥ इस पर बोलनेसे कठिन। यह निराश होगा यह जान। सत्वर कहता देव अर्जुन। और एक बात ॥ ५३ ॥ सबका जो यह चला संहार। इसमें रहे पांडव बाहर। सुनकर यह पांडु कुमार। संभालता प्राण ॥ ५४ ॥ मरण महा-भयसे हो मुक्त। सुनने लगा वह ध्यान-युक्त। श्रीकृष्ण वचन हो अनुरक्त। धनंजय ॥ ५५ ॥ पांडव तुम मेरे आत्मीय जन। इसलिये तुम्हे छोड़के अर्जुन। अन्य सबका करने निकंदन। हुवा उद्यत यहां ॥ ५६ ॥ वज्रानलमें जैसे प्रचंड। डालना जैसे नवनीतका पिंड। मेरे मुखमें वैसे ब्रह्मांड। देखा तूने ॥ ५७ ॥ श्रीभगवानने कहा मैं काल उठा जग-नाशकारी संहारने सिद्ध यहां खड़ा हूँ। तेरे बिना ये सब नष्ट होंगे जो हैं खड़े सैनिक दोन ओर ॥ ३२ ॥ (48) ३७७ विश्व-रूप-दर्शनयोग

उसमें नहीं रहेगा कुछ शेष । जान तू होगा यह सब अ-दोष । सेनाकी चली है बकवास । व्यर्थकी जान तू ॥ ५८ ॥ बनाकर जो यह सैन्य मिलन । करते हैं विरावेशका गर्जन । देखते काल पर विजय स्वप्न । अपने गदा-दंडसे ॥ ५९ ॥ कहते सृष्टि पर सृष्टि करेंगे । प्रतिज्ञासे महाकालको जीतेंगे । तथा जगतका हम बनाएंगे । एक ही कौर ॥ ४६० ॥ जगतको हम निगलेंगे । आकाशको धर जलायेंगे । तीर पर हम नचायेंगे । विश्वका प्राण ॥ ६१ ॥ ऐसी यह चतुरंग संपदा । करती है महाकालसे स्पर्धा । अपने पराक्रमका है मद । करते व्यर्थका ॥ ६२ ॥ बोलते हैं तलवारसे भी तीखा । दीखते हैं आगसे भी दाहक । मारनेमें कालकूटसे भी अधिक । भयानक मानते ॥ ६३ ॥ किंतु ये सब गंधर्व-नगर माल । जान तू ये हैं गेडुरीके शोर पोल । अथवा सब हैं ये आलेखके फल । दीखते हैं बडे ॥ ६४ ॥ अथवा यह मृगजलमें महापूर । सेना नहीं वस्त्रके सांप बनाकर । रखा है यहां बंड सजधजाकर । धनंजय ॥ ६५ ॥ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥ यहां जो संचलित बल । मैंने ग्रास लिया सकल । अब चित्रके-से बेताल । निर्वीर्य हैं ये ॥ ६६ ॥ इनका जीवन सूत्र कबका टूट चुका है— इसीलिये उठ पा ले तू कीर्ति होके जयी राज्य समृद्ध भोग । मैंने हने हैं सब ही कभी के निमित्त हो केवल सव्यसाची ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ३७८

टूटा सूत्र जो था नचानेवाला । गुड्डा खंभे पर नाचनेवाला । खींचते ही गिरेगा अलबेला । वैसे ही यहां ॥ ६७ ॥ नष्ट करने सैन्यका आकार । न लगेगा समय धनुर्धर । इसीलिये उठकर सत्वर । हो बुद्धिमान ॥ ६८ ॥ तूने जब गोग्रहणके समय । मोहनास्त्र छोड़ा तब धनंजय । भीरु उत्तरने भी होके निर्भय । विवस्त्र किया सबको ॥ ६९ ॥ हुए हैं आज ये उससे भी तेजोहीन । अनायास युद्ध चल आया स-सम्मान । पा लो यश जीत कर शत्रुको अर्जुन । अकेला लडके ॥ ४७० ॥ तना नहीं है यहां कोरा यश । होगा सकल राज्य वैभव तेरे वश । मुझसे मारे ये पहले ही अब शेष । निमित्त हो सव्यसाची ॥ ७१ ॥ द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् । मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा । युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥ ३४ ॥ दोनों सेनाओंमें केवल पांडव ही बचेंगे— द्रोणकी परवाह न कर । भीष्मका भय भी तू न धर । न सोच तू कैसे कर्ण पर । पाऊं विजय ॥ ७२ ॥ कौन उपाय जयद्रथ पर । करना उसकी चिंता न कर । तथा यहां हैं जो जो महावीर । प्रसिद्ध महारथी ॥ ७३ ॥ ये एक एक तू अर्जुन । चित्रके ही सिंह मान । गीले हाथ लीप लोपन । करना इनका ॥ ७४ ॥ ये द्रोण ये भीष्म जयद्रथादि या कर्ण या अन्य महान योद्धा । मैंने हने जो उनको तु मार निःशंक जूझो जय मान तेरी ॥ ३४ ॥ ३७९ विश्व रूप-दर्शनयोग

