ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसागरका जैसे आपोशन करना । तथा मेरु-पर्वतका कौर भरना । संपूर्ण ब्रह्मांड ही धरके चबाना । अपनी डाढोंसे ॥ ४३० ॥ सभी दिशाओंको निगल जाना । तारागण नभके चाट जाना । ऐसी सहज-लालसा धरना । यह है तेरा काम ॥ ३१ ॥ जैसे भोगसे है काम बढ़ता । ईंधनसे अग्नि धू धू करता । वैसे खा खा कर होठ चाटता । अधिक आशासे ॥ ३२ ॥ किया कैसा यह एक ही पसारा । जिह्वाग्रे रखा त्रिभुवन सारा । डाला है यह एक छोटासा कौर । वडवानलमें ॥ ३३ ॥ ऐसे हैं जो अगणित वदन । आर्थ कैसे इतने त्रिभुवन । इससे क्षुधा न होती सहन । बढती असह्य ॥ ३४ ॥ अजी ! है यह विश्व बेचारा । वदन-ज्वालामें पडा सारा । दावानलका पडा है घेरा । भेडों पर यहां ॥ ३५ ॥ विश्वका ऐसा हुआ अब । दैव कर्म नहीं आया तब । चराचर पर फैला सब । अकालका जाल ॥ ३६ ॥ विश्व-रूपका यह तेज-मंडल । बहुलियाका फैलाया हुआ जाल । मुख नहीं लाक्षाग्नि-ज्वाल । घेरता चराचरको ॥ ३७ ॥ जलाती कैसी अपनी दाहकता । इस बातको अग्नि नहीं जानता । किंतु जो जलता है वह जानता । नहीं बचते उसके प्राण ॥ ३८ ॥ अजी ! अपनी तीखी धारसे कैसे । न जानता शस्त्र-घात होता जैसे । अपना विनाश न जानता वैसे । हालाहल विष ॥ ३९ ॥ वैसे तुझको भी ज्ञात है नहीं । अपनी उग्रताकी बात सही । प्रत्येक मुखसे यहां हो रही । विनाश-लीला ॥ ४४० ॥ यदि तू है आत्मा एक । सकल विश्व-व्यापक । तब हमारा अंतक । हो आया कैसे ॥ ४१ ॥ छोडी मैंने जीवितकी आस । तू भी छोड दे संकोच खास । कह अपनी भानकी क्या खास । बात है आज ॥ ४२ ॥ ३७५ विश्व-रूप-दर्शनयोग