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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

जाके देवके अंतरगृहमें । खेलते शंका न लाता मनमें । इतना क्या लुढ़कता शैय्यामें । साथ ही देष ॥ ५२ ॥ कृष्ण कहके ही पुकारता । यादव कह तुझे देखता । अपनी सौगंध भी खिलाता । जाते हुए तुझे ॥ ५३ ॥ एकासन पर देव ! बैठना । सदैव तेरी अवज्ञा करना । अति-स्नेहसे ऐसा बरतना । हुवा देव ॥ ५४ ॥ इसीलिये यह क्या क्या सब । कहूं मैं स्वामी तुझसे अब । मैं हूं अपराध ढेर सब । रहा अनंत ॥ ५५ ॥ प्रभो तेरे संन्मुख या विमुख । की हैं भली बुरी बाते अनेक । मां जैसे निभाती है शिशुकी चूक । वैसे निभा लेना मुझे ॥ ५६ ॥ जब कभी ले आती है सरिता । गंदा पानीका प्रवाह बहता । तब कैसे सागर समा लेता । उलघास नहीं अन्य ॥ ५७ ॥ वैसे प्रीति या स-प्रमाद । मुझसे हुआ जो विरोध । या बोला कुछ भी मुकुंद । उपहासकी बात ॥ ५८ ॥ तथा देवके क्षमत्वसे क्षमा । आधार है जो सब भूत-ग्राम । इसीलिए हे श्री पुरुषोत्तम । तुझसे मांगता अल्प ॥ ५९ ॥ तभी कर तू अप्रमेय । शरणागत धनंजय । जिसे तूने अपना लिया । क्षमा कर अपराध ॥ ५६० ॥ पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥ तू है पिता स्थावर जंगमोंका तू है बड़ा ही गुरु पूजनीय । त्रिलोकमें ना तुझ तुल्य कोई कहांसे आवे अनुपमप्रभावी ॥ ४३ ॥ ३८९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

मुझे हुआ अब इसका ज्ञान । आता देवकी महिमा महान् । देव है यहां उत्पत्ति स्थान । चराचरका सब ॥ ६१ ॥ हरिहरादि जो है समस्त । उनका तू परम दैवत । वेदोंका भी है जो ज्ञानदात । तू ही आदि-गुरु ॥ ६२ ॥ गंभीर है तू श्रीराम । विविध भूतैक सम । सकल गुण अप्रतिम । अद्वितीय ॥ ६३ ॥ कोई नहीं है तेरे समान । यह कहनेका क्या कारण । तुझसे ही हुआ है गगन । उसमें समाया विश्व ॥ ६४ ॥ ऐसे तेरे समान है अन्य कोई । कहनेमें वाणी अत्यंत लजाई । वहां अधिककी क्या बात आई । कहनेकी देव ॥ ६५ ॥ इसीलिये त्रिभुवनमें तू एक । कोई नहीं तुझसे अधिक । तेरा महिमा ही ऐसे अलौकिक । नहीं होता बखान ॥ ६६ ॥ तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥ ऐसे कह कर जो अर्जुन । करता दंडवत नमन । आया सात्विकताका उफान । लहराकर ॥ ६७ ॥ कहता तब प्रसीद प्रसीद । वाचा होती है अतीव गद्गद् । उभार ले तू मुझे अपराध- । सागरसे देव ॥ ६८ ॥ विश्व-सुहृदको सगा मान । नहीं किया उचित सन्मान । तुझ ईश्वरमें सा-भिमान । किया प्रभुत्व ॥ ६९ ॥ इसीलिये मैं करता प्रणाम प्रसन्न हो तू स्तवनीय देव । क्षमा करो जी मुझ पुत्र मान सखा सखाको प्रिय ज्यों प्रियाको ॥ ४४ ॥ ज्ञानेश्वरी. ३९०

वर्णनीय तू प्रेमके कारण । करता सभामें मेरा वर्णन । तब सगर्व अपना बखान । करता मैं अधिक ॥ ७० ॥ ऐसे हैं कितने ही अपराध । उनकी मर्यादा नहीं गोविंद । क्षमा कर लक्ष लक्ष प्रमाद । प्रसाद रूप तू ॥ ७१ ॥ किंतु ऐसे विनय करनेमें । योग्यता कहां है देव मुझमें । शिशु जैसे पिताके दुलारमें । बोलता वैसे ही ॥ ७२ ॥ पिता पुत्रके अपराध । कितने भी हों वे अगाध । सहता है पिता निर्द्वंद्व । वैसे सह ले तू ॥ ७३ ॥ सखाकी उद्धतता । सखा शांत सहता । वैसे ही हे अनंत । सहन कर तू ॥ ७४ ॥ प्रियमैं कभी सम्मान । न करता प्रिय जान । आप उठाये रूठन । क्षमा करोजी ॥ ७५ ॥ या होता जहां जी-लगे स्नेहीका मिलन । कहा जाता जीवन संकटमें कथन । ऐसा करनेमें वहां आत्म-निवेदन । न होता संकोच ॥ ७६ ॥ जिसने किया तन-मन अर्पण । प्रेमादर-युत पतिके चरण । मिलनसे होता सर्वस्व कथन । स्वाभाविक वैसे ॥ ७७ ॥ वैसे ही देव मैंने अब । कह डाला तुझसे सब । दूसरा हेतु रहा कब । अपना स्वामी ॥ ७८ ॥ अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५ ॥ अपूर्व देखा अपरूप दृश्य तो भी बना व्याकुल चित्त मेरा । मुझे बताओ प्रभु मूळ रूप प्रसन्न हो तू जगका निवास ॥ ४५ ॥ ३९१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

फिर भी किया मैंने देवसे प्यार । मांग की विश्व-रूपकी जिद्द कर । पूर्ण की जो माय-बाप बन कर । स्नेहाथं देव ॥ ७९ ॥ गाछ जो सुर-तरुका । अंगनमें लगानेका । बाछा भी काम-धेनुका । दिया खेलने ॥ ५८० ॥ मेरा नक्षत्रोंका दांव लगाना । चंद्रको गेंद बनाके खेलना । ऐसी धुनको भी पूर्ण करना । माता बनकर ॥ ८१ ॥ अमृत-बिंदुके लिये करते यत्न । उसकी वर्षा चारमास रात दिन । जिससे हर बालका जो कणकण । चिंतामणि हुवा ॥ ८२ ॥ तूने ऐसा कृतार्थ किया । बहु अधिक स्नेह दिया । परम-ब्रह्मको दिखाया । जो नहीं सुनाथा ॥ ८३ ॥ कैसा होगा इसका प्रत्यक्ष दर्शन । न होता उपनिषदोंको आकलन । हृदयकी ऐसी जो गिरह महान । मुझसे खोली प्रभु ॥ ८४ ॥ देव ! कल्पके आदिसे । इस क्षण तक ऐसे । हुए मेरे कितनेसे । यहां जन्म ॥ ८५ ॥ किया मैंने इन जन्मोंका संपूर्ण । खोज खोज कर अवलोकन । विश्व-रूप-श्रवणका भी स्मरण । वहां नहीं मिला ॥ ८६ ॥ अजी ! बुद्धि-शक्ति या ज्ञान । न जाता जिसके अंगन । कल्पना भी अंतःकरण । कर न सकता ॥ ८७ ॥ तब इसका दर्शन होना । इसकी कैसी करें कल्पना । कभी न देखा या सुना । ऐसा हुवा कहीं ॥ ८८ ॥ ऐसा यह विश्व-रूप । दिखाया मुझे अनूप । जिससे स्वरूप-रूप । हुवा चित्त ॥ ८९ ॥ चतुर्भुज सौम्य रूप दर्शनकी कामना— अब रही एक कामना । तुझसे सानंद बात करना । तथा सामिप्यको अनुभवना । आलिंगनसे ॥ ५९० ॥ इस रूपसे यह कैसे करना । तब किस मुखसे कहो बोलना । अनंतको कैसे अंकमें भरना । नहीं होता यह देव ॥ ९१ ॥ ज्ञानेश्वरी ३९२

तमी वायुके साथ दौडना । गगनको आलिंगन देना । अथवा जल-क्रीडा करना । महा-सागरमें ॥ ९२ ॥ ऐसे करनेमें देव । भय-ग्रस्त होता जीव । विश्व-रूप तू केशव । समेट लेना ॥ ९३ ॥ घूम फिर देखना चराचर । सुखसे रहनेमें होना घर । वैसे चतुर्भुज है मनोहर । निवास देव ॥ ९४ ॥ योगाभ्यासका अनुभव । शास्त्राध्ययनका भी देव । अंतिम सिद्धांत केशव । यही एक ॥ ९५ ॥ हमने यज्ञ किये सकल । उस फलका भी यही फल । दान-पुण्यका भी है केवल । यही कारण ॥ ९६ ॥ अन्य दान-पुण्यका कारण । तीर्थ-यात्रादि जो है साधन । इसका कारण है दर्शन । चतुर्भुजका सतत ॥ ९७ ॥ चतुर्भुज दर्शनका जो चाव । बनाता उतावला केशव । वह व्याकुलता वासुदेव । दूर कर सत्वर ॥ ९८ ॥ अजी ! अंतःकरणका ज्ञाता । सकल विश्वका रचयिता । पूजित देवोंसे भी पूजित । तू हो प्रसन्न ॥ ९९ ॥ किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम् 'इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्र बाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥ जैसे नीलोत्पल रंजन । रंगता जो सदा गगन । तेजका ओज देता रत्न । इंद्र-नीलको ॥ ६०० ॥ हो तू गदा चक्र किरीट-धारी चाहूँ वही मै तव रूप देखूं । संवार कर तू अनंत बाहू चतुर्भुजा रूप बन विश्व-मूर्ते ॥ ४६ ॥ (50) ३९३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

या परिमळ आया मरगज । आनंदमें उमड आये भुज । गोदमें खेला सो मकरध्वज । हुवा सुंदर ॥ १ ॥ अजी ! मस्तकपर रखा मुकुट । मस्तक बना-मुकुटका मुकुट । अंगारमें हुवा सौंदर्य प्रकट । शरीरसे ही ॥ २ ॥ जैसे इंद्र-धनुषका जो वर्तुल । घेरता मेघको गगन-मंडल । वैसे देवके शरीरको शामल । माला वैजयंती ॥ ३ ॥ कैसी वह है उदार गदा । मोक्ष देती असुरोंको सदा । वैसे ही चक्र वह गोविंद । सोहता सौम्य तेजसे ॥ ४ ॥ वैसे ही रूप शाम-सुंदर । देखनेको शिशु है आतुर । इसीलिये प्रभु तू सत्वर । बन जा वैसे ॥ ५ ॥ विश्व-रूपका उत्सव देख । शिथिल हुई है मेरी आंख । अब हुई हैं अति उत्सुक । कृष्ण-मूर्तिके लिये ॥ ६ ॥ कृष्ण-रूप वह जो साकार । उसके बिना सूना संसार । विश्व-रूप भी जो है असार । मानती आंखें ॥ ७ ॥ भोग मोक्षमें हमें कभी कहीं । श्रीमूर्तिके बिना कुछ भी नहीं । इसीलिये अब साकार होई । समेटले यह रूप ॥ ८ ॥ भगवान उवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेंदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥ श्रीभगवानने कहा प्रसन्न होके निज-योग द्वारा तुझे दिखाया यह विश्वरूप । अनंत तेजोमय आद्य पूज्य देखा किसीने तुझसे न पूर्व ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३९४

अर्जुनका गंवारापन— सुन अर्जुनकी यह बात । विश्व-रूप हुवा जो विस्मित । कहता ऐसा अव्यवस्थित । देखा न कोई ॥ ९ ॥ कैसी वस्तु हुई यह प्राप्त । इस लाभसे न होता मुदित । कैसे भयसे करता बात । सनकी बनकर ॥ ६१० ॥ होते जब हम सहज प्रसन्न । निहाल कर देते हैं तन मन । किसे देना यह वैभव अर्जुन । ऐसा कभी हुवा क्या ॥ ११ ॥ अपना सर्वस्व बटोर । खडा किया यह सुन्दर । तेरे लिये हे धनुर्धर । विश्व-रूप ॥ १२ ॥ यही जो अपर अपार । स्वरूप मेरा परात्पर । यहींसे सब अवतार । कृष्णादिक ॥ १३ ॥ तेरे चाहके ही कारण । पगलाई है कृपा जान । औ' इस गोप्यका महान् । ध्वज उभारा ॥ १४ ॥ ज्ञान-तेजसे जो निखिल । यह विश्वात्मक केवल । अनंत रूप है अचल । सबका आद्य ॥ १५ ॥ तेरे बिना यह अर्जुन । किसीने न देखा सुना जान । नहीं इसके योग्य साधन । इसीलिये ॥ १६ ॥ न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥ बोलाइसे वेद न यज्ञ द्वारा या दान देके ना उग्र तपसे । तेरे बिना दर्शन है किसीको हुवा नहीं जो जगमें अशक्य ॥ ४८ ॥ ३९५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

इसकी खोजमें जो गये । वेद वे मौन बैठ गये । यज्ञ वैसे ही लौट आये । स्वर्गसे ही ॥ १७ ॥ साधकोंने देखा मात्र त्रास । इसीलिये सूखा योगाभ्यास । तथा स्वाध्यायमें न सौरस । रूप-दर्शनका ॥ १८ ॥ पूर्ण आचरित सत्कर्म । दौडे हो अतीव संभ्रम । करके अतिशय श्रम । पाया सत्यलोक ॥ १९ ॥ तपने देखा प्रभुत्व । छोडा अपना उग्रत्व । तप-साधनसे तत्व । रहा अपरांतर ॥ ६२० ॥ वह तूने यहां अनायाससे । देखा स्वाभाविक ही उल्हाससे । मनुष्य-लोकमें किसीको वैसे । असंभव जान ॥ २१ ॥ ध्यान-रूप संपत्तिके कारण । तू एकमेव है यहां अर्जुन । ऐसा नहीं परम-भाग्यवान । ब्रह्मदेव भी ॥ २२ ॥ मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वम् तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥ अर्जुनका अनाडीपन— तभी यह विश्व-रूप महान । इसका तू भय नहीं मान । इससे कुछ भी श्रेष्ठ महान । अपने चित्तमें ॥ २३ ॥ अजी ! छलक रहा अमृत सागर । भाग्यसे पहुंचा कोई उसके तीर । तब मरनेके भयसे तजकर । भागेगा क्या वहांसे ॥ २४ ॥ धरो नहीं व्याकुल मूढ भाव निहार मेरा वह घोर रूप । भय छोड़ तू हो प्रसन्न-चित्त निहार मेरा प्रिय पूर्व रूप ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ३९६

अथवा देखा सुवर्णका टीला । उसको उठावूं मैं कैसे भला । कहके यह उसे छोड़ चला । ऐसे होता क्या ? ॥ २५ ॥ अथवा मानो चिंतामणि मिला । इस बोझको उठावूं क्यों भला । कामधेनु पालनेका झमेला । कह छोड़ेगा कोई ? ॥ २६ ॥ अथवा घरमें आया चन्द्रमा । इससे होता है बड़ा ही उष्मा । या सूर्यसे होती छायाकी कालिमा । मान तजेंगे क्या ? ॥ २७ ॥ वैसे ऐश्वर्य जो है महा-तेज । आया तेरे हाथमें जो सहज । और तू अकुलाया अचरज । कहना क्या ? ॥ २८ ॥ अरे ! है तू कितना गंवार । तुझे कहूं क्या मैं धनुर्धर । गले मिलता छोड शरीर । छायाके तू ॥ २९ ॥ विश्व-रूप मेरा निज-रूप । वहां बनाकर मन विरूप । प्रेम करता है तू क्षुद्र-रूप । चतुर्भुजसे ॥ ६३० ॥ इतने पर भी छोड़ तू पार्थ । विश्व रूपकी यह अनास्था । इसके विषयमें धर आस्था । श्रद्धा-पूर्वक ॥ ३१ ॥ यद्यपि विश्व-रूप है भयंकर । न दीखता उसका ओर छोर । किंतु है वह निश्चयका घर । उपासनामें ॥ ३२ ॥ जैसे है कृपणकी चित्तवृत्ति । गढे धनमें उल्झी रहती । केवल शरीर करता कृति । करना वैसे ॥ ३३ ॥ अथवा अपने घकुलेमें सब जीव । उल्झाकर उडती पक्षिणी सदैव । अंतरिक्षमें करने अपना निभाव । लाचारीसे ॥ ३४॥ अथवा गाय चरती है बाहर । मन लगा है बछडेके ऊपर । वैसे तू नित्य इसपे प्रेम कर । अपने स्वामित्वसे ॥ ३५ ॥ वैसे सामान्य चित्त । सख्य-सुख निमित्त । पूज तू मूर्तिमंत । चतुर्भुज ॥ ३६ ॥ किंतु कहता हूं सुन अर्जुन । यह बात कभी नहीं न भूलना । इस स्वरूप विषय भावना । करना स्थिर ॥ ३७ ॥ ३९७ विश्व-रूप-दर्शनयोग

कभी किसीने जो देखा नहीं था। सो देख तू भय-भीत हुवा था। संचित प्रेम-सर्वस्व जो भी था। रख वह यहीं पर ॥ ३८ ॥ अब तू जैसा ही है कहता। वैसे शांत रूप मैं धरता। विश्वतोमुख यह कहता। तू निहार अब ॥ ३९ ॥ सञ्जय उवाच इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥ विश्वरूप विसर्जन -- ऐसा वाक्य कह वह तत्क्षण । मनुष्य हुवा देव विलक्षण । कहें क्या प्रेमका वह लक्षण । लीला-कौतुक ॥ ६४० ॥ श्रीकृष्ण है कैवल्यधाम प्रकट । देता है सर्वस्व विश्व-रूप श्रेष्ठ । किंतु न भाता अर्जुनको जो शिष्ट । वह रूप अद्भुत ॥ ४१ ॥ जैसे कोई वस्तु लेकर लौटाना । रत्नोंका खोट निकालते बैठना । अथवा कन्या देखकर कहना । यह मन-भाया नहीं ॥ ४२ ॥ दिखा दी उसको विश्व रूपकी जो दशा । इससे दीखता प्रेम विकास है कैसा । देवने दिया रहस्यमय उपदेश । धनंजयको ॥ ४३ ॥ सुवर्णका घड गलाकर । किया जो आभूषण सुन्दर । नहीं हुवा उसका स्वीकार । गलाया पुनः ॥ ४४ ॥ संजयने कहा ऐसा कहा श्रीहरिने तुरंत तथा दिखाया वह पूर्व-रूप । आश्वस्त करने डरे हुएको हुवा पुनः सौम्य उदार देव ॥ ५० ॥ ज्ञानेश्वरी ३९८

