ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्य-लोकका तब गंगा जल । खुलता जैसे कर कल-कल । वैसी खुली है वाग्धारा विशाल । बोलनेमें ॥ ८३ ॥ या जैसे महामेघका गर्जन । होते हैं एक कालमें गूंजन । या करें क्षीर-सागर मंथन । करता मंदराचल ॥ ८४ ॥ ऐसा गंभीर महा-नाद । कर ये वाक्य विश्व कंद । बोला है जो वह अगाध । अनंत रूप ॥ ८५ ॥ सुनी ये बात अर्जुनने किंचित । सुखाया भयावेग बहुत । न जाने सुख या भयसे हे पार्थ । कांपने लगा ॥ ८६ ॥ बोलनेमें भर आय कंठ । सहज जुडे कर संपुट । पुनः पुनः रखता ललाट । चरणों पर जो ॥ ८७ ॥ तथा कुछ भी नहीं बोला जाता । बोलनेमें वह गद्गद् होता । सुख या भयसे नहीं जानता । आप ही करें निर्णय ॥ ८८ ॥ किंतु सुना मैने देवकी बात । ऐसा कैसा हुवा है यह पार्थ । मैंने शब्द पर किया है अर्थ । श्लोकके यहां ॥ ८९ ॥ वैसे ही भय भीत जो अर्जुन । करता हरि पादमें वंदन । तथा करता है वह कथन । इस भांतिसे ॥ ९० ॥ अर्जुन उवाच 'स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यंति च सिद्धसंघाः ॥ ३६ ॥ अर्जुनने कहा है योग्य जो कीर्तनसे तुम्हारे संसार आनंद औ' प्रेम पाता । डरे हुए राक्षस भागते हैं औ' पूजता सिद्ध समूह सारा ॥ ३६ ॥ ३८१ विश्व-रूप-दर्शनयोग