भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तथा झडीसे आषाढ़की । झरनी खाई पहाड़की । वैसे मुखसे लारकी । बहेगी धार ॥ ६७ ॥ बोल तुतला घिघियायेंगे । कान तुतुने बधिरायेंगे । पिंड जकड कुम्हलायेगा । मानो बानर-सा ॥ ६८ ॥ खेतोंमें हौवा जैसे घासका । कांपता खाके झोंका हवाका । वैसे हाल होगा सर्वांग शरीरका । उस समय ॥ ६९ ॥ पैरमें पैर अटकेंगे । हाथ कांप सकुचायेंगे । शरीर-कर्म उपहासेंगे । अपने आपको ॥ ७० ॥ होंगे मलमूत्रादिके द्वार । जैसे टूटे घडेके खापर । और मेरे निधनमें इतर । करेंगे मनौतियां ॥ ७१ ॥ यह देखके कोसेगा जग । होगा तब मृत्युका वियोग । आप्त-जन करेंगे उबग । तब मेरा ॥ ७२ ॥ स्त्रियां कहेंगी मुझको भूत । सुन होंगे बालक मूर्छित । इससे बनूंगा मैं सतत । घृणा-पात्र ॥ ७३ ॥ रातमें खांसीका उबाल । सोये हुये सुन सकल । “कितनोंको खायेगा काल” । कहेंगे “न जाने यह” ॥ ७४ ॥ वार्धक्यका ऐसा विज्ञापन । देख होता वह सावधान । तारुण्यमें ही उसका मन । होता उपशम ॥ ७५ ॥ कहता यह कल आयेगा । आजका भोगमें बीतेगा । आत्म-हितमें क्या रहेगा । अपने पास ॥ ७६ ॥ आनेसे पहले बधिरता । सुनने-योग्य सब सुनता । जब तक पंगु नहीं होता । करता देशाटन ॥ ७७ ॥ जब तक दृष्टि रहती । देखने योग्य देख लेती । जब तक वाचा रहती । गाता मंगल-गान ॥ ७८ ॥ हाथ होंगे ये तब बधिर । जान करता अब अधीर । सत्कर्मको वह निरंतर । दानादिक ॥ ७९ ॥ ४७७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग