भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 458

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥ हे आदि अनादि पुरुष ! तुझसे हंसी-विनोद किया क्षमा कर — इस विश्वका तू अनादिमूल । जहां जब मिला हंसीके बोल । बोला सगाईके नाते केवल । विनोदसे बहु ॥ ४४ ॥ आते थे हम जब तेरे सदन । पाते थे तुझसे ही बहु सम्मान । तो भी अति लगावसे जनार्दन । बैठते थे रूठके ॥ ४५ ॥ समझाना हमारे पांव छूकर । तुझसे है इस भांति चक्रधर । बैठते जैसे हटके रूठ कर । ऐसे किया बहुत ॥ ४६ ॥ आत्मीय-जन भावके नाते । उलटे हो हम थे बैठते । ऐसे प्रकार किसे सोहते । भूल हुयी स्वामी ॥ ४७ ॥ अरे ! कलावाजी कर देवसे । आखाडेमें भिडते थे मस्तीसे । सतरंजमें आ अति-क्रोधसे । लड़ते थे देव ॥ ४८ ॥ जो चाहा जो तुझसे मांगना । तुझको ही उपदेश करना । “तुझसे क्या हमारा ! ” भी बोलना । हमारी उदंडता ॥ ४९ ॥ ऐसे हैं हमारे अनंत अपराध । त्रिलोकमें नहीं समाते अगाध । तेरे चरण छू लेता कर सौगंध । था यह सब अज्ञानसे ॥ ५५० ॥ भोजनके समय देव । रखते स्मरण सदैव । किंतु मूर्ख मैं जो सगर्व । अडके बैठता ॥ ५१ ॥ खेला फिरा साथ जीमा कि सोया एकांतमें या सबके समक्ष । तथा हंसी की तुझ तुच्छ माना क्षमा करो भान तेरा किसे है ॥ ४२ ॥ ज्ञानेश्वरी ३८८