भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 452

अर्जुनका किया हुवा विराट स्तवन -- अर्जुन सुन मैं हूं काल । निगलना है मेरा खेल । श्रीकृष्ण तेरे यह बोल । मैं मानता हूं ॥ ९१ ॥ किंतु तू है जो महाकाल । आज विश्व-स्थितिका वेळ । तब क्यों संहारका खेल । यह जानता नहीं ॥ ९२ ॥ कैसे शरीरका तारुण्य तोडना । तथा कैसे वहां वार्धक्य है लाना । ऐसे सोचकर करनेसे न होना । स्वाभाविक है ॥ ९३ ॥ जब चार प्रहर नहीं होता । किसी भी समय क्या है अनंता । माध्यान्ह समय क्यों जो सविता । अस्त होगा क्या ? ॥ ९४ ॥ तू है अखंडित काल । तुझे भी है तीन वेळ । वे भी हैं अति सबल । अपने समयमें ॥ ९५ ॥ होने लगती जब उत्पत्ति । तब लय स्थिति जो भूलती । जब लय स्थिति बन आती । न उत्पत्ति प्रलय ॥ ९६ ॥ आता है जब प्रलयका वेळ । उत्पत्ति स्थितिका है अस्त काल । इसे टाळ न सकता है काल । जो अनादि सिद्ध ॥ ९७ ॥ आज स्थिति-कालमें है यह जग । भोगके बहारमें करता भोग । अब तू निगल सकता है जग । ऐसा जँचता नहीं ॥ ९८ ॥ तब संकेतसे कहता बोल । आया है इस सेनाका ही काल । दिखाया यह प्रत्यक्ष सकल । तुझको अभी ॥ ९९ ॥ अर्जुनकी क्षमा याचना -- पाया जब यह संकेत । देखता तब सब पार्थ । संपूर्ण रूपसे जगत । स्वाभाविक है ॥ ५०० ॥ तब कहता है वह अर्जुन । सूत्रधार तू रूपका महान । आया है पूर्व स्थितिमें संपूर्ण । सभी यह विश्व ॥ १ ॥ अजी ! दुःख सागरमें जो पडता । उनको जिस भांति तू उभारता । स्मरण्गा मैं सदा यह कीर्ति-कथा । श्रीकृष्ण तेरी ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी ३८२