भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तमी वायुके साथ दौडना । गगनको आलिंगन देना । अथवा जल-क्रीडा करना । महा-सागरमें ॥ ९२ ॥ ऐसे करनेमें देव । भय-ग्रस्त होता जीव । विश्व-रूप तू केशव । समेट लेना ॥ ९३ ॥ घूम फिर देखना चराचर । सुखसे रहनेमें होना घर । वैसे चतुर्भुज है मनोहर । निवास देव ॥ ९४ ॥ योगाभ्यासका अनुभव । शास्त्राध्ययनका भी देव । अंतिम सिद्धांत केशव । यही एक ॥ ९५ ॥ हमने यज्ञ किये सकल । उस फलका भी यही फल । दान-पुण्यका भी है केवल । यही कारण ॥ ९६ ॥ अन्य दान-पुण्यका कारण । तीर्थ-यात्रादि जो है साधन । इसका कारण है दर्शन । चतुर्भुजका सतत ॥ ९७ ॥ चतुर्भुज दर्शनका जो चाव । बनाता उतावला केशव । वह व्याकुलता वासुदेव । दूर कर सत्वर ॥ ९८ ॥ अजी ! अंतःकरणका ज्ञाता । सकल विश्वका रचयिता । पूजित देवोंसे भी पूजित । तू हो प्रसन्न ॥ ९९ ॥ किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम् 'इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्र बाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥ जैसे नीलोत्पल रंजन । रंगता जो सदा गगन । तेजका ओज देता रत्न । इंद्र-नीलको ॥ ६०० ॥ हो तू गदा चक्र किरीट-धारी चाहूँ वही मै तव रूप देखूं । संवार कर तू अनंत बाहू चतुर्भुजा रूप बन विश्व-मूर्ते ॥ ४६ ॥ (50) ३९३ विश्व-रूप-दर्शनयोग