ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस बचनमें कहीं । अन्यथा कछु भी नहीं । मेरी प्रतिज्ञा है यही । सौगंध पूर्वक ॥ ३ ॥ अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥ ९ ॥ मद्रूपका क्षणिक अनुभव-अभ्यास-योग— अथवा यह चित्त । मन बुद्धि सहित । मुझको अचुंबित । न दे सके तो ॥ ४ ॥ तब तो ऐसा कर । दिनमें क्षण भर । सबको भूलकर । रत हो मुझमें ॥ ५ ॥ जिससे तू निमिष एक । अनुभवेगा मेरा सुख । उससे होगा अरोचक । विषय-मात्र ॥ ६ ॥ जैसा शरत्काल आता । सूखते जाती सरिता । वैसी छूटेगी ममता । प्रपंचसे ॥ ७ ॥ फिर पूर्णमासीसे जैसे । शशि-बिंब लगता वैसे । अमावसमें पूर्णरूपसे । मिट जाता है ॥ ८ ॥ ऐसे वासनासे निकलकर । मुझमें चित्त चुभते जाकर । धीरे धीरे वह अर्जुन स्थिर । होगा मद्रूप ॥ ९ ॥ अजी ! अभ्यास योगका अर्थ । एक ही जो है सर्व समर्थ । जिससे न होगा कुछ प्राप्त । ऐसा नहीं ॥ ११० ॥ सुन अभ्यासका बल । देता मति अन्तराल । व्याघ्र सर्पको प्रांजल । करते इससे ॥ ११ ॥ विषका ही आहार बनता । सागरपे पगसे चलता । कोई वाग्ब्रह्मको ही जीतता । अभ्यास बलसे १२ ॥ करना चित्तको शांत असाध्य मुझमें तब । अभ्यास योगसे चाह तू मेरी प्राप्तिको कर ॥ ९ ॥ ४१५ भक्तियोग