भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 476

तभी हे अंबे श्रीमंते । निज-जन कल्पलते । आज्ञा दे तू मुझे माते । ग्रन्थ-निरूपणकी ॥ १० ॥ नव-रसके भरे सागर । जो हैं महा रत्नोंके आगर । भावार्थके ऊँचे गिरिवर । उठ आयेंगे ॥ ११ ॥ साहित्य सुवर्णकी खान । हो देश-भाषाका अंगन । विवेक-वल्लीका उद्यान । लगे सर्वत्र ॥ १२ ॥ संवाद-फल निधान । प्रमेयोंका उपवन । लगे सर्वत्र गहन । निरंतर ॥ १३ ॥ पटे पाखंडकी खायी महान । मिटे वाग्वाद सब अर्थ-शून्य । भगे कुतर्कके दुष्ट-श्वान । सदाके लिए ॥ १४ ॥ मेरा चित्त सदैव श्री कृष्ण गुणवर्णनमें समर्थ हो— श्रीकृष्ण-गुणगानमें चित्त । रहे मेरा सर्वदा समर्थ । श्रोता श्रवणासनपे रत । रहे निरंतर ॥ १५ ॥ त्रिभुवनके सभी नगर । बने ब्रह्मविद्याका आगर । लेन-देनका रहे आधार । सुविचार मात्र ॥ १६ ॥ मां अपने स्नेहांचलमें । संभालो सर्वदा गोदमें । वहां यह सब लीलामें । उपजाऊँ मैं ॥ १७ ॥ इस विनयसे रीझ उठी । श्रीगुरुकी अनुग्रह-दृष्टि । कहा कर अब गीता गोष्ठि । न बोल अन्य ॥ १८ ॥ वहांका यह महा-प्रसाद । पाकर हुआ महदानन्द । अब कहूँगा गीता-प्रबंध । सुनियेजी ॥ १९ ॥ अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ । विलीन तुझमें होके भजता भक्त जो तुझे । कोई अक्षर अव्यक्त योगियोंमें श्रेष्ठ कौन हैं ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ४०६