ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अभ्यासको कुछ नहीं । सर्वथा दुष्कर कहीं । इसलिए मुझमें ही । उससे रत हो ॥ १३ ॥ अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥ निराग्रह वृत्तिसे जीवन-यापन— अथवा अभ्यासमें ऐसा । न आता साहस सहसा । तब रह अब है जैसा । अर्जुन तू ॥ १४ ॥ इन्द्रियोंका निग्रह न कर । विषय-भोग कम न कर । याभिमानका त्याग न कर । स्वजातिका ॥ १५ ॥ कर कुल धर्माचरण । विधि निषेधका पालन । तब भी सुखसे जीवन । चलता रहता है ॥ १६ ॥ किंतु काया वाचा मन । करता जो आचरण । उसका जो अहंपन । न मान तू ॥ १७ ॥ जिसको है विश्व चलाना । पूर्ण यह उसने जाना । करना या नहीं करना । उसका काम ॥ १८ ॥ उसमें कुछ जो न्यून पूर्ण । उससे अछूता रख मन । स्वजातिके लिए ही जीवन । देकर तू ॥ १९ ॥ जैसा ही माली चलाता ले जाता । वैसा ही पानी है सहज जाता । यदि तू वैसा ही करता जाता । निराभिमानसे ॥ १२० ॥ वैसे ही देख तू पार्थ । कैसा है अपना पथ । देखता क्या यह रथ । अल्पसा भी ॥ २१ ॥ तभी प्रवृत्ति या निवृत्ति । इससे दूर रख मति । तथा अखंड चित्त-वृत्ति । मेरे स्मरणमें ॥ २२ ॥ अभ्याससे न हो साध्य तब मत्कर्म आचर । मिलेगी तुझको सिद्धि सत्कर्म करने पर ॥ १० ज्ञानेश्वरी ४१६
जैसे वृक्ष अथवा वेल। गिर देते हैं पक्व फल। वैसे तज दें फल सकल। कर्म सिद्धिके ॥ ज्ञा. १२-१२९
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कर्म जो होता है तुझे प्राप्त । न मान तू अल्प या बहुत । चुपचाप कर तू अर्पित । मुझको सदा ॥ २३ ॥ ऐसी ही मद्भावना । तन त्यागमें अर्जुना । तू सायुज्य सदन । पायेगा मेरा ॥ २४ ॥ कर्म-रत रहकर कर्म फल समर्पण— अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥ न तो यह भी तुझे । न दे सके कर्म मुझे । तब तू सतत मुझे । भजते जा ॥ २५ ॥ बुध्दिके पेट पीठमें । कर्मके आदि अंतमें । मुझको जोड़ देनेमें । यदि है दुस्तर ॥ २६ ॥ तो यह भी रहने दो । मदर्पणकी जाने दो । किंतु निग्रही होने दो । बुध्दि तेरी ॥ २७ ॥ और जैसे जिस काल । कर्म होते हैं सकल । उसके वे सब फल । तजते जा ॥ २८ ॥ जैसे वृक्ष अथवा वेल । गिरा देते हैं पक फल । वैसे त्यज दे फल सकल । कर्म सिद्धिके ॥ २९ ॥ मनमें मेरा करना स्मरण । अथवा मुझे करना अर्पण । यदि है तुझे यह अग्रहण । जाने दे शून्यमें ॥ ३० ॥ जैसे पत्थर पे पड़ी वर्षा व्यर्थ । तथा आगमें हुई बुवाई व्यर्थ । अथवा देखा हुआ स्वप्न है व्यर्थ । वैसा कर्म-फळ ॥ ३१ ॥ अजी ! जैसे आत्मजामें । जीव निष्काम मनमें । वैसे सकल कर्ममें । अकाम होना ॥ ३२ ॥ ऐसा कर्म न होता तो मुझमें योग साधके । यत्नसे छोड़ तू सारे कर्मके फल अर्जुन ॥ ११ ॥ (53) ४१७ भक्तियोग
