ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
या परिमळ आया मरगज । आनंदमें उमड आये भुज । गोदमें खेला सो मकरध्वज । हुवा सुंदर ॥ १ ॥ अजी ! मस्तकपर रखा मुकुट । मस्तक बना-मुकुटका मुकुट । अंगारमें हुवा सौंदर्य प्रकट । शरीरसे ही ॥ २ ॥ जैसे इंद्र-धनुषका जो वर्तुल । घेरता मेघको गगन-मंडल । वैसे देवके शरीरको शामल । माला वैजयंती ॥ ३ ॥ कैसी वह है उदार गदा । मोक्ष देती असुरोंको सदा । वैसे ही चक्र वह गोविंद । सोहता सौम्य तेजसे ॥ ४ ॥ वैसे ही रूप शाम-सुंदर । देखनेको शिशु है आतुर । इसीलिये प्रभु तू सत्वर । बन जा वैसे ॥ ५ ॥ विश्व-रूपका उत्सव देख । शिथिल हुई है मेरी आंख । अब हुई हैं अति उत्सुक । कृष्ण-मूर्तिके लिये ॥ ६ ॥ कृष्ण-रूप वह जो साकार । उसके बिना सूना संसार । विश्व-रूप भी जो है असार । मानती आंखें ॥ ७ ॥ भोग मोक्षमें हमें कभी कहीं । श्रीमूर्तिके बिना कुछ भी नहीं । इसीलिये अब साकार होई । समेटले यह रूप ॥ ८ ॥ भगवान उवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेंदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥ श्रीभगवानने कहा प्रसन्न होके निज-योग द्वारा तुझे दिखाया यह विश्वरूप । अनंत तेजोमय आद्य पूज्य देखा किसीने तुझसे न पूर्व ॥ ४७ ॥ ज्ञानेश्वरी ३९४
अर्जुनका गंवारापन— सुन अर्जुनकी यह बात । विश्व-रूप हुवा जो विस्मित । कहता ऐसा अव्यवस्थित । देखा न कोई ॥ ९ ॥ कैसी वस्तु हुई यह प्राप्त । इस लाभसे न होता मुदित । कैसे भयसे करता बात । सनकी बनकर ॥ ६१० ॥ होते जब हम सहज प्रसन्न । निहाल कर देते हैं तन मन । किसे देना यह वैभव अर्जुन । ऐसा कभी हुवा क्या ॥ ११ ॥ अपना सर्वस्व बटोर । खडा किया यह सुन्दर । तेरे लिये हे धनुर्धर । विश्व-रूप ॥ १२ ॥ यही जो अपर अपार । स्वरूप मेरा परात्पर । यहींसे सब अवतार । कृष्णादिक ॥ १३ ॥ तेरे चाहके ही कारण । पगलाई है कृपा जान । औ' इस गोप्यका महान् । ध्वज उभारा ॥ १४ ॥ ज्ञान-तेजसे जो निखिल । यह विश्वात्मक केवल । अनंत रूप है अचल । सबका आद्य ॥ १५ ॥ तेरे बिना यह अर्जुन । किसीने न देखा सुना जान । नहीं इसके योग्य साधन । इसीलिये ॥ १६ ॥ न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥ बोलाइसे वेद न यज्ञ द्वारा या दान देके ना उग्र तपसे । तेरे बिना दर्शन है किसीको हुवा नहीं जो जगमें अशक्य ॥ ४८ ॥ ३९५ विश्व-रूप-दर्शनयोग
इसकी खोजमें जो गये । वेद वे मौन बैठ गये । यज्ञ वैसे ही लौट आये । स्वर्गसे ही ॥ १७ ॥ साधकोंने देखा मात्र त्रास । इसीलिये सूखा योगाभ्यास । तथा स्वाध्यायमें न सौरस । रूप-दर्शनका ॥ १८ ॥ पूर्ण आचरित सत्कर्म । दौडे हो अतीव संभ्रम । करके अतिशय श्रम । पाया सत्यलोक ॥ १९ ॥ तपने देखा प्रभुत्व । छोडा अपना उग्रत्व । तप-साधनसे तत्व । रहा अपरांतर ॥ ६२० ॥ वह तूने यहां अनायाससे । देखा स्वाभाविक ही उल्हाससे । मनुष्य-लोकमें किसीको वैसे । असंभव जान ॥ २१ ॥ ध्यान-रूप संपत्तिके कारण । तू एकमेव है यहां अर्जुन । ऐसा नहीं परम-भाग्यवान । ब्रह्मदेव भी ॥ २२ ॥ मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वम् तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥ अर्जुनका अनाडीपन— तभी यह विश्व-रूप महान । इसका तू भय नहीं मान । इससे कुछ भी श्रेष्ठ महान । अपने चित्तमें ॥ २३ ॥ अजी ! छलक रहा अमृत सागर । भाग्यसे पहुंचा कोई उसके तीर । तब मरनेके भयसे तजकर । भागेगा क्या वहांसे ॥ २४ ॥ धरो नहीं व्याकुल मूढ भाव निहार मेरा वह घोर रूप । भय छोड़ तू हो प्रसन्न-चित्त निहार मेरा प्रिय पूर्व रूप ॥ ४९ ॥ ज्ञानेश्वरी ३९६
