ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअभ्यासको कुछ नहीं । सर्वथा दुष्कर कहीं । इसलिए मुझमें ही । उससे रत हो ॥ १३ ॥ अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥ निराग्रह वृत्तिसे जीवन-यापन— अथवा अभ्यासमें ऐसा । न आता साहस सहसा । तब रह अब है जैसा । अर्जुन तू ॥ १४ ॥ इन्द्रियोंका निग्रह न कर । विषय-भोग कम न कर । याभिमानका त्याग न कर । स्वजातिका ॥ १५ ॥ कर कुल धर्माचरण । विधि निषेधका पालन । तब भी सुखसे जीवन । चलता रहता है ॥ १६ ॥ किंतु काया वाचा मन । करता जो आचरण । उसका जो अहंपन । न मान तू ॥ १७ ॥ जिसको है विश्व चलाना । पूर्ण यह उसने जाना । करना या नहीं करना । उसका काम ॥ १८ ॥ उसमें कुछ जो न्यून पूर्ण । उससे अछूता रख मन । स्वजातिके लिए ही जीवन । देकर तू ॥ १९ ॥ जैसा ही माली चलाता ले जाता । वैसा ही पानी है सहज जाता । यदि तू वैसा ही करता जाता । निराभिमानसे ॥ १२० ॥ वैसे ही देख तू पार्थ । कैसा है अपना पथ । देखता क्या यह रथ । अल्पसा भी ॥ २१ ॥ तभी प्रवृत्ति या निवृत्ति । इससे दूर रख मति । तथा अखंड चित्त-वृत्ति । मेरे स्मरणमें ॥ २२ ॥ अभ्याससे न हो साध्य तब मत्कर्म आचर । मिलेगी तुझको सिद्धि सत्कर्म करने पर ॥ १० ज्ञानेश्वरी ४१६