भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जहांसे विविध सृष्टि-माळ । फैलती भूत-ग्रामकी बेळ । ब्रह्म जो तेरी इच्छाका फळ । प्रसवता है ॥ ११ ॥ देव ! निःसीमत्व सर्वोदित । देव ! निःसीममें गुण अनंत । देव ! निःसीमागम्य सतत । देवेंद्र देवका ॥ १२ ॥ तू है जगत्त्रयका जो आश्रय । अक्षर सदाशिव है निश्चय । तू ही सत-असतका प्रश्रय । उससे परेका ॥ १३ ॥ त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनंत रूप ॥ ३८ ॥ प्रकृति पुरुषका तू आदि । तू ही महत्तत्वकी अवधी । स्वयं तू है जो आदि अनादि । पुरातन पुराण ॥ १४ ॥ तू सकळ विश्वका जीवन । जीव मात्रका तू ही निधान । भूत और भविष्यका ज्ञान । तेरे ही करमें ॥ १५ ॥ श्रुतिका तू है लोचन । स्वरूप सुख अभिन्न । त्रिभुवन आयतन- । का आयतन तू ॥ १६ ॥ इसीलिये तू परम । तू ही रहा महा धाम । कल्पांतमें महद्ब्रह्म । तुझमें विलीन ॥ १७ ॥ वास्तवमें तू ही है देव । विश्व विस्तारता सदैव । अनंत रूप देवदेव । अवर्णनीय ॥ १८ ॥ देवादि तू, देव पुराण आत्मा संसारका अंतिम आसरा तू । तू जानता है तुझ मोक्ष-धाम विस्तारिता विश्व अनंत रूप ॥ ३८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३८४