अथवा देखा सुवर्णका टीला । उसको उठावूं मैं कैसे भला । कहके यह उसे छोड़ चला । ऐसे होता क्या ? ॥ २५ ॥ अथवा मानो चिंतामणि मिला । इस बोझको उठावूं क्यों भला । कामधेनु पालनेका झमेला । कह छोड़ेगा कोई ? ॥ २६ ॥ अथवा घरमें आया चन्द्रमा । इससे होता है बड़ा ही उष्मा । या सूर्यसे होती छायाकी कालिमा । मान तजेंगे क्या ? ॥ २७ ॥ वैसे ऐश्वर्य जो है महा-तेज । आया तेरे हाथमें जो सहज । और तू अकुलाया अचरज । कहना क्या ? ॥ २८ ॥ अरे ! है तू कितना गंवार । तुझे कहूं क्या मैं धनुर्धर । गले मिलता छोड शरीर । छायाके तू ॥ २९ ॥ विश्व-रूप मेरा निज-रूप । वहां बनाकर मन विरूप । प्रेम करता है तू क्षुद्र-रूप । चतुर्भुजसे ॥ ६३० ॥ इतने पर भी छोड़ तू पार्थ । विश्व रूपकी यह अनास्था । इसके विषयमें धर आस्था । श्रद्धा-पूर्वक ॥ ३१ ॥ यद्यपि विश्व-रूप है भयंकर । न दीखता उसका ओर छोर । किंतु है वह निश्चयका घर । उपासनामें ॥ ३२ ॥ जैसे है कृपणकी चित्तवृत्ति । गढे धनमें उल्झी रहती । केवल शरीर करता कृति । करना वैसे ॥ ३३ ॥ अथवा अपने घकुलेमें सब जीव । उल्झाकर उडती पक्षिणी सदैव । अंतरिक्षमें करने अपना निभाव । लाचारीसे ॥ ३४॥ अथवा गाय चरती है बाहर । मन लगा है बछडेके ऊपर । वैसे तू नित्य इसपे प्रेम कर । अपने स्वामित्वसे ॥ ३५ ॥ वैसे सामान्य चित्त । सख्य-सुख निमित्त । पूज तू मूर्तिमंत । चतुर्भुज ॥ ३६ ॥ किंतु कहता हूं सुन अर्जुन । यह बात कभी नहीं न भूलना । इस स्वरूप विषय भावना । करना स्थिर ॥ ३७ ॥ ३९७ विश्व-रूप-दर्शनयोग
कभी किसीने जो देखा नहीं था। सो देख तू भय-भीत हुवा था। संचित प्रेम-सर्वस्व जो भी था। रख वह यहीं पर ॥ ३८ ॥ अब तू जैसा ही है कहता। वैसे शांत रूप मैं धरता। विश्वतोमुख यह कहता। तू निहार अब ॥ ३९ ॥ सञ्जय उवाच इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥ विश्वरूप विसर्जन -- ऐसा वाक्य कह वह तत्क्षण । मनुष्य हुवा देव विलक्षण । कहें क्या प्रेमका वह लक्षण । लीला-कौतुक ॥ ६४० ॥ श्रीकृष्ण है कैवल्यधाम प्रकट । देता है सर्वस्व विश्व-रूप श्रेष्ठ । किंतु न भाता अर्जुनको जो शिष्ट । वह रूप अद्भुत ॥ ४१ ॥ जैसे कोई वस्तु लेकर लौटाना । रत्नोंका खोट निकालते बैठना । अथवा कन्या देखकर कहना । यह मन-भाया नहीं ॥ ४२ ॥ दिखा दी उसको विश्व रूपकी जो दशा । इससे दीखता प्रेम विकास है कैसा । देवने दिया रहस्यमय उपदेश । धनंजयको ॥ ४३ ॥ सुवर्णका घड गलाकर । किया जो आभूषण सुन्दर । नहीं हुवा उसका स्वीकार । गलाया पुनः ॥ ४४ ॥ संजयने कहा ऐसा कहा श्रीहरिने तुरंत तथा दिखाया वह पूर्व-रूप । आश्वस्त करने डरे हुएको हुवा पुनः सौम्य उदार देव ॥ ५० ॥ ज्ञानेश्वरी ३९८