जैसे उठती अग्नि-ज्वाल । आकाशमें व्यर्थ सकल । वैसे लय हो कर्म-फल । शून्यमें ही ॥ ३३ ॥ अर्जुन यह जो फल त्याग । दीखता है अति असंग । योगमें है यह महायोग । सर्वोत्कृष्ट ॥ ३४ ॥ फल-त्याग यह अविकार । जिससे न हो कर्म विस्तार । अंकुरता वेणु एक बार । उसी भांति ॥ ३५ ॥ इस शरीरसे ही शरीर । पाना है रुकता बार बार । पुनरागमनपे पत्थर । पड़ता मानो ॥ ३६ ॥ अभ्यासकी महत्ता— फिर अभ्यासका सोपान । सौंपता है ज्ञानका स्थान । ज्ञानसे ध्यानका मिलन । सहज होगा ॥ ३७ ॥ ध्यानका तब आलिंगन । करते हैं भाव संपूर्ण । रहते तब दूर जान । कर्म-जात ॥ ३८ ॥ जहां कर्म ही दूर है । फल-त्याग सरल है । त्यागका जो सहज है । शांति-सुख ॥ ३९ ॥ शांतिके लिये है तब । अभ्यास करना अब । क्रमागत ही है सब । सुभद्रापति ॥ १४० ॥ श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते । ध्यानात् कर्मफलत्यागः त्यागाच्छान्तिरनंतरम् ॥ १२ ॥ अभ्याससे भी गहन । अर्जुन फिर है ज्ञान । ज्ञानसे भी है जो ध्यान । महत्वका ॥ ४१ ॥ फिर है कर्म-फल-त्याग । जो है ध्यानसे भी सुभग । उससे श्रेष्ठ है जो भोग । शांति सुखका ॥ ४२ ॥ मिलता यज्ञसे ज्ञान होती तन्मयता फिर । तब पूर्ण फल-त्याग देता है शांति सत्वर ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी ४१८
अध्याय ९: राजविद्याराजगुह्ययोग
यह है ऐसा पथ । इस पथसे पार्थ । शांतिका ही मध्यस्थ । प्राप्त करता है ॥ ४३ ॥ अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुणा एव च । निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥ भक्तकी स्थिति-गुण-विकास— अजी प्राणि मात्रमें कहीं । द्वेषका जो नाम भी नहीं । आप-पर-भाव भी नहीं । चैतन्यका-सा ॥ ४४ ॥ उत्तमका करना स्वीकार । अधमका करें अस्वीकार । नहीं जानती ऐसा प्रकार । जैसे धरणी ॥ ४५ ॥ राजाके तनको चलाना । रंक-शरीरको हनना । न सोचता कृपालु प्राण । वैसा ही वह ॥ ४६ ॥ करें गायका तृषा-निवारण । विष बन व्याघ्रको दे मरण । न जानता ऐसा एक भी क्षण । नदी-नीर ॥ ४७ ॥ वैसे हैं सभी भूत-मात्र । उसके समान जो मित्र । जैसे धात्रीको है सर्वत्र । सम-भाव ॥ ४८ ॥ मैं तूकी भाषा बोलना । सुख-दुःखको जानना । “मेरा” ऐसा भी कहना । नहीं है उसे ॥ ४९ ॥ क्षमामें वैसी ही क्षमता । धरित्री समान योग्यता । संतोष नित है बढ़ता । उसकी गोदमें ॥ १५० ॥ संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥ किसीका न करे द्वेष दया मैत्री बना क्षमा । मैं मेरा सब भूला जो सहके सुख दुःखको ॥ १३ ॥ सदा संतुष्ट जो योगी संयमी दृढ निश्चयी । मन-बुद्धि मुझे देता भक्त है मुझको प्रिय ॥ १४ ॥ ४१९ भक्तियोग
