भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जाके देवके अंतरगृहमें । खेलते शंका न लाता मनमें । इतना क्या लुढ़कता शैय्यामें । साथ ही देष ॥ ५२ ॥ कृष्ण कहके ही पुकारता । यादव कह तुझे देखता । अपनी सौगंध भी खिलाता । जाते हुए तुझे ॥ ५३ ॥ एकासन पर देव ! बैठना । सदैव तेरी अवज्ञा करना । अति-स्नेहसे ऐसा बरतना । हुवा देव ॥ ५४ ॥ इसीलिये यह क्या क्या सब । कहूं मैं स्वामी तुझसे अब । मैं हूं अपराध ढेर सब । रहा अनंत ॥ ५५ ॥ प्रभो तेरे संन्मुख या विमुख । की हैं भली बुरी बाते अनेक । मां जैसे निभाती है शिशुकी चूक । वैसे निभा लेना मुझे ॥ ५६ ॥ जब कभी ले आती है सरिता । गंदा पानीका प्रवाह बहता । तब कैसे सागर समा लेता । उलघास नहीं अन्य ॥ ५७ ॥ वैसे प्रीति या स-प्रमाद । मुझसे हुआ जो विरोध । या बोला कुछ भी मुकुंद । उपहासकी बात ॥ ५८ ॥ तथा देवके क्षमत्वसे क्षमा । आधार है जो सब भूत-ग्राम । इसीलिए हे श्री पुरुषोत्तम । तुझसे मांगता अल्प ॥ ५९ ॥ तभी कर तू अप्रमेय । शरणागत धनंजय । जिसे तूने अपना लिया । क्षमा कर अपराध ॥ ५६० ॥ पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥ तू है पिता स्थावर जंगमोंका तू है बड़ा ही गुरु पूजनीय । त्रिलोकमें ना तुझ तुल्य कोई कहांसे आवे अनुपमप्रभावी ॥ ४३ ॥ ३८९ विश्व-रूप-दर्शनयोग