भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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उसमें नहीं रहेगा कुछ शेष । जान तू होगा यह सब अ-दोष । सेनाकी चली है बकवास । व्यर्थकी जान तू ॥ ५८ ॥ बनाकर जो यह सैन्य मिलन । करते हैं विरावेशका गर्जन । देखते काल पर विजय स्वप्न । अपने गदा-दंडसे ॥ ५९ ॥ कहते सृष्टि पर सृष्टि करेंगे । प्रतिज्ञासे महाकालको जीतेंगे । तथा जगतका हम बनाएंगे । एक ही कौर ॥ ४६० ॥ जगतको हम निगलेंगे । आकाशको धर जलायेंगे । तीर पर हम नचायेंगे । विश्वका प्राण ॥ ६१ ॥ ऐसी यह चतुरंग संपदा । करती है महाकालसे स्पर्धा । अपने पराक्रमका है मद । करते व्यर्थका ॥ ६२ ॥ बोलते हैं तलवारसे भी तीखा । दीखते हैं आगसे भी दाहक । मारनेमें कालकूटसे भी अधिक । भयानक मानते ॥ ६३ ॥ किंतु ये सब गंधर्व-नगर माल । जान तू ये हैं गेडुरीके शोर पोल । अथवा सब हैं ये आलेखके फल । दीखते हैं बडे ॥ ६४ ॥ अथवा यह मृगजलमें महापूर । सेना नहीं वस्त्रके सांप बनाकर । रखा है यहां बंड सजधजाकर । धनंजय ॥ ६५ ॥ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥ यहां जो संचलित बल । मैंने ग्रास लिया सकल । अब चित्रके-से बेताल । निर्वीर्य हैं ये ॥ ६६ ॥ इनका जीवन सूत्र कबका टूट चुका है— इसीलिये उठ पा ले तू कीर्ति होके जयी राज्य समृद्ध भोग । मैंने हने हैं सब ही कभी के निमित्त हो केवल सव्यसाची ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ३७८