ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ ९ ॥
१३ ज्ञानके लक्षण, अनासक्ति -
वह अपने शरीर पर । उदास होता इस प्रकार । पथिक पराये वस्तु पर । बैठा हो रक्षक ॥ ९३ ॥
या जैसे है साया वृक्षकी । क्षण भर मिली राहकी । घर पर नहीं उसकी । ममता उतनी भी ॥ ९४ ॥
सायाकी भांति रहता है जैसे । रह कर भी न जानता वैसे । रहता है अलोलुप भावसे । पत्नीमें नित ॥ ९५ ॥
वैसे ही संतानके विषयमें । रहता जैसे पंथी पड़ावमें । अथवा गोरु वृक्षकी सायामें । बैठ जाते हैं ॥ ९६ ॥
यदि वह रहता श्रीमंत । ऐसे रहता है पांडुसुत । जैसे रहा कोई साक्षीभूत । किसीके धनका ॥ ९७ ॥
या तोता जैसे पिंजडेमें । रहना स्वामीकी आज्ञामें । ऐसे वह वेद-आज्ञामें । रहता हो विधेय ॥ ९८ ॥
वैसे ही गृह-दारा-पुत्र- । बना नहीं रखते मित्र । उसको तू जान पवित्र । नींव-ज्ञानकी ॥ ९९ ॥
१४ ज्ञानके लक्षण, अखंड सम-चित्तता—
तथा महा-सिंधु जैसे । ग्रीष्म-वर्षा में एकसे । इष्ट अनिष्ट भी वैसे । जानता नहीं ॥ ६०० ॥
या तीन कालमें नहीं होता । तीन प्रकारका सविता । वैसे सुखदुःखमें रहता । समचित्त वह ॥ १ ॥
निःसंग वृत्ति कर्मोंमें पुत्रादिमें अलिप्तता । प्रिय अप्रिय लाभोंमें अखंड समचित्तता ॥ ९ ॥
४७९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग