भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 447

भगवान् उवाच कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥ मैं सबको संहारनेवाला काल हूं— जान तू मैं सम्मुख हूं महाकाल। लोक-संहारार्थ बढ़ता कराल। फैलाये हैं ये जो मुख विकराल। सबको निगलने ॥ ५१ ॥ सुनकर यह अकुलाता पार्थ। पहली बातसे मैं ही संकट-ग्रस्त। विनय की थी तेरी मैंने अनंत। हुवा प्रकट तू काल ॥ ५२ ॥ इस पर बोलनेसे कठिन। यह निराश होगा यह जान। सत्वर कहता देव अर्जुन। और एक बात ॥ ५३ ॥ सबका जो यह चला संहार। इसमें रहे पांडव बाहर। सुनकर यह पांडु कुमार। संभालता प्राण ॥ ५४ ॥ मरण महा-भयसे हो मुक्त। सुनने लगा वह ध्यान-युक्त। श्रीकृष्ण वचन हो अनुरक्त। धनंजय ॥ ५५ ॥ पांडव तुम मेरे आत्मीय जन। इसलिये तुम्हे छोड़के अर्जुन। अन्य सबका करने निकंदन। हुवा उद्यत यहां ॥ ५६ ॥ वज्रानलमें जैसे प्रचंड। डालना जैसे नवनीतका पिंड। मेरे मुखमें वैसे ब्रह्मांड। देखा तूने ॥ ५७ ॥ श्रीभगवानने कहा मैं काल उठा जग-नाशकारी संहारने सिद्ध यहां खड़ा हूँ। तेरे बिना ये सब नष्ट होंगे जो हैं खड़े सैनिक दोन ओर ॥ ३२ ॥ (48) ३७७ विश्व-रूप-दर्शनयोग