ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवह है अक्षर औ' अव्यक्त । तथा निर्देश देश रहित । तत्वऽमसि भावसे पूजित । ज्ञानियोंसे ॥ ३२ ॥ योगी या भक्तमें तत्वता । तुमको कौन है जानता । कह तू मुझको अनंता । इस समय ॥ ३३ ॥ सुन अर्जुनकी यह बात । जगद्बन्धु हो प्रसन्न चित्त । कहे करना प्रश्न उचित । जानता तू ॥ ३४ ॥ भगवान उवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २ ॥ दिन रात मेरा चिंतन करनेवाला भक्त मुझे जानता है - जैसे अस्ताचलके समीप । गये रवि-बिंबके आतप । रविके पीछे अपने आप । चलता वैसे ॥ ३५ ॥ वर्षा-ऋतुकी जो सरिता । चढ़ती जाती पांडुसुता । वैसी नित्य-नूतन आस्था । दीखे भजनमें ॥ ३६ ॥ मिलन स्थलमें जैसे सागर । गंगा-प्रवाह होता अनिवार । वैसा आता है अनिवार पूर । प्रेम-भावका ॥ ३७ ॥ वैसे जो सर्वेंद्रिय सहित । नित रहता मुझमें रत । स्मरता रहता दिन-रात । न जानकर भी ॥ ३८ ॥ इस प्रकार है जो भक्त । कर सर्वस्व समर्पित । उसको ही मैं योगयुक्त । मानता श्रेष्ठ ॥ ३९ ॥ ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥ मुझमें मनको रोप भजता नित्य जो मुझे । जुड़ा परम श्रद्धासे उसे मैं श्रेष्ठ मानता ॥ २ ॥ जो है अचिंत्य अव्यक्त सर्व-व्यापी अवर्णित । नित्य निश्चल निर्लिप्त जो अक्षर उपासता ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०८