भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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या परिमळ आया मरगज । आनंदमें उमड आये भुज । गोदमें खेला सो मकरध्वज । हुवा सुंदर ॥ १ ॥ अजी ! मस्तकपर रखा मुकुट । मस्तक बना-मुकुटका मुकुट । अंगारमें हुवा सौंदर्य प्रकट । शरीरसे ही ॥ २ ॥ जैसे इंद्र-धनुषका जो वर्तुल । घेरता मेघको गगन-मंडल । वैसे देवके शरीरको शामल । माला वैजयंती ॥ ३ ॥ कैसी वह है उदार गदा । मोक्ष देती असुरोंको सदा । वैसे ही चक्र वह गोविंद । सोहता सौम्य तेजसे ॥ ४ ॥ वैसे ही रूप शाम-सुंदर । देखनेको शिशु है आतुर । इसीलिये प्रभु तू सत्वर । बन जा वैसे ॥ ५ ॥ विश्व-रूपका उत्सव देख । शिथिल हुई है मेरी आंख । अब हुई हैं अति उत्सुक । कृष्ण-मूर्तिके लिये ॥ ६ ॥ कृष्ण-रूप वह जो साकार । उसके बिना सूना संसार । विश्व-रूप भी जो है असार । मानती आंखें ॥ ७ ॥ भोग मोक्षमें हमें कभी कहीं । श्रीमूर्तिके बिना कुछ भी नहीं । इसीलिये अब साकार होई । समेटले यह रूप ॥ ८ ॥ भगवान उवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेंदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥ श्रीभगवानने कहा प्रसन्न होके निज-योग द्वारा तुझे दिखाया यह विश्वरूप । अनंत तेजोमय आद्य पूज्य देखा किसीने तुझसे न पूर्व ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३९४