ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसकल भूतोंके हितार्थ । निरालंब औ' अव्यक्त । उसमें हुआ जो आसक्त । बिना भक्तिके ॥ ६० ॥ उसको इन्द्रादिक पद । करते हैं पथमें वध । तथा ऋद्धि-सिद्धियोंका द्वंद्व । बनते हैं रोडे ॥ ६१ ॥ काम-क्रोधके उत्पात । करते बडे आघात । तथा शून्यसे भिडन्त । नित है तनको ॥ ६२ ॥ प्याससे प्यास ही है पीना । भूखसे भूख ही है खाना । दिन रात हवा गिनना । हवासे ही ॥ ६३ ॥ सतत-जागृति जहां सोना । इन्द्रिय इन्द्रियको ही भोगना । वृक्षोंसे मैत्री करके बोलना । स्वभावसे ॥ ६४ ॥ शीतको बिछाना । तापको ओढना । घरमें हैं सोना । वर्षाके ॥ ६५ ॥ अथवा यह हे धनंजया । अग्नि-प्रवेश है नित-नया । आंतर बिना ही पूर्णतया । करना ही योग ॥ ६६ ॥ न है यह स्वामीका काज । जिसमें मिलता स-व्याज । किंतु मात्र मृत्युसे झूज । नित्य-नयी ॥ ६७ ॥ ऐसा मृत्युसे भी जो भीषण । तप्त विष घूंटसे भी तीक्ष्ण । पहाड लीलनेमें आनन । न फटेगा क्या ? ॥ ६८ ॥ योगीका जो पथ । चलते हैं पार्थ । दुःख ही हैं साथ । उनके सदा ॥ ६९ ॥ अजी ! लोहेके ही चने । पडते हैं नित खाने । पेट भरने या मरने । क्या कहें इसे ? ॥ ७० ॥ बाहुसे तरना सागर । पैरोंसे गगन विहार । ऐसा ही है पांडुकुमार । बात जो यह ॥ ७१ ॥ बीच रण रंगमें जाकर । तनपे घाव न झेलकर । सूर्य मण्डलको भेदकर । आना कैसे ? ॥ ७२ ॥ ४११ भक्तियोग