वैसे शिष्यके प्रेममें आकर । कृष्णत्वको पूर्ण गलाकर । लिया जो विश्व-रूप भयंकर । बना फिर श्रीकृष्ण ॥ ४५ ॥ अजी ! शिष्यका दिया यह त्रास । सहनेवाले गुरु कहां कौन देश । न जाने कैसे हरिका प्रेम-विकास ! कहता है संजय ॥ ४६ ॥ विश्व-रूपका यह योग विस्तार । समा लिया अपनेमें ही सत्वर । तथा प्रकटा कृष्ण-रूप सुन्दर । क्षण भरमें ॥ ४७ ॥ जैसे त्वं पद होता संपूर्ण । तत् पदमें लीन सर्व रूपेण । वृक्ष मिटा होता बीज-कण । यह उसी भांति ॥ ४८ ॥ अथवा स्वप्न-संभ्रम जैसा । निगलता जागृत जीव-दशा । श्रीकृष्णने योग-विस्तार वैसा । समा लिया अपनेमें ॥ ४९ ॥ जैसे सूर्यादिका तेज बिंबमें । घनादिका जल गगनमें । ज्वारका जल सब समुद्रमें । वैसे नरेंद्र ॥ ५० ॥ अथवा कृष्ण रूपका थान । खोल दिया विश्व-रूप दर्शन । दिखाता स-कौतुक जनार्दन । प्रिय अर्जुनको ॥ ५१ ॥ मानो तब उसका आकार प्रकार । गाहक कहता है देखकर । यह नहीं हमारे मन अनुसार । और समेटा थान ॥ ५२ ॥ अपना पसारा फैलाकर । विश्वको किया सहज पार । उसे समेट हुवा साकार । बना मन-मोहन ॥ ५३ ॥ वह भाग्य अर्जुनको मिला जो किसीको नहीं मिला था— अथवा हुवा अनंत । जैसे था बना जो सांत । पार्थको करने शांत । था जो अधीर ॥ ५४ ॥ जैसे देखता है स्वर्ग स्वप्नमें । जगते ही पाता बिछावनमें । ऐसे ही पार्थको क्षण-भरमें । हुवा अति विस्मय ॥ ५५ ॥ अथवा गुरु-कृपासे संपूर्ण । प्रपंच-ज्ञान होता है क्षीण । तथा होता पर-ब्रह्म स्फुरण । वैसा देखा कृष्ण-रूप ॥ ५६ ॥ सोचता था पार्थ चितमें एक । विश्व-रूपके परदेको रोक । वह गया बड़ा ही हुवा नेक । मेरे हितमें ॥ ५७ ॥ ३९९ · विश्व रूप-दर्शनयोग

आया जैसे कालको जीतकर । अथवा बवंडर चीरकर । या सप्त-सागर तैरकर । अपने बाहूसे ॥ ५८ ॥ उसे हुआ ऐसा अति-संतोष । माना पार्थने परम-उल्लास । देख कर श्रीकृष्णको स-हास । विश्व-रूपके नंतर ॥ ५९ ॥ सूर्यके होते ही अस्तमान । नक्षत्रोंसे भरता गगन । वैसे देखने लगा अर्जुन । लोगों सह पृथ्वी ॥ ६६० ॥ देखता वैसे ही कुरु-क्षेत्र । दोनों ओर हैं वैसे सगोत्र । रण-सज्ज वीर ले शस्त्रास्त्र । चलाते हुए ॥ ६१ ॥ रण-मध्यमें वहां सब शांत । वैसा ही रथ खडा है रक्षित । बैठा है उसमें श्रीलक्ष्मी-कांत । अपने पास ॥ ६२ ॥ अर्जुन उवाच दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥ एवं पहले जैसे था वैसे । देखा यह वीर्य-विलाससे । फिर कहता जिया मैं ऐसे । हुवा अब ॥ ६३ ॥ बुद्धिको छोड कर ज्ञान । भयसे गया था जो वन । अहंकार सह है मन । भाग गया था ॥ ६४ ॥ इन्द्रियां प्रवृत्ति भूल गयी थीं । भाषा प्राणसे वंचित हुई थीं । शरीर-ग्राममें अव्यवस्था थी । अभूतपूर्व ॥ ६५ ॥ हुवे वे सब अब प्रफुल्लित । प्रकृति हुई फिरसे जीवित । अब हुवा पुनरुज्जीवित । ऐसे लगता मुझे ॥ ६६ ॥ जीवने ऐसा सुख पा लिया । फिर कृष्णसे है कह दिया । मैंने तेरा वह जो पा लिया । यह मानवी रूप ॥ ६७ ॥ अर्जुनने कहा देखके यह जो सौम्य मानवी-रूप माधव । हुवा प्रसन्न औ' शांत आया मैं निज भावमें ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी ४००