इस पर क्या रहा है अर्जुन । दीखती यह युद्धकी सेना । भास मात्र है बल-तेज-हीन । किया मैंने पहले ही ॥ ७५ ॥ यहां तूने देख लिया सब । मेरे मुख सुन लिया अब । तभी जीवन मिटा है अब । रहा भूसा ॥ ७६ ॥ अब तू ऊठ धनुर्धर । मेरे मारे हुओंको मार । व्यर्थका ही शोक न कर । अब तू यहां ॥ ७७ ॥ जैसे कहीं एक निशान करना । स-कौतुक उसपे तीर चलाना । इसी भांति यहां देख तू अर्जुन । निमित्त मात्र है ॥ ७८ ॥ अजी ! तेरे विरुद्ध जो भया । उसे कभीका शेर खा गया । अभी विजय काल है आया । यशको लूट ले ॥ ७९ ॥ साभिमान फूले थे जो दायाद । तथा हुए थे विश्व-दुर्मद । किया उनका अनायास वध । धनंजयने ॥ ४८० ॥ ऐसी यह विजय गाथा । गायेगी वांग्मय-सरिता । लिखो अब इसको पार्थ । विश्व-पट पर ॥ ८१ ॥ सञ्जय उवाच एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५ ॥ ऐसी जो यह अपूर्व कथा । जिसका अपूर्ण मनोरथ । कहता संजय कुरुनाथ । कहे ज्ञानदेव ॥ ८२ ॥ संजयने कहा श्रीकृष्णसे यों सुनके किरीटी जो हाथ जोडे भयभीत होके । कर वंदना यों पुनश्च बोले नमा हुवा गद्गद भावपूर्ण ॥ ३५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३८०

सत्य-लोकका तब गंगा जल । खुलता जैसे कर कल-कल । वैसी खुली है वाग्धारा विशाल । बोलनेमें ॥ ८३ ॥ या जैसे महामेघका गर्जन । होते हैं एक कालमें गूंजन । या करें क्षीर-सागर मंथन । करता मंदराचल ॥ ८४ ॥ ऐसा गंभीर महा-नाद । कर ये वाक्य विश्व कंद । बोला है जो वह अगाध । अनंत रूप ॥ ८५ ॥ सुनी ये बात अर्जुनने किंचित । सुखाया भयावेग बहुत । न जाने सुख या भयसे हे पार्थ । कांपने लगा ॥ ८६ ॥ बोलनेमें भर आय कंठ । सहज जुडे कर संपुट । पुनः पुनः रखता ललाट । चरणों पर जो ॥ ८७ ॥ तथा कुछ भी नहीं बोला जाता । बोलनेमें वह गद्गद् होता । सुख या भयसे नहीं जानता । आप ही करें निर्णय ॥ ८८ ॥ किंतु सुना मैने देवकी बात । ऐसा कैसा हुवा है यह पार्थ । मैंने शब्द पर किया है अर्थ । श्लोकके यहां ॥ ८९ ॥ वैसे ही भय भीत जो अर्जुन । करता हरि पादमें वंदन । तथा करता है वह कथन । इस भांतिसे ॥ ९० ॥ अर्जुन उवाच 'स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यंति च सिद्धसंघाः ॥ ३६ ॥ अर्जुनने कहा है योग्य जो कीर्तनसे तुम्हारे संसार आनंद औ' प्रेम पाता । डरे हुए राक्षस भागते हैं औ' पूजता सिद्ध समूह सारा ॥ ३६ ॥ ३८१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

