भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 475

१२ भक्तियोग मातृ-रूपसे गुरुका वन्दन— जय-जय हे शुद्धे । उदारतम प्रसिद्ध । अनवरत आनन्दे । वर्षा कर ॥ १ ॥ विषयव्यालका जकडनव । विषतम भ्रमका अंजन । गुरु-कृपाके स्निग्ध-नयन । निर्विष करेंगे ॥ २ ॥ झुरसा हो कैसे ही तापमें । या जला हो कैसे हि शोकमें । तव कृपा-रस-कल्लोलमें । होंगे शीतल ॥ ३ ॥ अजी ! योग-सुखका उमंग । तव स्नेह-रसके तरंग । सोऽहं सुख सिद्धिसें अंतरंग । भर देते हैं ॥ ४ ॥ आधार शक्तिकी गोदमें । बढाती प्रेम-सुख-मोदमें । हृदयाकाश पालनेमें । झुलाती सदा ॥ ५ ॥ उतारती प्रागज्योतिकी आरति । मन पवन खिलौनोंसे खिलाती । आत्म-सुख अलंकारसे सजाती । बालकको नित ॥ ६ ॥ सत्रहवींका स्तन्य देती । अनाहतके गीत गाती । समाधि-बोधमें सुलाती । समझाके ॥ ७ ॥ तभी तू साधकोंकी मां कहलाती । चरणमें साहित्य-लता खिलती । तब चरण तलकी छाया ही गति । सर्वदा मुझे ॥ ८ ॥ अजी ! सद्गुरुकी कृपा-दृष्टि । तब कारुण्य जिसकी अधिष्ठी । सकल विद्याओंकी जो सृष्टि । धात्री ही है ॥ ९ ॥