ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राणि-मात्रोंकी बातको भूल । सर्वत्र देखता मुझे ही केवल । इसीलिये होता निर्वैर सकल । विश्वको भजता ॥ ९८ ॥ अजी ! होता है जो ऐसा भक्त । होनेपे उसका देह-पात । मैं ही हो जाता है वह पार्थ । पूर्ण रूपसे ॥ ९९ ॥ अगले अध्यायकी भूमिका— ऐसा वह विश्वोदर तोंदल । वैसे ही करुणा-रस रसाल । श्रीकृष्ण बोला ऐसे मधुबोल । कहता संजय ॥ ७०० ॥ सुनकर यह पांडुकुमार । आनंद-संपदामें भरकर । श्रीहरि पद-कमल-भ्रमर । मान अपनेको ॥ १ ॥ उसने देखली वे दोनो मूर्ति । अपने चितमें भरी आकृति । तब विश्व-रूपसे कृष्णाकृति । लगी सुंदर ॥ २ ॥ किंतु उसका बना जो ज्ञान । अमान्य करता जनार्दन । व्यापकसे न होता महान । कभी रूप एक ॥ ३ ॥ करनेमें समर्थन । इसका श्री भगवान । कहता है दो वचन । अर्जुनसे ॥ ४ ॥ उन्हें सुनकर अर्जुन । चितमें करता चिंतन । इसमें बड़ा है कौन । पूछें इनसे ॥ ५ ॥ ऐसा सोचकर चितमें पार्थ । करेगा प्रश्न जो अब उचित । सुनेंगे अब हम जो खचित । अगले निरूपणमें ॥ ६ ॥ प्रांजल ओवी प्रबंध । कहा मैंने स-विनोद । यह निवृत्ति प्रसाद । कहे ज्ञानदेव ॥ ७ ॥ भरके सद्भावनाकी अंजली । मैंने ओवी सुमन भरी खुली । अर्पण की हे चरण युगली । विश्व-रूपके ॥ ८ ॥ गीता श्लोक ५५ ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८. ॐ