भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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मुझे हुआ अब इसका ज्ञान । आता देवकी महिमा महान् । देव है यहां उत्पत्ति स्थान । चराचरका सब ॥ ६१ ॥ हरिहरादि जो है समस्त । उनका तू परम दैवत । वेदोंका भी है जो ज्ञानदात । तू ही आदि-गुरु ॥ ६२ ॥ गंभीर है तू श्रीराम । विविध भूतैक सम । सकल गुण अप्रतिम । अद्वितीय ॥ ६३ ॥ कोई नहीं है तेरे समान । यह कहनेका क्या कारण । तुझसे ही हुआ है गगन । उसमें समाया विश्व ॥ ६४ ॥ ऐसे तेरे समान है अन्य कोई । कहनेमें वाणी अत्यंत लजाई । वहां अधिककी क्या बात आई । कहनेकी देव ॥ ६५ ॥ इसीलिये त्रिभुवनमें तू एक । कोई नहीं तुझसे अधिक । तेरा महिमा ही ऐसे अलौकिक । नहीं होता बखान ॥ ६६ ॥ तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥ ऐसे कह कर जो अर्जुन । करता दंडवत नमन । आया सात्विकताका उफान । लहराकर ॥ ६७ ॥ कहता तब प्रसीद प्रसीद । वाचा होती है अतीव गद्गद् । उभार ले तू मुझे अपराध- । सागरसे देव ॥ ६८ ॥ विश्व-सुहृदको सगा मान । नहीं किया उचित सन्मान । तुझ ईश्वरमें सा-भिमान । किया प्रभुत्व ॥ ६९ ॥ इसीलिये मैं करता प्रणाम प्रसन्न हो तू स्तवनीय देव । क्षमा करो जी मुझ पुत्र मान सखा सखाको प्रिय ज्यों प्रियाको ॥ ४४ ॥ ज्ञानेश्वरी. ३९०