भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥ निष्काम भक्तसे मैं अत्यंत प्रेम करता हूँ— अथवा जो पांडुकुमार । आता जो माताके उदर । उससे माता कैसे प्यार । करती है नित ॥ ८३ ॥ वैसा मैं करता उनसे । जहां वे जैसे रहते वैसे । कलिकालके परिहारसे । करता स्वीकार ॥ ८४ ॥ वैसा तो कभी मेरा भक्त । संसार चिंता नहीं करता । अजी ! क्या श्रीमंतकी कांता । मांगती कोरास ॥ ८५ ॥ वैसा वे सर्वदा सर्वत्र । माननाजी मेरा कलत्र । लजाऊँ ना मैं तिलमात्र । उनकी सेवामें ॥ ८६ ॥ जन्म-मृत्युके भंवरमें । देख डूबे हुए विश्वमें । उठे ये विचार मनमें । ऐसे सब ॥ ८७ ॥ भव सागरके खम्भारमें । भय न हो किसके हियमैं । यहां यदि मेरे ही जनमें । होगी भीति ॥ ८८ ॥ इसीलिये मैं अर्जुन ! रूप लेकर सगुण । जहां बसते सज्जन । आया वहां ॥ ८९ ॥ मेरे नाम हैं जो अनंत । नांव है यहां मूर्तिमंत । इसको लेकर मैं पार्थ । बना मांझी ॥ ९० ॥ ये जो परिग्रह रहित । उनको लगाया ध्यानार्थ । जो ये परिग्रह सहित । उनको नाममें ॥ ९१ ॥ प्रेमकी पेटी बांधकर । लाया किसीको तैराकर । पहुंचाया है तीर पर । सायुज्यके ॥ ९२ ॥ रोक्ता मुझमें चित्त उनको शीघ्र मैं स्वयम् । बिना विलम्ब उद्धार करता भव-सिंधुसे ॥ ७ ॥ ४१३ भक्तियोग