देवेश ! तूने यह रूप दिखाकर । मुझ राह भूले शिशुको बुलाकर । माताने मानो स्नेहसे गोद लेकर । कराया स्तन-पान ॥ ६८ ॥ अजी ! महा सागरमें विश्व-रूपके । जूझ रहा था हमलोंसे तरंगोंके । अब पा लिया किनारा निज-मूर्ति के । दर्शनानुग्रहसे देव ॥ ६९ ॥ सुन तू यह द्वारकापुराध्यक्ष । विश्व रूपसे मानो सूखा था वृक्ष । इस दर्शनसे तूने की है रक्षा । प्रेम-मेघ-वर्षासे ॥ ६७० ॥ तृषार्थिको जैसे मिला अपार । लहराता अमृत-सिंधु तीर । जीनेका संदेह हुवा है दूर । इस दर्शनसे ॥ ७१ ॥ मेरे हृदयांगणमें आज । खिली आनंद-लता सहज । सुख-दर्शनका हुवा साज । मुझको तेरे ॥ ७२ ॥ भगवान उवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२ ॥ पार्थके ऐसे बोलको सुन । ऐसे क्यों कहता जनार्दन । तू आ-प्रेमका दृढ स्थान मान । विश्व-रूप वह ॥ ७३ ॥ सदैव यहां मूर्ति-दर्शन । करना केवल लेके तन । भूला तू मेरा यह कथन । सुभद्रापति ॥ ७४ ॥ केवल अनन्य भक्तिसे ही यह मिलता है— अरे ! ऐसा कैसा तू अंधा अर्जुन । हाथ आया स्वर्गका मेरु महान । कहता है वह ओछा तेरा मन । यह है भ्रम-भाव ॥ ७५ ॥ रूप है जो मेरा विश्वात्मक । दिखाया तुझे प्रेम-पूर्वक । शंभूने किये तप अनेक । किंतु न पा सका वह ॥ ७६ ॥ तथा संकटमें अष्टांग-योगके । पडते हैं योगी आशासे इसके । किंतु नहीं पाते भाग्य दर्शनके । इसके कभी वे ॥ ७७ ॥ श्री भगवानने कहा देखा तूने वह मेरा अति दुर्लभ दर्शन । चाहते देव भी नित्य वह स्वरूप दर्शन ॥ ५२ ॥ ४०१ विश्व-रूप-दर्शनयोग (51)

विश्व-रूप कभी किसी काल । देखेंगे अणुमात्र केवल । इस आशासे देव सकल । करते हैं चिंतन ॥ ७८ ॥ अंजली जैसे आशाकी । माथे पर ले सदाकी । निहारते आकाशकी । राह चातक ॥ ७९ ॥ ऐसे उत्कंठासे भरकर । देखते हैं सदा सुर नर । निहारते हैं आठो प्रहर । उसके दर्शनार्थ ॥ ८० ॥ फिर भी विश्व-रूप सरीखा । स्वप्न भी किसीने नहीं देखा । प्रत्यक्ष मिला जो वह सुख । तुझको यहां ॥ ८१ ॥ नाहं वेदैर्न तपसा न दाने न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥ वहां पहुंचनेका साधन । कोई नहीं जान तू अर्जुन । वेद सहित षड्दर्शन । व्यर्थ है वहां ॥ ८२ ॥ करने विश्व-रूप दर्शन । करनेमें सब तपको जान । अशक्य पानेमें वह स्थान । धनंजय ॥ ८३ ॥ तथा जैसे देखा तूने सविस्तर । वैसे ज्ञान यज्ञसे भी धनुर्धर । निहारना जान तू अति दुस्तर । किसीको भी ॥ ८४ ॥ इसका है एक ही प्रकार । सुन तू यह चित्त देकर । चित्त करता जब स्वीकार । भक्तिको नित्य ॥ ८५ ॥ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥ ५४ ॥ वह भी भक्ति है कैसी । वर्षा न जानती जैसी । दूसरा आसरा वैसी । धरती बिन ॥ ८६ ॥ तप यज्ञ किया दान तथा अभ्यास वेदका । तो भी दर्शन है मेरा अशक्य जो तुझे मिला ॥ ५३ ॥ अनन्य भक्तिसे शक्य मेरा है ज्ञान दर्शन । तत्वता जानना पाना प्रवेश मुझमें फिर ॥ ५४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०२

या सकल जल संपत्ति । लेकर सागरमें जाती । जैसे गंगा अनन्य-गति । लय हो मिलती है ॥ ८७ ॥ वैसे सर्व भाव सहित । होकर अति स्नेह-सिक्त । रहना मुझमें हो रत । मेरे ही रूपमें ॥ ८८ ॥ तथा मैं रहता ऐसा । क्षीर-सागरमें है जैसा । तटपे मध्यमें एकसा । रहता है दूध ॥ ८९ ॥ मुझसे चींटी पर्यंत । चराचरमें समस्त । भजनमें नहीं भ्रांत । होता कभी ॥ ६९० । उसी क्षणसे है होती । विश्व-रूपकी प्रतीति । नयन सम्मुख आती । मूर्ति विश्व-रूपकी ॥ ९१ ॥ ईंधनसे जैसे अग्नि प्रदीप्त । होनेसे होता ईंधन समाप्त । तथा ईंधन ही अग्नि बन व्याप्त । होता है वैसे ॥ ९२ ॥ सूर्यके अभावसे जैसे अंबर । बन जाता है स्वयं ही अंधकार । सूर्योदयसे होता है तेजाकार । पूर्णरूपसे वह ॥ ९३ ॥ वैसे है मेरा साक्षात्कार । दूर करता अहंकार । तथा मिटता द्वैताकार । सहज भावसे ॥ ९४ ॥ फिर मैं वह यह संपूर्ण । बनता है जो एक रूपेण । तथा एक भाव एक गुण । होता है समरस ॥ ९५ ॥ मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पांडव ॥ ५५ ॥ मेरे लिए ही जो सतत । करता कर्म समर्पित । मेरे बिन उसे जगत । लगता सूना ॥ ९६ ॥ दृश्यादृश्य उसे सकल । जो कुछ है मैं ही केवल । उसका जीनेका जो फल । मेरा ही नाम ॥ ९७ ॥ मग्न जो कर्ममें मेरे भक्तिसे है भरा हुआ । असंग सर्व-निर्वैर पाता हो मुझ मत्पर ॥ ५५ ॥ ४०३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

प्राणि-मात्रोंकी बातको भूल । सर्वत्र देखता मुझे ही केवल । इसीलिये होता निर्वैर सकल । विश्वको भजता ॥ ९८ ॥ अजी ! होता है जो ऐसा भक्त । होनेपे उसका देह-पात । मैं ही हो जाता है वह पार्थ । पूर्ण रूपसे ॥ ९९ ॥ अगले अध्यायकी भूमिका— ऐसा वह विश्वोदर तोंदल । वैसे ही करुणा-रस रसाल । श्रीकृष्ण बोला ऐसे मधुबोल । कहता संजय ॥ ७०० ॥ सुनकर यह पांडुकुमार । आनंद-संपदामें भरकर । श्रीहरि पद-कमल-भ्रमर । मान अपनेको ॥ १ ॥ उसने देखली वे दोनो मूर्ति । अपने चितमें भरी आकृति । तब विश्व-रूपसे कृष्णाकृति । लगी सुंदर ॥ २ ॥ किंतु उसका बना जो ज्ञान । अमान्य करता जनार्दन । व्यापकसे न होता महान । कभी रूप एक ॥ ३ ॥ करनेमें समर्थन । इसका श्री भगवान । कहता है दो वचन । अर्जुनसे ॥ ४ ॥ उन्हें सुनकर अर्जुन । चितमें करता चिंतन । इसमें बड़ा है कौन । पूछें इनसे ॥ ५ ॥ ऐसा सोचकर चितमें पार्थ । करेगा प्रश्न जो अब उचित । सुनेंगे अब हम जो खचित । अगले निरूपणमें ॥ ६ ॥ प्रांजल ओवी प्रबंध । कहा मैंने स-विनोद । यह निवृत्ति प्रसाद । कहे ज्ञानदेव ॥ ७ ॥ भरके सद्भावनाकी अंजली । मैंने ओवी सुमन भरी खुली । अर्पण की हे चरण युगली । विश्व-रूपके ॥ ८ ॥ गीता श्लोक ५५ ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८. ॐ

१२ भक्तियोग मातृ-रूपसे गुरुका वन्दन— जय-जय हे शुद्धे । उदारतम प्रसिद्ध । अनवरत आनन्दे । वर्षा कर ॥ १ ॥ विषयव्यालका जकडनव । विषतम भ्रमका अंजन । गुरु-कृपाके स्निग्ध-नयन । निर्विष करेंगे ॥ २ ॥ झुरसा हो कैसे ही तापमें । या जला हो कैसे हि शोकमें । तव कृपा-रस-कल्लोलमें । होंगे शीतल ॥ ३ ॥ अजी ! योग-सुखका उमंग । तव स्नेह-रसके तरंग । सोऽहं सुख सिद्धिसें अंतरंग । भर देते हैं ॥ ४ ॥ आधार शक्तिकी गोदमें । बढाती प्रेम-सुख-मोदमें । हृदयाकाश पालनेमें । झुलाती सदा ॥ ५ ॥ उतारती प्रागज्योतिकी आरति । मन पवन खिलौनोंसे खिलाती । आत्म-सुख अलंकारसे सजाती । बालकको नित ॥ ६ ॥ सत्रहवींका स्तन्य देती । अनाहतके गीत गाती । समाधि-बोधमें सुलाती । समझाके ॥ ७ ॥ तभी तू साधकोंकी मां कहलाती । चरणमें साहित्य-लता खिलती । तब चरण तलकी छाया ही गति । सर्वदा मुझे ॥ ८ ॥ अजी ! सद्गुरुकी कृपा-दृष्टि । तब कारुण्य जिसकी अधिष्ठी । सकल विद्याओंकी जो सृष्टि । धात्री ही है ॥ ९ ॥

तभी हे अंबे श्रीमंते । निज-जन कल्पलते । आज्ञा दे तू मुझे माते । ग्रन्थ-निरूपणकी ॥ १० ॥ नव-रसके भरे सागर । जो हैं महा रत्नोंके आगर । भावार्थके ऊँचे गिरिवर । उठ आयेंगे ॥ ११ ॥ साहित्य सुवर्णकी खान । हो देश-भाषाका अंगन । विवेक-वल्लीका उद्यान । लगे सर्वत्र ॥ १२ ॥ संवाद-फल निधान । प्रमेयोंका उपवन । लगे सर्वत्र गहन । निरंतर ॥ १३ ॥ पटे पाखंडकी खायी महान । मिटे वाग्वाद सब अर्थ-शून्य । भगे कुतर्कके दुष्ट-श्वान । सदाके लिए ॥ १४ ॥ मेरा चित्त सदैव श्री कृष्ण गुणवर्णनमें समर्थ हो— श्रीकृष्ण-गुणगानमें चित्त । रहे मेरा सर्वदा समर्थ । श्रोता श्रवणासनपे रत । रहे निरंतर ॥ १५ ॥ त्रिभुवनके सभी नगर । बने ब्रह्मविद्याका आगर । लेन-देनका रहे आधार । सुविचार मात्र ॥ १६ ॥ मां अपने स्नेहांचलमें । संभालो सर्वदा गोदमें । वहां यह सब लीलामें । उपजाऊँ मैं ॥ १७ ॥ इस विनयसे रीझ उठी । श्रीगुरुकी अनुग्रह-दृष्टि । कहा कर अब गीता गोष्ठि । न बोल अन्य ॥ १८ ॥ वहांका यह महा-प्रसाद । पाकर हुआ महदानन्द । अब कहूँगा गीता-प्रबंध । सुनियेजी ॥ १९ ॥ अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ । विलीन तुझमें होके भजता भक्त जो तुझे । कोई अक्षर अव्यक्त योगियोंमें श्रेष्ठ कौन हैं ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०६

