भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वर्णनीय तू प्रेमके कारण । करता सभामें मेरा वर्णन । तब सगर्व अपना बखान । करता मैं अधिक ॥ ७० ॥ ऐसे हैं कितने ही अपराध । उनकी मर्यादा नहीं गोविंद । क्षमा कर लक्ष लक्ष प्रमाद । प्रसाद रूप तू ॥ ७१ ॥ किंतु ऐसे विनय करनेमें । योग्यता कहां है देव मुझमें । शिशु जैसे पिताके दुलारमें । बोलता वैसे ही ॥ ७२ ॥ पिता पुत्रके अपराध । कितने भी हों वे अगाध । सहता है पिता निर्द्वंद्व । वैसे सह ले तू ॥ ७३ ॥ सखाकी उद्धतता । सखा शांत सहता । वैसे ही हे अनंत । सहन कर तू ॥ ७४ ॥ प्रियमैं कभी सम्मान । न करता प्रिय जान । आप उठाये रूठन । क्षमा करोजी ॥ ७५ ॥ या होता जहां जी-लगे स्नेहीका मिलन । कहा जाता जीवन संकटमें कथन । ऐसा करनेमें वहां आत्म-निवेदन । न होता संकोच ॥ ७६ ॥ जिसने किया तन-मन अर्पण । प्रेमादर-युत पतिके चरण । मिलनसे होता सर्वस्व कथन । स्वाभाविक वैसे ॥ ७७ ॥ वैसे ही देव मैंने अब । कह डाला तुझसे सब । दूसरा हेतु रहा कब । अपना स्वामी ॥ ७८ ॥ अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५ ॥ अपूर्व देखा अपरूप दृश्य तो भी बना व्याकुल चित्त मेरा । मुझे बताओ प्रभु मूळ रूप प्रसन्न हो तू जगका निवास ॥ ४५ ॥ ३९१ विश्व-रूप-दर्शनयोग