भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 441

कृतांतके जो जो हथियार क्रूर । निगलते एकेक स-चराचर । निगलता तू ऐसा शस्त्र भांडार । करोडोंका ॥ ९६ ॥ चतुरंग-सेना परिवार । स-अश्व-रथ पकड़कर । दांत न लगाते विश्वेश्वर । निगलता तू ॥ ९७ ॥ भीष्मसे ऐसा है कौन । सत्यशौर्यमें प्रवीण । तथा जो द्रोण ब्राह्मण । तूने चबाया ॥ ९८ ॥ ओ ! वह सहस्र-कर-कुमार । गयारे गया व्यर्थ जो कर्ण वीर । तथा हमारे अनेक महावीर । खा गया तू ॥ ९९ ॥ कैसा हे देव ! यह विधि विधान । मेरी मांगसे विश्व-रूप-दर्शन । करता वह विश्वका निकंदन । चाहता था मै शांति ॥ ४०० ॥ तूने कही पहले उपपत्ति । बताई थी यहां कुछ विभूति । छोडके वह मैं हो मंदमति । मांगा दर्शन ॥ १ ॥ होनी है जो त्रिकालमें भी नहीं चूकती । बुद्धि भी उसका अनुकरण करती । मेरे दैवमें अजी ! यही बात बधीथी । उसका उपाय क्या ? ॥ २ ॥ अमृत भी पहले हाथ आया । देवोंको उससे तोष न भया । फिर कालकूटको जन्म दिया । अंतमें जैसे ॥ ३ ॥ किंतु वह था जो किंचित । निराकरण योग्य बात । उसे किया है तब शांत । पीके शंभुने ॥ ४ ॥ जलता बवंडर अब कौन लपेटता । विष भरा आकाश कौन निगलता । महाकालके कालसे कौन खेलता । सामर्थ्यवान हो ॥ ५ ॥ अर्जुन ऐसे शोकमें गळता । हृदयमें अति संतप्त होता । मनोगत वह नहीं जानता । देवदेवेशका यहां ॥ ६ ॥ परमात्मका मनोगत— कौरव मरते और मैं मारता । अर्जुन ऐसे मोहग्रस्त हुवा था । श्रीकृष्णको उसे दूर करना था । यह रूप दिखाके ॥ ७ ॥ ३७१ विश्व-रूप-दर्शनयोग