वर्षा-ऋतुके बिना सागर । पूर्ण रहता आत्म-निर्भर । वैसा ही वह निरुपचार । सदा-संतुष्ट ॥ ५१ ॥ देकर अपनी सौगंध । देता है हृदयको बोध । इससे निश्चयमें बाध । न आता कभी ॥ ५२ ॥ हृदय-भुवनमें जिसके । एक ही आसन पे बैठके । शासन करते विराजके । जीव-परमात्मा ॥ ५३ ॥ ऐसी योग समृद्धि । पाकर निरवधि । चढाके मन-बुद्धि । मुझपे ही ॥ ५४ ॥ बाहर भीतर योग । शुद्धतामें भी सुबग । फिर भी ममानुराग । जिसे सप्रेम ॥ ५५ ॥ अर्जुन ऐसे जो भक्त । वही योगी तथा मुक्त । वह वल्लभा मैं कांत । ऐसे जान ॥ ५६ ॥ उससे मुझे जो प्रेम है । जीवनसे भी अधिक है । यह बात भी अपूर्ण है । कहूं कैसे ॥ ५७ ॥ अजी ! भक्तोंकी जो कहानी । मुझपे मोहके मोहिनी । अकथनीय है कथनी । कहलाती श्रद्धा ॥ ५८ ॥ इसीलिए जी हम । कह गये उपमा । वैसे तो वह प्रेम । रहता मौन ॥ ५९ ॥ रहने दो यह किरीटी । प्रिय जनोंकी यह जो गोष्टि । प्रेमसे जो पुलक उठी । अति वेगसे ॥ १६० ॥ उसपर भी हे पार्था । सकल संवाद-कर्ता । उसको यहां यथार्थ । उपमा भला ॥ ६१ ॥ इसीलिए पांडुसुता । प्रिय तू औ' तू ही श्रोता । फिर प्रियकी ही वार्ता । प्रसंग आया है ॥ ६२ ॥ तभी मैं अब बोलता । बोलका सुख भोगता । कहके हरि डुलता । आनंद मगन ॥ ६३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२०
फिर कहता यह सुन । उस भक्तके ये लक्षण । उसको मैं अंतःकरण । आसनार्थ देता हूं ॥ ६४ ॥ यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥ भक्त भय-उद्वेग रहित— जैसे सागरके भीतर । भीत न होता जलचर । या जलचरोंसे सागर । उकताता नहीं ॥ ६५ ॥ वैसे ही उन्मत्त जगत । न करता उसे दुखित । तथा न ऊबता जगत । उससे कभी ॥ ६६ ॥ अथवा मान तू पांडव । जैसे तनको अवयव । नहीं ऊबते वैसे जीव । औ' जीवोंसे वह ॥ ६७ ॥ विश्व ही जैसे देह हो गया । इसलिए प्रिया-प्रिय गया । हर्ष शोकादि द्वन्द्व भी गया । द्वैत मिटनेसे ॥ ६८ ॥ ऐसा द्वन्द्वसे जो मुक्त । भय उद्वेग रहित । फिर भी अनन्य भक्त । वह मेरा ॥ ६९ ॥ तभी है वह मेरा प्रिय । दिखाऊँ कैसा मेरा हिय । वह है मुझमें तन्मय । इससे जीता हूं ॥ १७० ॥ जो है निजानन्दमें तृप्त । मानो ब्रह्मको जन्म प्राप्त । पूर्णताका वह है आप्त । वल्लभ जैसा ॥ ७१ ॥ अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥ ऊबता जो न लोगोंसे न ऊबे उससे जन । हर्ष-शोक भय क्रोध न जाने जो मुझे प्रिय ॥ १५ ॥ नहीं व्यथा उदासीन दक्ष निर्मल निस्पृह । तजे आरंभ जो सारे भक्त है मुझको प्रिय ॥ १६ ॥ ४२१ भक्तियोग
