ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहा ज्वालाओंसे वजाग्निकी । होली कर अपान धातुकी । व्याधि-वर्ग मुंडोंसे पूजा की । शतघ्नीकी ॥ ५० ॥ फिर मशाल कुण्डलिनीकी । आधारचक्र पर खड़ी की । राह बतायी ब्रह्म-रंध्रकी । उस प्रभाने ॥ ५१ ॥ नव-द्वारके किवाड पर । संयम सांखली लगाकर । खोला सुषुम्ना गवाक्ष-द्वार । धनंजय ॥ ५२ ॥ तब प्राण-शक्ति चामुंडा । प्रहारसे संकल्प भेड । मन महिषासुर मुंड । लेती है बलि ॥ ५३ ॥ इडा पिंगलाका ऐक्य कर । अनाहद नाद जगाकर । जीत लिया इन्द्रामृत नीर । उसी क्षण ॥ ५४ ॥ फिर मध्यमा मध्य विवर । जिसका द्वार अति सुन्दर । खोलके ब्रह्मरंध्र शिखर । पालिया है ॥ ५५ ॥ सिवा मकारांत सोपान । छोड करके जो गहन । फाँकमैं ले शून्य गगन । पाया ब्रह्मैक्य ॥ ५६ ॥ ऐसे जो सर्वत्र समबुद्धि । निगल जानेमें सोऽहं सिद्धि । प्राप्त करते हैं निरवधि । योग दुर्ग ॥ ५७ ॥ अपनेको ही बेचकर । लेते हैं शून्य निराकार । वे भी पाते हैं धनुर्धर । मुझको ही ॥ ५८ ॥ अव्यक्तोपासकसे व्यक्तोपासक भले-क्यों कि— पाते हैं योग बलसे । विशेष हैं कछु ऐसे । नहीं कष्ट ही अधिकसे । पाते हैं वे ॥ ५९ ॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥ विशेष क्लेश पाते हैं गूंथ अव्यक्तमें चित्त । होना अज्ञातमें बोध कठिन देह-धारिको ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ४१०