भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पंगुकी बराबरी वायुसे । शरीरीकी निर्गुणमें वैसे । प्रवेश है समान रूपसे । जान तू पांडव ॥ ७३ ॥ फिर भी करके साहस । लिपट लेते हैं आकाश । जिससे पायेंगे वे क्लेश । निश्चित जान ॥ ७४ ॥ किंतु इस और पार्थ । न जाने क्या है व्यथा । तभी है ये भक्ति-पंथ । आते हैं जन ॥ ७५ ॥ भक्ति पंथ सरल है—क्यों कि— ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायंत उपासते ॥ ६ ॥ कर्मेंन्द्रिय यहां स-सुख । करती हैं कर्म विशेष । प्राप्त हैं जो वर्ण विशेष । स्वभाव-जन्य ॥ ७६ ॥ विधिको है पालना । निषिद्धको त्यागना । अर्पण कर जलाना । कर्म-फलको ॥ ७७ ॥ इस भांति कर समर्पण । कर्मका करते हैं क्षालन । ऐसे करते कर्म अर्जुन । जो हैं भक्त ॥ ७८ ॥ दूसरे भी हैं जो जो सर्व । काया वाचा मनके भाव । मेरे बिना नहीं है ठाव । कोई भी अन्य । ॥ ७९ ॥ ऐसे होके जो मत्पर । उपासते निरंतर । जिससे हैं मेरा घर । ध्यानसे वे ॥ ८० ॥ उनकी रुचि चाह चाव । मेरे लिए ही है ये सर्व । योग-क्षेम मोक्षादि भाव । त्यजे कुलादि भी ॥ ८१ ॥ ऐसा यह अनन्य-योग । न्योच्छावर मन प्राण अंग । उनका क्या है एकेक भाग । करता हूं मैं सब ॥ ८२ ॥ किंतु जो सब ही कर्म करके मुझ अर्पण । अनन्य भक्तिसे मेरा करते नित्य चिंतन ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४१२

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