ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंईश्वर प्राप्तिके दो मार्ग— तब सकल वीराधिराज । सोम-वंशका विजयध्वज । बोलने लगा वह आत्मज । पांडु नृपतिका ॥ २० ॥ कृष्ण ! मैने किया श्रवण । तथा विश्वरूप दर्शन । भय-ग्रस्त हुआ जी मन । देख अद्भुत ॥ २१ ॥ कृष्ण-मूर्तिका है रूप सुन्दर । जिसका किया चितने आधार । श्रीकृष्ण तूने ना कहकर । दूर किया मुझसे ॥ २२ ॥ अजी ! व्यक्त तथा अव्यक्त । एकमात्र तू है निर्भ्रांत । भक्तिसे जो मिलता व्यक्त । अव्यक्त योगसे ॥ २३ ॥ अजी ! ये हैं दो ही पथ । दर्शनार्थिको उचित । द्वारमें व्यक्त अव्यक्त । पहुंचाते जो ॥ २४ ॥ कस होता है जो तोला स्वर्णका । वही कस होता एक रत्तिका । इसीलिए जो है एक व्यापक । दूसरा है सीमित ॥ २५ ॥ जो महानता अमृत व सिंधुकी । वही शक्ति है अमृत-बिंदुकी । करनेसे आचमन दोनोंकी । मिलती एकसे जो ॥ २६ ॥ इन दोनोंसे तत्वतः तुझे कौन जानता है ?— बात है यह मेरा चित्त । प्रतीत करता निश्चित । जानना चाहूं तेरा मत । योगेश्वर ॥ २७ ॥ श्रीकृष्ण तूने क्षण एक । स्वीकार किया जो व्यापक । यथार्थमें था या कौतुक । जिज्ञासासे ॥ २८ ॥ तेरे लिए ही सब कर्म । तु ही है जिनका परम । भक्तका यह मनो-धर्म । सर्व-समर्पण ॥ २९ ॥ तथा अन्य सब भांति । तुझको ही मान गति । दृढ़ कर यह मति । भजते तुझे ॥ ३० ॥ तथा जो प्रणवके उस पार । वैखरीके लिए भी जो है पर । उपमा रहित औ' निराकार । वस्तु है जो ॥ ३१ ॥ ४०७ भक्तियोग