अर्जुनका किया हुवा विराट स्तवन -- अर्जुन सुन मैं हूं काल । निगलना है मेरा खेल । श्रीकृष्ण तेरे यह बोल । मैं मानता हूं ॥ ९१ ॥ किंतु तू है जो महाकाल । आज विश्व-स्थितिका वेळ । तब क्यों संहारका खेल । यह जानता नहीं ॥ ९२ ॥ कैसे शरीरका तारुण्य तोडना । तथा कैसे वहां वार्धक्य है लाना । ऐसे सोचकर करनेसे न होना । स्वाभाविक है ॥ ९३ ॥ जब चार प्रहर नहीं होता । किसी भी समय क्या है अनंता । माध्यान्ह समय क्यों जो सविता । अस्त होगा क्या ? ॥ ९४ ॥ तू है अखंडित काल । तुझे भी है तीन वेळ । वे भी हैं अति सबल । अपने समयमें ॥ ९५ ॥ होने लगती जब उत्पत्ति । तब लय स्थिति जो भूलती । जब लय स्थिति बन आती । न उत्पत्ति प्रलय ॥ ९६ ॥ आता है जब प्रलयका वेळ । उत्पत्ति स्थितिका है अस्त काल । इसे टाळ न सकता है काल । जो अनादि सिद्ध ॥ ९७ ॥ आज स्थिति-कालमें है यह जग । भोगके बहारमें करता भोग । अब तू निगल सकता है जग । ऐसा जँचता नहीं ॥ ९८ ॥ तब संकेतसे कहता बोल । आया है इस सेनाका ही काल । दिखाया यह प्रत्यक्ष सकल । तुझको अभी ॥ ९९ ॥ अर्जुनकी क्षमा याचना -- पाया जब यह संकेत । देखता तब सब पार्थ । संपूर्ण रूपसे जगत । स्वाभाविक है ॥ ५०० ॥ तब कहता है वह अर्जुन । सूत्रधार तू रूपका महान । आया है पूर्व स्थितिमें संपूर्ण । सभी यह विश्व ॥ १ ॥ अजी ! दुःख सागरमें जो पडता । उनको जिस भांति तू उभारता । स्मरण्गा मैं सदा यह कीर्ति-कथा । श्रीकृष्ण तेरी ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ३८२

इस कीर्ति-स्मरणसे सदैव । भोगते महा-सुखका वैभव । हर्षामृत उर्मिपर स-भाव । डुलते जाते ॥ ३ ॥ अजी ! जीनेसे है यह जग । तुझसे करता अनुराग । तथा करनेसे दुष्ट-भंग । अधिकाधिक ॥ ४ ॥ किंतु त्रिभुवनके राक्षस । भय खाते तेरा हृषीकेश । तथा भागते हैं दिशा दस । अमर्याद ॥ ५ ॥ और ये सुर सिद्ध किन्नर । अथवा सभी सचराचर । देख तुझको है नमस्कार । करते सहर्ष ॥ ६ ॥ कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । अनंत देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥ अजी ! यहां किस कारण । राक्षस ये जो नारायण । न झुकते तव चरण । भागते सदैव ॥ ७ ॥ और यह तुझको क्या पूछना । इतना तो हमको भी जानना । सूर्योदय बाद कैसे रहना । अंधःकारका साध्य ॥ ८ ॥ तू है स्वयं-प्रकाशका आगर । और हुवा है अब जो गोचर । तभी निशाचरोंका है अंधार । मिटा सहज ॥ ९ ॥ अब तक जो थे हम जन । न जानते थे तेरी महान । महिमा उसका हुवा ज्ञान । इसी समय ॥ ५१० ॥ प्रभो न क्यों ये तुझको नमेंगे आधार तू ब्रह्मका आदि-कर्ता अनंत देवेश जगन्निवास है या नहीं के पर है परेश ॥ ३७ ॥ ३८३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

जहांसे विविध सृष्टि-माळ । फैलती भूत-ग्रामकी बेळ । ब्रह्म जो तेरी इच्छाका फळ । प्रसवता है ॥ ११ ॥ देव ! निःसीमत्व सर्वोदित । देव ! निःसीममें गुण अनंत । देव ! निःसीमागम्य सतत । देवेंद्र देवका ॥ १२ ॥ तू है जगत्त्रयका जो आश्रय । अक्षर सदाशिव है निश्चय । तू ही सत-असतका प्रश्रय । उससे परेका ॥ १३ ॥ त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनंत रूप ॥ ३८ ॥ प्रकृति पुरुषका तू आदि । तू ही महत्तत्वकी अवधी । स्वयं तू है जो आदि अनादि । पुरातन पुराण ॥ १४ ॥ तू सकळ विश्वका जीवन । जीव मात्रका तू ही निधान । भूत और भविष्यका ज्ञान । तेरे ही करमें ॥ १५ ॥ श्रुतिका तू है लोचन । स्वरूप सुख अभिन्न । त्रिभुवन आयतन- । का आयतन तू ॥ १६ ॥ इसीलिये तू परम । तू ही रहा महा धाम । कल्पांतमें महद्ब्रह्म । तुझमें विलीन ॥ १७ ॥ वास्तवमें तू ही है देव । विश्व विस्तारता सदैव । अनंत रूप देवदेव । अवर्णनीय ॥ १८ ॥ देवादि तू, देव पुराण आत्मा संसारका अंतिम आसरा तू । तू जानता है तुझ मोक्ष-धाम विस्तारिता विश्व अनंत रूप ॥ ३८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३८४