ईश्वर प्राप्तिके दो मार्ग— तब सकल वीराधिराज । सोम-वंशका विजयध्वज । बोलने लगा वह आत्मज । पांडु नृपतिका ॥ २० ॥ कृष्ण ! मैने किया श्रवण । तथा विश्वरूप दर्शन । भय-ग्रस्त हुआ जी मन । देख अद्भुत ॥ २१ ॥ कृष्ण-मूर्तिका है रूप सुन्दर । जिसका किया चितने आधार । श्रीकृष्ण तूने ना कहकर । दूर किया मुझसे ॥ २२ ॥ अजी ! व्यक्त तथा अव्यक्त । एकमात्र तू है निर्भ्रांत । भक्तिसे जो मिलता व्यक्त । अव्यक्त योगसे ॥ २३ ॥ अजी ! ये हैं दो ही पथ । दर्शनार्थिको उचित । द्वारमें व्यक्त अव्यक्त । पहुंचाते जो ॥ २४ ॥ कस होता है जो तोला स्वर्णका । वही कस होता एक रत्तिका । इसीलिए जो है एक व्यापक । दूसरा है सीमित ॥ २५ ॥ जो महानता अमृत व सिंधुकी । वही शक्ति है अमृत-बिंदुकी । करनेसे आचमन दोनोंकी । मिलती एकसे जो ॥ २६ ॥ इन दोनोंसे तत्वतः तुझे कौन जानता है ?— बात है यह मेरा चित्त । प्रतीत करता निश्चित । जानना चाहूं तेरा मत । योगेश्वर ॥ २७ ॥ श्रीकृष्ण तूने क्षण एक । स्वीकार किया जो व्यापक । यथार्थमें था या कौतुक । जिज्ञासासे ॥ २८ ॥ तेरे लिए ही सब कर्म । तु ही है जिनका परम । भक्तका यह मनो-धर्म । सर्व-समर्पण ॥ २९ ॥ तथा अन्य सब भांति । तुझको ही मान गति । दृढ़ कर यह मति । भजते तुझे ॥ ३० ॥ तथा जो प्रणवके उस पार । वैखरीके लिए भी जो है पर । उपमा रहित औ' निराकार । वस्तु है जो ॥ ३१ ॥ ४०७ भक्तियोग

वह है अक्षर औ' अव्यक्त । तथा निर्देश देश रहित । तत्वऽमसि भावसे पूजित । ज्ञानियोंसे ॥ ३२ ॥ योगी या भक्तमें तत्वता । तुमको कौन है जानता । कह तू मुझको अनंता । इस समय ॥ ३३ ॥ सुन अर्जुनकी यह बात । जगद्बन्धु हो प्रसन्न चित्त । कहे करना प्रश्न उचित । जानता तू ॥ ३४ ॥ भगवान उवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २ ॥ दिन रात मेरा चिंतन करनेवाला भक्त मुझे जानता है - जैसे अस्ताचलके समीप । गये रवि-बिंबके आतप । रविके पीछे अपने आप । चलता वैसे ॥ ३५ ॥ वर्षा-ऋतुकी जो सरिता । चढ़ती जाती पांडुसुता । वैसी नित्य-नूतन आस्था । दीखे भजनमें ॥ ३६ ॥ मिलन स्थलमें जैसे सागर । गंगा-प्रवाह होता अनिवार । वैसा आता है अनिवार पूर । प्रेम-भावका ॥ ३७ ॥ वैसे जो सर्वेंद्रिय सहित । नित रहता मुझमें रत । स्मरता रहता दिन-रात । न जानकर भी ॥ ३८ ॥ इस प्रकार है जो भक्त । कर सर्वस्व समर्पित । उसको ही मैं योगयुक्त । मानता श्रेष्ठ ॥ ३९ ॥ ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥ मुझमें मनको रोप भजता नित्य जो मुझे । जुड़ा परम श्रद्धासे उसे मैं श्रेष्ठ मानता ॥ २ ॥ जो है अचिंत्य अव्यक्त सर्व-व्यापी अवर्णित । नित्य निश्चल निर्लिप्त जो अक्षर उपासता ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०८