ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन छूता उसका शरीर । वार्धक्य अभी धनुर्धर । तभी करता है विचार । तारुण्यमें वृद्धत्वके ॥ ५४ ॥ कहे आज इस अवसर । बडा हुवा है यह शरीर । होगा सूखा पातसा आखर । कल निश्चित ॥ ५५ ॥ जैसे दैव-हीनके व्यवसाय । मंत्री-हीन राजाके राज-कार्य । वैसे ही होंगे मेरे हाथ पाय । बल-हीन ॥ ५६ ॥ लेनेमें पुष्पोंकी गंध । नाक बनेगी निगंध । जैसे बधिर एकाध । ऊन्टकी टांग ॥ ५७ ॥ जैसे वोढर-पशुके खुर । सढते हैं कीचडमें भर । वैसे ही होगा मेरा शरीर । वार्धक्यसे ॥ ५८ ॥ ईर्शासे जो पद्म-दलसे । लडते नयन ये जैसे । होंगे सडे परवलसे । रूप-हीन ॥ ५९ ॥ भिवयोंके पलक जैसे । झूलेंगे जो गली-छालसे । गिरेंगे आंसू भी उनसे । सडेगा उर ॥ ५६० ॥ गिरगिट कीकरपे दौडता । और कर्तारसे गजबजाता । उसी भांति है लारसे बनता । मुख मेरा ॥ ६१ ॥ रसोई-घरकी नालीमें । बुदबुदाते मांड-सांडमें । वैसे ही सब नाकमें । लथपतायेगा ॥ ६२ ॥ तांबूलसे होंठ सजाकर । हंस हंस दांत दिखाकर । बोलसे मैं सदा स-नागर । दिखाता अकड ॥ ६३ ॥ उन्हीं होंठ पर कल । आयेगी लार उबल । दांत दाढ भी निकल । जायेगी सब ॥ ६४ ॥ अथवा ऋणसे डूब जाता कृषक । वर्षा-झडी में पशु लगाते बैठक । वैसे उठ नहीं सकेगी यकायक । यही जीभ ॥ ६५ ॥ जैसे सूखे हुये तिनके । हवा में उडते घासके । वैसे ही डाढ़ीके बालोंके । होंगे हाल ॥ ६६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४७६