वैसे शिष्यके प्रेममें आकर । कृष्णत्वको पूर्ण गलाकर । लिया जो विश्व-रूप भयंकर । बना फिर श्रीकृष्ण ॥ ४५ ॥ अजी ! शिष्यका दिया यह त्रास । सहनेवाले गुरु कहां कौन देश । न जाने कैसे हरिका प्रेम-विकास ! कहता है संजय ॥ ४६ ॥ विश्व-रूपका यह योग विस्तार । समा लिया अपनेमें ही सत्वर । तथा प्रकटा कृष्ण-रूप सुन्दर । क्षण भरमें ॥ ४७ ॥ जैसे त्वं पद होता संपूर्ण । तत् पदमें लीन सर्व रूपेण । वृक्ष मिटा होता बीज-कण । यह उसी भांति ॥ ४८ ॥ अथवा स्वप्न-संभ्रम जैसा । निगलता जागृत जीव-दशा । श्रीकृष्णने योग-विस्तार वैसा । समा लिया अपनेमें ॥ ४९ ॥ जैसे सूर्यादिका तेज बिंबमें । घनादिका जल गगनमें । ज्वारका जल सब समुद्रमें । वैसे नरेंद्र ॥ ५० ॥ अथवा कृष्ण रूपका थान । खोल दिया विश्व-रूप दर्शन । दिखाता स-कौतुक जनार्दन । प्रिय अर्जुनको ॥ ५१ ॥ मानो तब उसका आकार प्रकार । गाहक कहता है देखकर । यह नहीं हमारे मन अनुसार । और समेटा थान ॥ ५२ ॥ अपना पसारा फैलाकर । विश्वको किया सहज पार । उसे समेट हुवा साकार । बना मन-मोहन ॥ ५३ ॥ वह भाग्य अर्जुनको मिला जो किसीको नहीं मिला था— अथवा हुवा अनंत । जैसे था बना जो सांत । पार्थको करने शांत । था जो अधीर ॥ ५४ ॥ जैसे देखता है स्वर्ग स्वप्नमें । जगते ही पाता बिछावनमें । ऐसे ही पार्थको क्षण-भरमें । हुवा अति विस्मय ॥ ५५ ॥ अथवा गुरु-कृपासे संपूर्ण । प्रपंच-ज्ञान होता है क्षीण । तथा होता पर-ब्रह्म स्फुरण । वैसा देखा कृष्ण-रूप ॥ ५६ ॥ सोचता था पार्थ चितमें एक । विश्व-रूपके परदेको रोक । वह गया बड़ा ही हुवा नेक । मेरे हितमें ॥ ५७ ॥ ३९९ · विश्व रूप-दर्शनयोग
आया जैसे कालको जीतकर । अथवा बवंडर चीरकर । या सप्त-सागर तैरकर । अपने बाहूसे ॥ ५८ ॥ उसे हुआ ऐसा अति-संतोष । माना पार्थने परम-उल्लास । देख कर श्रीकृष्णको स-हास । विश्व-रूपके नंतर ॥ ५९ ॥ सूर्यके होते ही अस्तमान । नक्षत्रोंसे भरता गगन । वैसे देखने लगा अर्जुन । लोगों सह पृथ्वी ॥ ६६० ॥ देखता वैसे ही कुरु-क्षेत्र । दोनों ओर हैं वैसे सगोत्र । रण-सज्ज वीर ले शस्त्रास्त्र । चलाते हुए ॥ ६१ ॥ रण-मध्यमें वहां सब शांत । वैसा ही रथ खडा है रक्षित । बैठा है उसमें श्रीलक्ष्मी-कांत । अपने पास ॥ ६२ ॥ अर्जुन उवाच दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥ एवं पहले जैसे था वैसे । देखा यह वीर्य-विलाससे । फिर कहता जिया मैं ऐसे । हुवा अब ॥ ६३ ॥ बुद्धिको छोड कर ज्ञान । भयसे गया था जो वन । अहंकार सह है मन । भाग गया था ॥ ६४ ॥ इन्द्रियां प्रवृत्ति भूल गयी थीं । भाषा प्राणसे वंचित हुई थीं । शरीर-ग्राममें अव्यवस्था थी । अभूतपूर्व ॥ ६५ ॥ हुवे वे सब अब प्रफुल्लित । प्रकृति हुई फिरसे जीवित । अब हुवा पुनरुज्जीवित । ऐसे लगता मुझे ॥ ६६ ॥ जीवने ऐसा सुख पा लिया । फिर कृष्णसे है कह दिया । मैंने तेरा वह जो पा लिया । यह मानवी रूप ॥ ६७ ॥ अर्जुनने कहा देखके यह जो सौम्य मानवी-रूप माधव । हुवा प्रसन्न औ' शांत आया मैं निज भावमें ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी ४००
देवेश ! तूने यह रूप दिखाकर । मुझ राह भूले शिशुको बुलाकर । माताने मानो स्नेहसे गोद लेकर । कराया स्तन-पान ॥ ६८ ॥ अजी ! महा सागरमें विश्व-रूपके । जूझ रहा था हमलोंसे तरंगोंके । अब पा लिया किनारा निज-मूर्ति के । दर्शनानुग्रहसे देव ॥ ६९ ॥ सुन तू यह द्वारकापुराध्यक्ष । विश्व रूपसे मानो सूखा था वृक्ष । इस दर्शनसे तूने की है रक्षा । प्रेम-मेघ-वर्षासे ॥ ६७० ॥ तृषार्थिको जैसे मिला अपार । लहराता अमृत-सिंधु तीर । जीनेका संदेह हुवा है दूर । इस दर्शनसे ॥ ७१ ॥ मेरे हृदयांगणमें आज । खिली आनंद-लता सहज । सुख-दर्शनका हुवा साज । मुझको तेरे ॥ ७२ ॥ भगवान उवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२ ॥ पार्थके ऐसे बोलको सुन । ऐसे क्यों कहता जनार्दन । तू आ-प्रेमका दृढ स्थान मान । विश्व-रूप वह ॥ ७३ ॥ सदैव यहां मूर्ति-दर्शन । करना केवल लेके तन । भूला तू मेरा यह कथन । सुभद्रापति ॥ ७४ ॥ केवल अनन्य भक्तिसे ही यह मिलता है— अरे ! ऐसा कैसा तू अंधा अर्जुन । हाथ आया स्वर्गका मेरु महान । कहता है वह ओछा तेरा मन । यह है भ्रम-भाव ॥ ७५ ॥ रूप है जो मेरा विश्वात्मक । दिखाया तुझे प्रेम-पूर्वक । शंभूने किये तप अनेक । किंतु न पा सका वह ॥ ७६ ॥ तथा संकटमें अष्टांग-योगके । पडते हैं योगी आशासे इसके । किंतु नहीं पाते भाग्य दर्शनके । इसके कभी वे ॥ ७७ ॥ श्री भगवानने कहा देखा तूने वह मेरा अति दुर्लभ दर्शन । चाहते देव भी नित्य वह स्वरूप दर्शन ॥ ५२ ॥ ४०१ विश्व-रूप-दर्शनयोग (51)
विश्व-रूप कभी किसी काल । देखेंगे अणुमात्र केवल । इस आशासे देव सकल । करते हैं चिंतन ॥ ७८ ॥ अंजली जैसे आशाकी । माथे पर ले सदाकी । निहारते आकाशकी । राह चातक ॥ ७९ ॥ ऐसे उत्कंठासे भरकर । देखते हैं सदा सुर नर । निहारते हैं आठो प्रहर । उसके दर्शनार्थ ॥ ८० ॥ फिर भी विश्व-रूप सरीखा । स्वप्न भी किसीने नहीं देखा । प्रत्यक्ष मिला जो वह सुख । तुझको यहां ॥ ८१ ॥ नाहं वेदैर्न तपसा न दाने न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥ वहां पहुंचनेका साधन । कोई नहीं जान तू अर्जुन । वेद सहित षड्दर्शन । व्यर्थ है वहां ॥ ८२ ॥ करने विश्व-रूप दर्शन । करनेमें सब तपको जान । अशक्य पानेमें वह स्थान । धनंजय ॥ ८३ ॥ तथा जैसे देखा तूने सविस्तर । वैसे ज्ञान यज्ञसे भी धनुर्धर । निहारना जान तू अति दुस्तर । किसीको भी ॥ ८४ ॥ इसका है एक ही प्रकार । सुन तू यह चित्त देकर । चित्त करता जब स्वीकार । भक्तिको नित्य ॥ ८५ ॥ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥ ५४ ॥ वह भी भक्ति है कैसी । वर्षा न जानती जैसी । दूसरा आसरा वैसी । धरती बिन ॥ ८६ ॥ तप यज्ञ किया दान तथा अभ्यास वेदका । तो भी दर्शन है मेरा अशक्य जो तुझे मिला ॥ ५३ ॥ अनन्य भक्तिसे शक्य मेरा है ज्ञान दर्शन । तत्वता जानना पाना प्रवेश मुझमें फिर ॥ ५४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०२
या सकल जल संपत्ति । लेकर सागरमें जाती । जैसे गंगा अनन्य-गति । लय हो मिलती है ॥ ८७ ॥ वैसे सर्व भाव सहित । होकर अति स्नेह-सिक्त । रहना मुझमें हो रत । मेरे ही रूपमें ॥ ८८ ॥ तथा मैं रहता ऐसा । क्षीर-सागरमें है जैसा । तटपे मध्यमें एकसा । रहता है दूध ॥ ८९ ॥ मुझसे चींटी पर्यंत । चराचरमें समस्त । भजनमें नहीं भ्रांत । होता कभी ॥ ६९० । उसी क्षणसे है होती । विश्व-रूपकी प्रतीति । नयन सम्मुख आती । मूर्ति विश्व-रूपकी ॥ ९१ ॥ ईंधनसे जैसे अग्नि प्रदीप्त । होनेसे होता ईंधन समाप्त । तथा ईंधन ही अग्नि बन व्याप्त । होता है वैसे ॥ ९२ ॥ सूर्यके अभावसे जैसे अंबर । बन जाता है स्वयं ही अंधकार । सूर्योदयसे होता है तेजाकार । पूर्णरूपसे वह ॥ ९३ ॥ वैसे है मेरा साक्षात्कार । दूर करता अहंकार । तथा मिटता द्वैताकार । सहज भावसे ॥ ९४ ॥ फिर मैं वह यह संपूर्ण । बनता है जो एक रूपेण । तथा एक भाव एक गुण । होता है समरस ॥ ९५ ॥ मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पांडव ॥ ५५ ॥ मेरे लिए ही जो सतत । करता कर्म समर्पित । मेरे बिन उसे जगत । लगता सूना ॥ ९६ ॥ दृश्यादृश्य उसे सकल । जो कुछ है मैं ही केवल । उसका जीनेका जो फल । मेरा ही नाम ॥ ९७ ॥ मग्न जो कर्ममें मेरे भक्तिसे है भरा हुआ । असंग सर्व-निर्वैर पाता हो मुझ मत्पर ॥ ५५ ॥ ४०३ विश्व-रूप-दर्शनयोग
