ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 550, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंऐसा होगा तब सकल । मन होगा जान पागल । ध्यान-मग्न होता निश्चल । आत्म-ज्ञानमें ॥ ५८० ॥ चोर आयेंगे दिनमें जो जानता । तभी संपत्तीकी व्यवस्था करता । दीप बुझनेसे पहले लगाता । वस्तु सुचारु रूपसे ॥ ८१ ॥ वैसे वार्धक्य कल आयेगा । यह सब ही व्यर्थ जायेगा । तारुण्यमें ही कर रखेगा । सभी व्यवस्था ॥ ८२ ॥ अति दुर्गम-पथ यह जान । संध्याकाल कर अवलोकन । आप मात्र निकला जो अर्जुन । क्या करेंगे चोर ॥ ८३ ॥ ऐसी जराकी आहट पाकर । जो व्यर्थ न हो यह जानकर । बैठा है शत-वृद्ध बनकर । उसको डरना क्या ? ॥ ८४ ॥ फटकी बालोंको फटकना । उससे न निकलना दाना । या राखको ही फिर जलाना । इससे होगा क्या ? ॥ ८५ ॥ करके वार्धक्यका विचार । किया उसका प्रभाव दूर । उसके पास ज्ञान अपार । रहता सदैव ॥ ८६ ॥ वैसे ही नहीं जब अनेक रोग । जिसके नहीं व्यापते सभी अंग । तभी वह आरोग्यका उपयोग । करता सदैव ॥ ८७ ॥ अजी ! सांपके मुखसे । गिरा हुवा कौर जैसे । तज देता सदा वैसे । बुध्दिमान ॥ ८८ ॥ जिसके वियोगसे दुःख । बढ़ते विपत्ति औ' शोक । तजके वैसे स्नेह-सुख । रहता उदासीन ॥ ८९ ॥ अजी ! दोष स्पर्शेंगे कैसे । न करता कर्म जो वैसे । नियमित कर्मेंद्रियोंसे । रोकके रहता ॥ ५९० ॥ ऐसे अनेक युक्तिसे । रहता है दक्षतासे । ज्ञान-संपत्तिका उसे । मानो स्वामी ॥ ९१ ॥ अब और ही एक । लक्षण अलौकिक । कहता सुन नेक । धनंजय ॥ ९२ ॥ ज्ञानेश्वरी ४७८