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशांकः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च । नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥ नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥ एक तू क्या नहीं है देव । तथा कहां नहीं तू देव । जहां जैसे ही तू है देव । नमस्कार मेरा ॥ १९ ॥ वायु है तू अनंत । यम तू नियमित । भूतमात्रमें नित । बसता तू अग्नि ॥ ५२० ॥ वरुण और तू सोम । सृष्टा तथा तू है ब्रह्म । पितामहका परम । आदि जनक तू ॥ २१ ॥ और जहां जो जो कुछ है । रूप है अथवा नहीं है । नमन जहां जैसा भी है । जगन्नाथ तुझको ॥ २२ ॥ तू अग्नि तू वायु समस्त देव प्रजापते ब्रह्म-पिता सु-श्रेष्ठ । तुझे नमस्कार सहस्र बार पुनः पुनः और पुनः पुनः है ॥ ३९ ॥ आगे कि पीछे सब ओर देव सदा नमस्कार जहां जहां तू । उत्साह सामर्थ्य अनंत तेरा सभी बना तू तुझमें सभी है ॥ ४० ॥ (49) ३८५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

ऐसा हो सानुराग चित्त । स्तुति करता पांडुसुत । आगे पीछे नमन नित । कहता नमस्ते ॥ २३ ॥ पुनः देखता साद्यंत । श्रीमूर्त्ति जो है सतत । तथा कहता है पार्थ । नमस्ते देव ॥ २४ ॥ देख देख कर सतत । प्रसन्न होता पार्थ-चित्त । कहता है वह हो नत । नमस्कार देव ॥ २५ ॥ यहां चराचरमें समस्त । देखता उसीको अखंडित । तथा करता है प्रणिपात । नमस्कार देव ॥ २६ । वह रूप ऐसा अद्भुत । आश्चर्य स्फूर्त जो अनंत । पुनः पुनः कहता पार्थ । नमस्कार देव ॥ २७ ॥ अन्य स्तवन न सूझता । शांत रहना भी न होता । ऐसा प्रेम भाव जगता । कहता नमस्कार ॥ २८ ॥ वास्तवमें ऐसा ही बार बार । नमन करता सहस्र बार । फिर कहता है श्री चक्रधर । प्रणाम तेरे सम्मुख ॥ २९ ॥ देवका पेट पीठ है नहीं । इससे हमें लाभ भी नहीं । फिर भी तेरी पीठको सही । नमस्कार स्वामी ॥ ५३० ॥ रहा है तू मेरे पीछेसे । तभी पीछे कहता तुझसे । सम्मुख विमुख विश्वसे । होता नहीं तेरा ॥ ३१ ॥ भिन्न भिन्न अब अवयव । नहीं जान सकता मैं देव । तभी नमन तुझको सर्व- । सर्वात्मक स्वामी ॥ ३२ ॥ देव ! तू अनंत बल-धाम । नमन है अमित विक्रम । सकल काल सर्वत्र सम । सर्वेश देव ॥ ३३ ॥ अजी ! संपूर्ण अवकाशमें जैसे । आकाश ही आकाश रहता ऐसे । सर्वत्वमें तू सर्व-व्यापी है वैसे । हुआ सर्व-सर्व ॥ ३४ ॥ अथवा तू है केवल । सब ही सब अखिल । क्षीरार्णवमें कल्लोल । क्षीरका जैसे ॥ ३५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३८६

इसीलिये हे देव । भिन्न नहीं तू सर्व । हुआ है अनुभव । सर्व सर्व तू है ॥ ३६ ॥ सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥ किंतु तू है ऐसा महान । हमें नहीं इसका भान । या तुझे आप्त ही मान । किया बर्ताव ॥ ३७ ॥ हुई यह बड़ी अनुचित बात । लिया मैंने संमार्जनमें अमृत । कामधेनु देकर किया स्वीकृत । गर्दभ-शावक ॥ ३८ ॥ चट्टान मिला था हमको पारसका । तोड़के आधार बनाया मकानका । औ' काटकर बनाया सुर-तरुका । खोंडा बगियामें ॥ ३९ ॥ हाथ लगी थी चिंतामणिकी खान । किया जो गोरु हांकनेका साधन । वैसे तेरी समीपताके कारण । खोया महत्व ॥ ५४० ॥ यह क्या युद्ध तथा इसका मूल्य । परंतु है तू परब्रह्म अमूल्य । फिर भी आज दिया है तुझे कार्य । सारथी बनाके ॥ ४१ ॥ उन कौरवोंके घर । शिष्टाईमें चक्रधर । बेचा है तू सर्वेश्वर । सामान्य बातमें ॥ ४२ ॥ योगियोंका तू समाधिसुख । यह नहीं जानता मैं मूर्ख । तेरा उपरोध मैं सन्मुख । तुझसे ही करता ॥ ४३ ॥ समान माना अविनीत होके हे कृष्ण हे यादव हे सखा जो । न जानके ये महिमा तिहारी प्रमाद् या प्रेमसे ही पुकारा ॥ ४१ ॥ ३८७ विश्व-रूप-दर्शनयोग

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥ हे आदि अनादि पुरुष ! तुझसे हंसी-विनोद किया क्षमा कर — इस विश्वका तू अनादिमूल । जहां जब मिला हंसीके बोल । बोला सगाईके नाते केवल । विनोदसे बहु ॥ ४४ ॥ आते थे हम जब तेरे सदन । पाते थे तुझसे ही बहु सम्मान । तो भी अति लगावसे जनार्दन । बैठते थे रूठके ॥ ४५ ॥ समझाना हमारे पांव छूकर । तुझसे है इस भांति चक्रधर । बैठते जैसे हटके रूठ कर । ऐसे किया बहुत ॥ ४६ ॥ आत्मीय-जन भावके नाते । उलटे हो हम थे बैठते । ऐसे प्रकार किसे सोहते । भूल हुयी स्वामी ॥ ४७ ॥ अरे ! कलावाजी कर देवसे । आखाडेमें भिडते थे मस्तीसे । सतरंजमें आ अति-क्रोधसे । लड़ते थे देव ॥ ४८ ॥ जो चाहा जो तुझसे मांगना । तुझको ही उपदेश करना । “तुझसे क्या हमारा ! ” भी बोलना । हमारी उदंडता ॥ ४९ ॥ ऐसे हैं हमारे अनंत अपराध । त्रिलोकमें नहीं समाते अगाध । तेरे चरण छू लेता कर सौगंध । था यह सब अज्ञानसे ॥ ५५० ॥ भोजनके समय देव । रखते स्मरण सदैव । किंतु मूर्ख मैं जो सगर्व । अडके बैठता ॥ ५१ ॥ खेला फिरा साथ जीमा कि सोया एकांतमें या सबके समक्ष । तथा हंसी की तुझ तुच्छ माना क्षमा करो भान तेरा किसे है ॥ ४२ ॥ ज्ञानेश्वरी ३८८

जाके देवके अंतरगृहमें । खेलते शंका न लाता मनमें । इतना क्या लुढ़कता शैय्यामें । साथ ही देष ॥ ५२ ॥ कृष्ण कहके ही पुकारता । यादव कह तुझे देखता । अपनी सौगंध भी खिलाता । जाते हुए तुझे ॥ ५३ ॥ एकासन पर देव ! बैठना । सदैव तेरी अवज्ञा करना । अति-स्नेहसे ऐसा बरतना । हुवा देव ॥ ५४ ॥ इसीलिये यह क्या क्या सब । कहूं मैं स्वामी तुझसे अब । मैं हूं अपराध ढेर सब । रहा अनंत ॥ ५५ ॥ प्रभो तेरे संन्मुख या विमुख । की हैं भली बुरी बाते अनेक । मां जैसे निभाती है शिशुकी चूक । वैसे निभा लेना मुझे ॥ ५६ ॥ जब कभी ले आती है सरिता । गंदा पानीका प्रवाह बहता । तब कैसे सागर समा लेता । उलघास नहीं अन्य ॥ ५७ ॥ वैसे प्रीति या स-प्रमाद । मुझसे हुआ जो विरोध । या बोला कुछ भी मुकुंद । उपहासकी बात ॥ ५८ ॥ तथा देवके क्षमत्वसे क्षमा । आधार है जो सब भूत-ग्राम । इसीलिए हे श्री पुरुषोत्तम । तुझसे मांगता अल्प ॥ ५९ ॥ तभी कर तू अप्रमेय । शरणागत धनंजय । जिसे तूने अपना लिया । क्षमा कर अपराध ॥ ५६० ॥ पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥ तू है पिता स्थावर जंगमोंका तू है बड़ा ही गुरु पूजनीय । त्रिलोकमें ना तुझ तुल्य कोई कहांसे आवे अनुपमप्रभावी ॥ ४३ ॥ ३८९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