संतका पावन चरित— न है उसमें अपेक्षा । वैसी ही नहीं उपेक्षा । जीवन बिन आकांक्षा । केवल आत्मोत्कर्ष ॥ ७२ ॥ मोक्ष देनेमें उदार । काशी नामका आदर । किंतु उसमें शरीर । त्यजना होगा ॥ ७३ ॥ पाप हरता हिमवंत । भयभीत कर जीवित । संतका पावन चरित । वैसा नहीं ॥ ७४ ॥ पावन है गंगोदक । पाप तापका शामक । किंतु उसमें है एक । डूबनेका भय ॥ ७५ ॥ गहराई जिसकी अपार । किंतु डूबनेका है डर । रोकड़ मोक्षका है घर । जीवनमें ही ॥ ७६ ॥ संतोंके चरण स्पर्शसे । मुक्त है गंगा भी पापसे । ऐसे संत-संगके कैसे । कहना शुचित्व ॥ ७७ ॥ अजी ! यह रहने दो अब । बना तीर्थोंका आश्रय सब । धोकर मनका मल शुभ- । शुचित्वसे ॥ ७८ ॥ होता तन मनसे निर्मल । सूर्यके समान है उज्ज्वल । तत्त्वार्थिथोंमें है पायल । ब्रह्म-धनका ॥ ७९ ॥ व्यापक तथा उदास । रहता जैसे आकाश । वैसे उसका मानस । सदा-सर्वत्र ॥ १८० ॥ जो है संसार-व्यथासे मुक्त । निरपेक्षाळंकार-भूषित । मानो व्याध-बाणसे विमुक्त । विहंगमसा ॥ ८१ ॥ सुखमें जो है लीन सतत । न होती कभी टीस प्रतीत । न जाने जैसे लज्जाको प्रेत । उसी भांति ॥ ८२ ॥ तथा कार्यारंभका है नहीं । अहंकार तनिक भी कहीं । जैसा निर्इंधन होके वह्नि । बुझ जाता है ॥ ८३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२२
ऐसा हुआ जब उपशम । मोक्ष-सत्रमें लिखाया नाम । हुआ है वह निष्काम-काम । धनंजय ॥ ८४ ॥ अर्जुन वह यहीं पर । सोऽहं भावसे भरकर । पहुंच चुका उस पार । द्वैत-भावके ॥ ८५ ॥ किंतु भक्ति-सुखके कारण । कर अपना दो विभाजन । सेवा धर्मका अंगीकरण । करता आप ॥ ८६ ॥ अन्यको है मैं कहता । फिर स्तोत्र नहीं होता । भक्तिका मार्ग दिखाता । योगी वह ॥ ८७ ॥ हमें है उसका व्यसन । उसका ही निज-ध्यान । या उसमें ही समाधान । मिलता हमको ॥ ८८ ॥ उसके लिये रूप-धारण । इस विश्वमें अवतरण । न्योछावर है उसपे प्राण । सर्व-भावसे ॥ ८९ ॥ यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥ जो आत्म लाभके समान । सुन्दर कछु नहीं आन । तभी भोगमें न दें मन । न हो आनंदित ॥ ९० ॥ आप ही है विश्व बन गया । भेद भाव सहज धो गया । तब द्वेश भी है मिट गया । उस पुरुषका ॥ ९१ ॥ जो है अपना संतत्व । कल्पांतमें है अस्तित्व । तभी भूतका है स्वत्व । कभी न सोचता ॥ ९२ ॥ तथा उसके परे कुछ भी नहीं । अपना जो है अपने पास यहीं । तभी उसकी आकांक्षा है ही नहीं । कुछ भी कभी ॥ ९३ ॥
न उल्लास न संताप न चाह सोच भो नहीं । भला बुरा सभी छोडा भजता जो मुझे प्रिय ॥ १७ ॥ ४२३ भक्तियोग
बीभत्स है या सुंदर । न जाने वह अंतर । जैसे जाने ना भास्कर । दिन औ' रात ॥ ९४ ॥ ऐसे बोधसे केवल । रहता है जो निष्कल । फिर भी भजनशील । मुझमें वह ॥ ९५ ॥ उसके समान और । नहीं हमें प्रियकर । कहता हूं धनुर्धर । सौगंध तेरी ॥ ९६ ॥ समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥ १८ ॥ भक्तकी सम-भावना— जिसके मनमें पार्था । नहीं वैषम्यकी वार्ता । रिपु-मित्रकी समता । रहे सदा ॥ ९७ ॥ अपनोंको प्रकाश देना । परायोंको अंधेरा देना । जैसा दीप यह सोचना । जानता नहीं ॥ ९८ ॥ करता जो वृक्ष-छेदन । या करता गाछ-पालन । दोनोंको दे छाया समान । जैसा वृक्ष ॥ ९९ ॥ मालीको देता मीठा रस । पेरकको न खट्टा रस । सबको है मधुर रस । देता ईख-सा ॥ २०० ॥ शत्रु-मित्रमें तैसा । उसका भाव ऐसा । रहता है एकसा । मानापमानमें ॥ १ ॥ तीनों ऋतुओंमें समान । रहता है जैसा गगन । वैसा ही एक समान । शीतोष्ण जिसे ॥ २ ॥ दक्षिण उत्तर मारुत । जैसा है मेरु पांडुसुत । तैसा सुख दुःख हो प्राप्त । मध्यस्थ है जो ॥ ३ ॥ सम जो शत्रु-मित्रोंमें मानापमानमें सम । शीतोष्ण सुख दुःखोंमें क्लिप्त सम-भावसे ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२४
चंद्रिकाकी शीतलता । राजा रंककी समता । वैसे जो सकळ भूत । है सामान ॥ ४ ॥ संपूर्ण जगत एक । जैसे सेवन उदक । वैसे उसकी त्रिलोक । करते चाह ॥ ५ ॥ अंतर बाह्य संग । करके सब अंग । शून्य हो अन्तरंग । वस्तुलीन ॥ ६ ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥ विश्व ही मेरा घर ऐसी जिसकी मति-- निंदासे जो न खिन्न । स्तुतिसे न प्रसन्न । रहे जैसा गगन । निर्लेप ॥ ७ ॥ जो निंदा और स्तुति । रखके एक पांति । रमता प्राण-वृत्ति । सदा-सर्वत्र ॥ ८ ॥ सत्यासत्यको जो समान । बोलकर रहता मौन । भोगता है सदा उन्मन । अतृप्त भावसे ॥ ९ ॥ लाभसे जो न हरषाता । न अलाभसे कुम्हलाता । वर्षाके बिन ना सूखता । समुद्र जैसा ॥ २१० ॥ जैसा वायुका इक ठौर । रहता नहीं है आधार । वैसा ही न उसका घर । कहीं रहता ॥ ११ ॥ संपूर्ण आकाश स्थिति । वायुकी नित्य-वसति । वैसे है विश्व विश्रांति- । स्थान उसका ॥ १२ ॥ विश्व ही यह मेरा घर । ऐसी मति जिसकी स्थिर । या हुआ जो सचराचर । अपनेमें आप ॥ १३ ॥ स्तुति-निंदा तजे मौनी संतुष्ट प्राप्त-भोगमें । स्थिर-बुद्धि निराधार भक्त जो है मुझे प्रिय ॥ १९ ॥ ४२५ भक्तियोग (54)
इस पर भी हे पार्थ । मेरे भजनमें आस्था । उसको करू मैं माथा । पर मुकुट ॥ १४ ॥ उत्तमको मस्तक । नमाना क्या कौतुक । मान देता त्रिलोक । पद रेणुको ॥ १५ ॥ श्रद्धा वस्तुका आदर । करना जानो प्रकार । होता है यदि शंकर । श्री गुरु ॥ १६ ॥ रहने दो यह भाषा । करनेमें है प्रशंसा । शंभुकी होती सहसा । आत्म-स्तुति ॥ १७ ॥ रहने दो यह उक्ति । कहता है रमापति । लेकर करता स्तुति । माथेपे उसे ॥ १८ ॥ अपने भक्तके अलिंगनके लिये दो हाथ कम पडे— सिद्धि चौथा पुरुषार्थ । लेकर अपने हाथ । चला है जो भक्ति-पंथ । देते विश्वको ॥ १९ ॥ कैवल्यका ले अधिकार । करे मोक्षका व्यवहार । रहता नम्र जैसा नीर । स्वभावसे ॥ २२० ॥ उसको करूंगा नमस्कार । मुकुट धरूंगा सिरपर । चरण हृदय पीठ पर । पूजूंगा मैं ॥ २१ ॥ उसके गुणका भूषण । होगा मेरी वाणीका गान । उसकी कीर्तिका श्रवण । प्रेमसे करूंगा ॥ २२ ॥ उसके दर्शनका प्रलोभन । बने मुझ अचक्षुके नयन । करूं लीला सुमनसे पूजन । उसका मैं ॥ २३ ॥ अजी ! दो पर दो और । कर लेकर मैं चार । आलिंगनार्थ आतुर । आया उसके ॥ २४ ॥ उसके संगके सुखके लिये । आया हूं विदेही मैं देह लिये । उसके प्रेम बखानके लिये । वाणी है असमर्थ ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२६
उसका मैं हूं मित्र । उसमें क्या विचित्र । सुनता जो चरित्र । उसका वह ॥ २६ ॥ करता है गुणगान । उससे भी मैं प्रसन्न । वह है प्राण समान । मुझको प्रिय ॥ २७ ॥ अजी ! यह सांगत । कहा है जो प्रस्तुत । भक्तियोग समस्त । योग-रूप ॥ २८ ॥ करता उसका आदर । धरता उसे सिरपर । उस स्थितिकी है अपार । श्रेष्ठता सुन ॥ २९ ॥ ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥ भक्त क्या ? मुझे अत्यधिक मधुर है— गोष्ठि है यह रम्य । अमृत धारा धर्म्य । करें प्रतीति-गम्य । सुनकर ॥ २३० ॥ श्रद्धाका जिसमें आदर । उरमें इसका विस्तार । होता है चितमें सत्वर । अनुष्ठान सुलभ ॥ ३१ ॥ जैसे किया है निरूपण । वैसे ही मनका धारण । तभी सुक्षेत्रमें रोपणं । हुआ मानो ॥ ३२ ॥ मुझे मानकर परम । इसीलिये करके प्रेम । यही सर्वस्व सर्वोपम । मान लेते जो ॥ ३३ ॥ विश्वमें अजी पार्थ । वही योगी औ' भक्त । उत्कंठा है तदर्थ । मुझको सदा ॥ ३४ ॥ वही तीर्थ वही क्षेत्र । विश्वमें हैं वे पवित्र । भक्ति कथाका हैं मित्र । सदैव ही ॥ ३५ ॥ —————— जो धर्म-सार है नित्य मुझमें लीन होकर । सेते श्रद्धालु जो भक्त अत्यंत प्रिय है मुझे ॥ २० ॥ ४२७ भक्तियोग
करता म उनका ध्यान । मेरा यह देवतार्चन । उस बिना माने ना मन । दूसरा भला ॥ ३६ ॥ उसका है मुझे व्यसन । मेरा वह निधि निधान । अथवा मेरा समाधान । उनके मिलनमें ही ॥ ३७ ॥ ऐसी प्रेमकी वार्ता । जो है अनुवादता । है परम देवता । हमारी वह ॥ ३८ ॥ ज्ञानदेवका सगुण कृष्ण— जो है निज-जनानंद । तथा जगदादिकंद । कहता है श्री मुकुन्द । बोला संजय ॥ ३९ ॥ होता है जो निर्मल । निष्कल लोक कृपाल । शरणागत प्रतिपाल । शरण्य वह ॥ ४० ॥ वह है धर्म-कीर्ति धवल । अगाध-दातृत्वमें सरल । तथा अतुल बल प्रबल । बलि बंधन ॥ ४१ ॥ सुर-सहायशील । लोक-लालन-लील । प्रणत-प्रतिपाल । खेल जिसका ॥ ४२ ॥ भक्त-जन-वत्सल । प्रेमी-जन-प्रांजल । सत्य-केतू सरल । कला निधि ॥ ४३ ॥ वह कृष्ण वैकुंठका । चक्रवर्ति अपनोंका । कहता बोल प्रेमका । सुनता पार्थ ॥ ४४ ॥ संजय कहता श्रीकृष्ण । अब करेंगे निरूपण । कीजिये आप श्रवण । धृतराष्ट्रसे ॥ ४५ ॥ ज्ञानदेव कहता तुम । संत सेवा करना हम । सिखाया है महा-महिम । निवृत्तिनाथने ॥ ४६ ॥ गीता श्लोक ५५ ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८.
१३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग आत्म-रूपी गणेश वंदन— आत्म-रूप गणेश स्मरण । जो सकल विद्याधिकरण । नमन करें वे श्रीचरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥ करनेसे जिसका स्मरण । शब्द-सृष्टि होती स्वाधीन । चढ़ता सारस्वत संपूर्ण । जिह्वा पर ॥ २ ॥ तब है वक्तृत्वकी मधुरता । हठाती अमृतकी मधुरता । नव-रस है चूता ही रहता । अक्षरोंसे ॥ ३ ॥ भावोंका अवतरण । स्पष्ट करता है चित्र । हस्तामलकसा पूर्ण । होता तत्व-भेद ॥ ४ ॥ श्रीगुरुके जब पाय । पकडता है हृदय । महा-भाग्यका समय । उन्मेषका वह ॥ ५ ॥ उनको करके मैं वंदन । पितामहका पिता महान । कहता जो श्रीलक्ष्मीरमण । कहूंगा वह ॥ ६ ॥ भगवान उवाच इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥ श्रीभगवानने कहा इस शरीरको पार्थ कहते क्षेत्र जान तू । जानता यह जो क्षेत्र क्षेत्रज्ञ कहते उसे ॥ १ ॥
आत्मानात्म विचार- सुन तू अब यह पार्था । देह है क्षेत्र कहलाता । इसको जो सही जानता । वह है क्षेत्रज्ञ ॥ ७ ॥ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥ यहां है जो क्षेत्रका पालक । मुझको जान क्षेत्रज्ञ एक । बन सभी क्षेत्रका रक्षक । रहता हूं मैं ॥ ८ ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको मान । जानना है यहां ज्ञान । समझें हम अर्जुन । इस समय ॥ ९ ॥ तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् । स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥ तभी हमने है क्षेत्र कहा । किस भावसे देहको यहां । कहता हूं प्रयोजन सह । सुन तू पार्थ ॥ १० ॥ इसको क्षेत्र क्यों कहना । इसका पैदा कैसा होना । किन विकारोंसे बढ़ना । कहता हूं यही ॥ ११ ॥ यह क्या तीन अर्ध हाथका है । या इससे भी अधिक बड़ा है । यह बंजर है या उर्वरा है । तथा है किसका ॥ १२ ॥ इत्यादि इसके सर्व । जो जो हैं वे सभी भाव । कहूंगा यह अपूर्व । सुन तू सावधान हो ॥ १३ ॥ शरीरके विषयमें भिन्न भिन्न विचार- क्षेत्रज्ञ मुझको जान बसा मैं सब क्षेत्रमें । क्षेत्र क्षेत्रज्ञका ज्ञान उसे मैं ज्ञान मानता ॥ २ ॥ क्षेत्र क्या उसमें कैसे विकार रहते कहो । कैसा क्षेत्रज्ञ कौन कहवा सुन तू यह ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३०
अजी ! इसी स्थलके कारण । श्रुतिका चलता है भाषण । तर्ककी वाद वैखरी तीक्ष्ण । इसके लिये है ॥ १४ ॥ छाननेमें यह स्थान । थक गये हैं दर्शन । मिटे नहीं जो घर्षण । उनके कभी ॥ १५ ॥ अजी ! शास्त्रोंका भी नाता । इससे ही है टूटता । तथा इसीसे जुड़ता । झगडा जगतका ॥ १६ ॥ बातसे बात न मिलती । एक-वाक्यता नहीं होती । बनके वाचालता युक्ति । हुई समर्थ ॥ १७ ॥ न जाने किसका है यह स्थल । किंतु कैसी अभिलाषाका बल । घर घरमें है यह कपाल- । मोक्ष गाथा ॥ १८ ॥ नास्तिकोंसे करने मुठभेड़ । वेदोंने किया विद्रोह प्रचंड । उसको देख कर हैं पाखंड । बकवाद करते ॥ १९ ॥ कहते तुम निर्मूल । झूठा तुम्हारा वाग्जाल । प्रण हमारा है सबल । बीडा उठाकर ॥ २० ॥ पक्ष है जो पाखंड । नग्न लुंचित-मुंड । नियोजित वितंड । आते भानपे ॥ २१ ॥ मृत्यूके कसे हुए पाशमें । जायेगा यह इस भयमें । चले योगी-जन निर्णयमें । इस क्षेत्रके ॥ २२ ॥ मृत्यूसे हैं जो भयग्रस्त । करते वनमें एकांत । यम-दम-अभ्यास-रत । हो पाते पूर्ण ॥ २३ ॥ इस क्षेत्राभिमान मगन । कैलास तजता है ईशान । बसता है जाकर स्मशान । उलझन भयसे ॥ २४ ॥ इस प्रतिज्ञासे शंकर । सिकुडकर सभी ओर । करता राख घूस-खोर । मन्मथकी भी ॥ २५ ॥ तथा सत्य-लोक-नाथ । वदन चार वादार्थ । किंतु वे नहीं सर्वथा । जानते कुछ ॥ २६ ॥ ३३१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वर द्वारा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विषयमें भिन्न भिन्न मतोंका विवेचन— आत्मानात्म विवेक जीववादी दृष्टिसे- एक कहता यह स्थल । जीवका ही है सहमूल । फिर प्राण है यह कुल । उसका यहां ॥ २७ ॥ घरमें उस प्राण के । चार भाई जो उसके । तथा मन-सा जिसके । प्रबंधक है ॥ २८ ॥ इन्द्रिय-बैलोंका जो समूह । नहीं देखता काल प्रवाह । करता है श्रम बिना आह । विषय-खेतमें ॥ २९ ॥ खोकर विहित-कर्म अवसर । अन्याय-बीजकी बुवाई कर । कुकर्मार्थ सब परिश्रम कर । फसल काटता ॥ ३० ॥ तभी उसीके समान । पाता है पाप जो मन । भोगता दुःख महान । जन्म-कोटि ॥ ३१ ॥ या विधिवत कर उद्यान । किया सत्कर्म-बीजारोपण । शत शत है जन्मानुदिन । सुख-भोग ॥ ३२ ॥ प्रकृतिवादियोंकी दृष्टिसे— कहते हैं तब कुछ औ । जीवका न कहो यह ठौर । हमसे जानो इसका विचार । पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ अजी ! है यहां जीव पथिक । चलती राहमें रहा रुक । प्राण है जो यहां मालिक । जग रहा है ॥ ३४ ॥ यहां जो अनादि प्रकृति है । सांख्य जिसके गीत गाते हैं । खेत यह उसकी वृत्ति है । जान तू यह ॥ ३५ ॥ गाया विविध मंत्रोंमें ऋषियोंने इसे पृथक् । कहा है ब्रह्म-सूत्रोंमें सप्रमाण सुनिश्चित ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३२
इसके पास है साधन । घरका ही है बारदान । तब बनती है किसान । अपने आप ॥ ३६ ॥ झमेलेमें नित चतुर । इसके हैं तीन कुमार । करते सब कारोबार । गुण हैं जो ॥ ३७ ॥ रजो-गुण बुवाई करता । सत्व जो उसको संभालता । तमोगुण फसल काटता । अकेला ही ॥ ३८ ॥ महत्तत्वका रच खलिहान । काल-सांडसे कराके मांडन । अव्यक्तका वहां ढेर महान । होता रहता है ॥ ३९ ॥ संकल्प वादियोंकी दृष्टिसे- तब कहते कुछ बुद्धिमान । प्रकृति वादियोंसे बुरा मान । यह है अति आर्वाचीन । आप लोगोंका ॥ ४० ॥ अजी ! चित देकरके हो स्वस्थ । सुनो तुम यह क्षेत्र-वृत्तांत । तत्वमें कहां प्रकृतिकी बात । कहते हैं यह ॥ ४१ ॥ वह शून्य शय्यागृहमें । पूर्णावस्थाकी लीनतामें । शक्त-संकल्पने शय्यामें । निद्रा की थी ॥ ४२ ॥ जगा जो वह अकस्मात । उद्योगमें था भाग्यवंत । मिली है पूंजी अमानत । इच्छ-मात्रसे ॥ ४३ ॥ निराकारके उद्यानमें । त्रिभुवनकी समतामें । आया जो है व्यक्त रूपमें । उससे यह ॥ ४४ ॥ महा-भूतोंकी जो ऊसर । कसके उसे उर्वर । भूतग्रामके बांधे चार । सीमा-मेड़ें ॥ ४५ ॥ अजी ! प्रारंभ किया फिर । पंच तत्वात्मक शरीर । समुचित मिश्रण कर । पंच-भूतका ॥ ४६ ॥ कर्माकर्मके पत्थर । रख बांधे दोनों ओर । किया है अति उर्वर । ऊसर था जो ॥ ४७ ॥ आवागमनार्थ यहां फिर । जन्म मृत्युके बांधे गन्हर । रक्षाका ऐसा प्रबंध कर । संकल्पने तब ॥ ४८ ॥ ४३३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (55)