प्राणि-मात्रोंकी बातको भूल । सर्वत्र देखता मुझे ही केवल । इसीलिये होता निर्वैर सकल । विश्वको भजता ॥ ९८ ॥ अजी ! होता है जो ऐसा भक्त । होनेपे उसका देह-पात । मैं ही हो जाता है वह पार्थ । पूर्ण रूपसे ॥ ९९ ॥ अगले अध्यायकी भूमिका— ऐसा वह विश्वोदर तोंदल । वैसे ही करुणा-रस रसाल । श्रीकृष्ण बोला ऐसे मधुबोल । कहता संजय ॥ ७०० ॥ सुनकर यह पांडुकुमार । आनंद-संपदामें भरकर । श्रीहरि पद-कमल-भ्रमर । मान अपनेको ॥ १ ॥ उसने देखली वे दोनो मूर्ति । अपने चितमें भरी आकृति । तब विश्व-रूपसे कृष्णाकृति । लगी सुंदर ॥ २ ॥ किंतु उसका बना जो ज्ञान । अमान्य करता जनार्दन । व्यापकसे न होता महान । कभी रूप एक ॥ ३ ॥ करनेमें समर्थन । इसका श्री भगवान । कहता है दो वचन । अर्जुनसे ॥ ४ ॥ उन्हें सुनकर अर्जुन । चितमें करता चिंतन । इसमें बड़ा है कौन । पूछें इनसे ॥ ५ ॥ ऐसा सोचकर चितमें पार्थ । करेगा प्रश्न जो अब उचित । सुनेंगे अब हम जो खचित । अगले निरूपणमें ॥ ६ ॥ प्रांजल ओवी प्रबंध । कहा मैंने स-विनोद । यह निवृत्ति प्रसाद । कहे ज्ञानदेव ॥ ७ ॥ भरके सद्भावनाकी अंजली । मैंने ओवी सुमन भरी खुली । अर्पण की हे चरण युगली । विश्व-रूपके ॥ ८ ॥ गीता श्लोक ५५ ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८. ॐ
१२ भक्तियोग मातृ-रूपसे गुरुका वन्दन— जय-जय हे शुद्धे । उदारतम प्रसिद्ध । अनवरत आनन्दे । वर्षा कर ॥ १ ॥ विषयव्यालका जकडनव । विषतम भ्रमका अंजन । गुरु-कृपाके स्निग्ध-नयन । निर्विष करेंगे ॥ २ ॥ झुरसा हो कैसे ही तापमें । या जला हो कैसे हि शोकमें । तव कृपा-रस-कल्लोलमें । होंगे शीतल ॥ ३ ॥ अजी ! योग-सुखका उमंग । तव स्नेह-रसके तरंग । सोऽहं सुख सिद्धिसें अंतरंग । भर देते हैं ॥ ४ ॥ आधार शक्तिकी गोदमें । बढाती प्रेम-सुख-मोदमें । हृदयाकाश पालनेमें । झुलाती सदा ॥ ५ ॥ उतारती प्रागज्योतिकी आरति । मन पवन खिलौनोंसे खिलाती । आत्म-सुख अलंकारसे सजाती । बालकको नित ॥ ६ ॥ सत्रहवींका स्तन्य देती । अनाहतके गीत गाती । समाधि-बोधमें सुलाती । समझाके ॥ ७ ॥ तभी तू साधकोंकी मां कहलाती । चरणमें साहित्य-लता खिलती । तब चरण तलकी छाया ही गति । सर्वदा मुझे ॥ ८ ॥ अजी ! सद्गुरुकी कृपा-दृष्टि । तब कारुण्य जिसकी अधिष्ठी । सकल विद्याओंकी जो सृष्टि । धात्री ही है ॥ ९ ॥
तभी हे अंबे श्रीमंते । निज-जन कल्पलते । आज्ञा दे तू मुझे माते । ग्रन्थ-निरूपणकी ॥ १० ॥ नव-रसके भरे सागर । जो हैं महा रत्नोंके आगर । भावार्थके ऊँचे गिरिवर । उठ आयेंगे ॥ ११ ॥ साहित्य सुवर्णकी खान । हो देश-भाषाका अंगन । विवेक-वल्लीका उद्यान । लगे सर्वत्र ॥ १२ ॥ संवाद-फल निधान । प्रमेयोंका उपवन । लगे सर्वत्र गहन । निरंतर ॥ १३ ॥ पटे पाखंडकी खायी महान । मिटे वाग्वाद सब अर्थ-शून्य । भगे कुतर्कके दुष्ट-श्वान । सदाके लिए ॥ १४ ॥ मेरा चित्त सदैव श्री कृष्ण गुणवर्णनमें समर्थ हो— श्रीकृष्ण-गुणगानमें चित्त । रहे मेरा सर्वदा समर्थ । श्रोता श्रवणासनपे रत । रहे निरंतर ॥ १५ ॥ त्रिभुवनके सभी नगर । बने ब्रह्मविद्याका आगर । लेन-देनका रहे आधार । सुविचार मात्र ॥ १६ ॥ मां अपने स्नेहांचलमें । संभालो सर्वदा गोदमें । वहां यह सब लीलामें । उपजाऊँ मैं ॥ १७ ॥ इस विनयसे रीझ उठी । श्रीगुरुकी अनुग्रह-दृष्टि । कहा कर अब गीता गोष्ठि । न बोल अन्य ॥ १८ ॥ वहांका यह महा-प्रसाद । पाकर हुआ महदानन्द । अब कहूँगा गीता-प्रबंध । सुनियेजी ॥ १९ ॥ अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ । विलीन तुझमें होके भजता भक्त जो तुझे । कोई अक्षर अव्यक्त योगियोंमें श्रेष्ठ कौन हैं ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०६
ईश्वर प्राप्तिके दो मार्ग— तब सकल वीराधिराज । सोम-वंशका विजयध्वज । बोलने लगा वह आत्मज । पांडु नृपतिका ॥ २० ॥ कृष्ण ! मैने किया श्रवण । तथा विश्वरूप दर्शन । भय-ग्रस्त हुआ जी मन । देख अद्भुत ॥ २१ ॥ कृष्ण-मूर्तिका है रूप सुन्दर । जिसका किया चितने आधार । श्रीकृष्ण तूने ना कहकर । दूर किया मुझसे ॥ २२ ॥ अजी ! व्यक्त तथा अव्यक्त । एकमात्र तू है निर्भ्रांत । भक्तिसे जो मिलता व्यक्त । अव्यक्त योगसे ॥ २३ ॥ अजी ! ये हैं दो ही पथ । दर्शनार्थिको उचित । द्वारमें व्यक्त अव्यक्त । पहुंचाते जो ॥ २४ ॥ कस होता है जो तोला स्वर्णका । वही कस होता एक रत्तिका । इसीलिए जो है एक व्यापक । दूसरा है सीमित ॥ २५ ॥ जो महानता अमृत व सिंधुकी । वही शक्ति है अमृत-बिंदुकी । करनेसे आचमन दोनोंकी । मिलती एकसे जो ॥ २६ ॥ इन दोनोंसे तत्वतः तुझे कौन जानता है ?— बात है यह मेरा चित्त । प्रतीत करता निश्चित । जानना चाहूं तेरा मत । योगेश्वर ॥ २७ ॥ श्रीकृष्ण तूने क्षण एक । स्वीकार किया जो व्यापक । यथार्थमें था या कौतुक । जिज्ञासासे ॥ २८ ॥ तेरे लिए ही सब कर्म । तु ही है जिनका परम । भक्तका यह मनो-धर्म । सर्व-समर्पण ॥ २९ ॥ तथा अन्य सब भांति । तुझको ही मान गति । दृढ़ कर यह मति । भजते तुझे ॥ ३० ॥ तथा जो प्रणवके उस पार । वैखरीके लिए भी जो है पर । उपमा रहित औ' निराकार । वस्तु है जो ॥ ३१ ॥ ४०७ भक्तियोग
वह है अक्षर औ' अव्यक्त । तथा निर्देश देश रहित । तत्वऽमसि भावसे पूजित । ज्ञानियोंसे ॥ ३२ ॥ योगी या भक्तमें तत्वता । तुमको कौन है जानता । कह तू मुझको अनंता । इस समय ॥ ३३ ॥ सुन अर्जुनकी यह बात । जगद्बन्धु हो प्रसन्न चित्त । कहे करना प्रश्न उचित । जानता तू ॥ ३४ ॥ भगवान उवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २ ॥ दिन रात मेरा चिंतन करनेवाला भक्त मुझे जानता है - जैसे अस्ताचलके समीप । गये रवि-बिंबके आतप । रविके पीछे अपने आप । चलता वैसे ॥ ३५ ॥ वर्षा-ऋतुकी जो सरिता । चढ़ती जाती पांडुसुता । वैसी नित्य-नूतन आस्था । दीखे भजनमें ॥ ३६ ॥ मिलन स्थलमें जैसे सागर । गंगा-प्रवाह होता अनिवार । वैसा आता है अनिवार पूर । प्रेम-भावका ॥ ३७ ॥ वैसे जो सर्वेंद्रिय सहित । नित रहता मुझमें रत । स्मरता रहता दिन-रात । न जानकर भी ॥ ३८ ॥ इस प्रकार है जो भक्त । कर सर्वस्व समर्पित । उसको ही मैं योगयुक्त । मानता श्रेष्ठ ॥ ३९ ॥ ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥ मुझमें मनको रोप भजता नित्य जो मुझे । जुड़ा परम श्रद्धासे उसे मैं श्रेष्ठ मानता ॥ २ ॥ जो है अचिंत्य अव्यक्त सर्व-व्यापी अवर्णित । नित्य निश्चल निर्लिप्त जो अक्षर उपासता ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०८
निराकारका योग-मार्ग— तथा अन्य है जो पांडव । आरूढ होके सोऽहं भाव । उलझते निरवयव । अक्षरसे ॥ ४० ॥ जहाँ मनकी रसाई नहीं होती । बुद्धिकी दृष्टि भी नहीं पहुँचती । वहाँ होगी इन्द्रियोंकी कौन गति । कह तू अर्जुन ॥ ४१ ॥ ध्यानमें भी वह आना कठिन । होता नहीं उसका एक स्थान । न होता उसका आकार गुण । इससे ही ॥ ४२ ॥ जिसका सर्वत्र सर्व काल । रहना सदैव सर्व-स्थल । देख होती कुंठित सकल । चिंतन-शक्ति ॥ ४३ ॥ जिसका आदि अन्त है नहीं । तथा है नहींका पता नहीं । जिसका कोई उपाय नहीं । जाननेका ॥ ४४ ॥ जो स्थिर न चर । जर ना अजर । पाया वह पर । जिन्होंने स्वयं ॥ ४५ ॥ संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवंति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥ उनके वैराग्य महाज्वालसे । विषय-वाहिनीको जलानेसे । अधजले इंद्रियोंको धैर्यसे । समेट लिया है ॥ ४६ ॥ फिर संयमके पाशमें । पैंठके अंतर तममें । इंद्रियाँ हृदय द्वारमें । बाँध रखी ॥ ४७ ॥ लगाया अपानका जो द्वार । देकर आसन मुद्राधार । मूलबन्धका सुदृढ़ घर । बना लिया ॥ ४८ ॥ तोड़ा लगाव चाहका । ढा दिया ढाँचा भयका । मिटाया निद्रा-तमका । अंधियारा जो ॥ ४९ ॥ रोकता इन्द्रियां सारी सर्वत्र सम-बुद्धिसे । पाते हैं मुझको ही वे विश्वके हितमें रत ॥ ४ ॥ (52) ४०९ भक्तियोग
महा ज्वालाओंसे वजाग्निकी । होली कर अपान धातुकी । व्याधि-वर्ग मुंडोंसे पूजा की । शतघ्नीकी ॥ ५० ॥ फिर मशाल कुण्डलिनीकी । आधारचक्र पर खड़ी की । राह बतायी ब्रह्म-रंध्रकी । उस प्रभाने ॥ ५१ ॥ नव-द्वारके किवाड पर । संयम सांखली लगाकर । खोला सुषुम्ना गवाक्ष-द्वार । धनंजय ॥ ५२ ॥ तब प्राण-शक्ति चामुंडा । प्रहारसे संकल्प भेड । मन महिषासुर मुंड । लेती है बलि ॥ ५३ ॥ इडा पिंगलाका ऐक्य कर । अनाहद नाद जगाकर । जीत लिया इन्द्रामृत नीर । उसी क्षण ॥ ५४ ॥ फिर मध्यमा मध्य विवर । जिसका द्वार अति सुन्दर । खोलके ब्रह्मरंध्र शिखर । पालिया है ॥ ५५ ॥ सिवा मकारांत सोपान । छोड करके जो गहन । फाँकमैं ले शून्य गगन । पाया ब्रह्मैक्य ॥ ५६ ॥ ऐसे जो सर्वत्र समबुद्धि । निगल जानेमें सोऽहं सिद्धि । प्राप्त करते हैं निरवधि । योग दुर्ग ॥ ५७ ॥ अपनेको ही बेचकर । लेते हैं शून्य निराकार । वे भी पाते हैं धनुर्धर । मुझको ही ॥ ५८ ॥ अव्यक्तोपासकसे व्यक्तोपासक भले-क्यों कि— पाते हैं योग बलसे । विशेष हैं कछु ऐसे । नहीं कष्ट ही अधिकसे । पाते हैं वे ॥ ५९ ॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥ विशेष क्लेश पाते हैं गूंथ अव्यक्तमें चित्त । होना अज्ञातमें बोध कठिन देह-धारिको ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ४१०
सकल भूतोंके हितार्थ । निरालंब औ' अव्यक्त । उसमें हुआ जो आसक्त । बिना भक्तिके ॥ ६० ॥ उसको इन्द्रादिक पद । करते हैं पथमें वध । तथा ऋद्धि-सिद्धियोंका द्वंद्व । बनते हैं रोडे ॥ ६१ ॥ काम-क्रोधके उत्पात । करते बडे आघात । तथा शून्यसे भिडन्त । नित है तनको ॥ ६२ ॥ प्याससे प्यास ही है पीना । भूखसे भूख ही है खाना । दिन रात हवा गिनना । हवासे ही ॥ ६३ ॥ सतत-जागृति जहां सोना । इन्द्रिय इन्द्रियको ही भोगना । वृक्षोंसे मैत्री करके बोलना । स्वभावसे ॥ ६४ ॥ शीतको बिछाना । तापको ओढना । घरमें हैं सोना । वर्षाके ॥ ६५ ॥ अथवा यह हे धनंजया । अग्नि-प्रवेश है नित-नया । आंतर बिना ही पूर्णतया । करना ही योग ॥ ६६ ॥ न है यह स्वामीका काज । जिसमें मिलता स-व्याज । किंतु मात्र मृत्युसे झूज । नित्य-नयी ॥ ६७ ॥ ऐसा मृत्युसे भी जो भीषण । तप्त विष घूंटसे भी तीक्ष्ण । पहाड लीलनेमें आनन । न फटेगा क्या ? ॥ ६८ ॥ योगीका जो पथ । चलते हैं पार्थ । दुःख ही हैं साथ । उनके सदा ॥ ६९ ॥ अजी ! लोहेके ही चने । पडते हैं नित खाने । पेट भरने या मरने । क्या कहें इसे ? ॥ ७० ॥ बाहुसे तरना सागर । पैरोंसे गगन विहार । ऐसा ही है पांडुकुमार । बात जो यह ॥ ७१ ॥ बीच रण रंगमें जाकर । तनपे घाव न झेलकर । सूर्य मण्डलको भेदकर । आना कैसे ? ॥ ७२ ॥ ४११ भक्तियोग
पंगुकी बराबरी वायुसे । शरीरीकी निर्गुणमें वैसे । प्रवेश है समान रूपसे । जान तू पांडव ॥ ७३ ॥ फिर भी करके साहस । लिपट लेते हैं आकाश । जिससे पायेंगे वे क्लेश । निश्चित जान ॥ ७४ ॥ किंतु इस और पार्थ । न जाने क्या है व्यथा । तभी है ये भक्ति-पंथ । आते हैं जन ॥ ७५ ॥ भक्ति पंथ सरल है—क्यों कि— ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायंत उपासते ॥ ६ ॥ कर्मेंन्द्रिय यहां स-सुख । करती हैं कर्म विशेष । प्राप्त हैं जो वर्ण विशेष । स्वभाव-जन्य ॥ ७६ ॥ विधिको है पालना । निषिद्धको त्यागना । अर्पण कर जलाना । कर्म-फलको ॥ ७७ ॥ इस भांति कर समर्पण । कर्मका करते हैं क्षालन । ऐसे करते कर्म अर्जुन । जो हैं भक्त ॥ ७८ ॥ दूसरे भी हैं जो जो सर्व । काया वाचा मनके भाव । मेरे बिना नहीं है ठाव । कोई भी अन्य । ॥ ७९ ॥ ऐसे होके जो मत्पर । उपासते निरंतर । जिससे हैं मेरा घर । ध्यानसे वे ॥ ८० ॥ उनकी रुचि चाह चाव । मेरे लिए ही है ये सर्व । योग-क्षेम मोक्षादि भाव । त्यजे कुलादि भी ॥ ८१ ॥ ऐसा यह अनन्य-योग । न्योच्छावर मन प्राण अंग । उनका क्या है एकेक भाग । करता हूं मैं सब ॥ ८२ ॥ किंतु जो सब ही कर्म करके मुझ अर्पण । अनन्य भक्तिसे मेरा करते नित्य चिंतन ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४१२
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥ निष्काम भक्तसे मैं अत्यंत प्रेम करता हूँ— अथवा जो पांडुकुमार । आता जो माताके उदर । उससे माता कैसे प्यार । करती है नित ॥ ८३ ॥ वैसा मैं करता उनसे । जहां वे जैसे रहते वैसे । कलिकालके परिहारसे । करता स्वीकार ॥ ८४ ॥ वैसा तो कभी मेरा भक्त । संसार चिंता नहीं करता । अजी ! क्या श्रीमंतकी कांता । मांगती कोरास ॥ ८५ ॥ वैसा वे सर्वदा सर्वत्र । माननाजी मेरा कलत्र । लजाऊँ ना मैं तिलमात्र । उनकी सेवामें ॥ ८६ ॥ जन्म-मृत्युके भंवरमें । देख डूबे हुए विश्वमें । उठे ये विचार मनमें । ऐसे सब ॥ ८७ ॥ भव सागरके खम्भारमें । भय न हो किसके हियमैं । यहां यदि मेरे ही जनमें । होगी भीति ॥ ८८ ॥ इसीलिये मैं अर्जुन ! रूप लेकर सगुण । जहां बसते सज्जन । आया वहां ॥ ८९ ॥ मेरे नाम हैं जो अनंत । नांव है यहां मूर्तिमंत । इसको लेकर मैं पार्थ । बना मांझी ॥ ९० ॥ ये जो परिग्रह रहित । उनको लगाया ध्यानार्थ । जो ये परिग्रह सहित । उनको नाममें ॥ ९१ ॥ प्रेमकी पेटी बांधकर । लाया किसीको तैराकर । पहुंचाया है तीर पर । सायुज्यके ॥ ९२ ॥ रोक्ता मुझमें चित्त उनको शीघ्र मैं स्वयम् । बिना विलम्ब उद्धार करता भव-सिंधुसे ॥ ७ ॥ ४१३ भक्तियोग