मुझे हुआ अब इसका ज्ञान । आता देवकी महिमा महान् । देव है यहां उत्पत्ति स्थान । चराचरका सब ॥ ६१ ॥ हरिहरादि जो है समस्त । उनका तू परम दैवत । वेदोंका भी है जो ज्ञानदात । तू ही आदि-गुरु ॥ ६२ ॥ गंभीर है तू श्रीराम । विविध भूतैक सम । सकल गुण अप्रतिम । अद्वितीय ॥ ६३ ॥ कोई नहीं है तेरे समान । यह कहनेका क्या कारण । तुझसे ही हुआ है गगन । उसमें समाया विश्व ॥ ६४ ॥ ऐसे तेरे समान है अन्य कोई । कहनेमें वाणी अत्यंत लजाई । वहां अधिककी क्या बात आई । कहनेकी देव ॥ ६५ ॥ इसीलिये त्रिभुवनमें तू एक । कोई नहीं तुझसे अधिक । तेरा महिमा ही ऐसे अलौकिक । नहीं होता बखान ॥ ६६ ॥ तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥ ऐसे कह कर जो अर्जुन । करता दंडवत नमन । आया सात्विकताका उफान । लहराकर ॥ ६७ ॥ कहता तब प्रसीद प्रसीद । वाचा होती है अतीव गद्गद् । उभार ले तू मुझे अपराध- । सागरसे देव ॥ ६८ ॥ विश्व-सुहृदको सगा मान । नहीं किया उचित सन्मान । तुझ ईश्वरमें सा-भिमान । किया प्रभुत्व ॥ ६९ ॥ इसीलिये मैं करता प्रणाम प्रसन्न हो तू स्तवनीय देव । क्षमा करो जी मुझ पुत्र मान सखा सखाको प्रिय ज्यों प्रियाको ॥ ४४ ॥ ज्ञानेश्वरी. ३९०

वर्णनीय तू प्रेमके कारण । करता सभामें मेरा वर्णन । तब सगर्व अपना बखान । करता मैं अधिक ॥ ७० ॥ ऐसे हैं कितने ही अपराध । उनकी मर्यादा नहीं गोविंद । क्षमा कर लक्ष लक्ष प्रमाद । प्रसाद रूप तू ॥ ७१ ॥ किंतु ऐसे विनय करनेमें । योग्यता कहां है देव मुझमें । शिशु जैसे पिताके दुलारमें । बोलता वैसे ही ॥ ७२ ॥ पिता पुत्रके अपराध । कितने भी हों वे अगाध । सहता है पिता निर्द्वंद्व । वैसे सह ले तू ॥ ७३ ॥ सखाकी उद्धतता । सखा शांत सहता । वैसे ही हे अनंत । सहन कर तू ॥ ७४ ॥ प्रियमैं कभी सम्मान । न करता प्रिय जान । आप उठाये रूठन । क्षमा करोजी ॥ ७५ ॥ या होता जहां जी-लगे स्नेहीका मिलन । कहा जाता जीवन संकटमें कथन । ऐसा करनेमें वहां आत्म-निवेदन । न होता संकोच ॥ ७६ ॥ जिसने किया तन-मन अर्पण । प्रेमादर-युत पतिके चरण । मिलनसे होता सर्वस्व कथन । स्वाभाविक वैसे ॥ ७७ ॥ वैसे ही देव मैंने अब । कह डाला तुझसे सब । दूसरा हेतु रहा कब । अपना स्वामी ॥ ७८ ॥ अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५ ॥ अपूर्व देखा अपरूप दृश्य तो भी बना व्याकुल चित्त मेरा । मुझे बताओ प्रभु मूळ रूप प्रसन्न हो तू जगका निवास ॥ ४५ ॥ ३९१ विश्व-रूप-दर्शनयोग