ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजहां आकाशकी भांति । साम्यमें खामी न आती । जान तू सुभद्रापति । वहां है ज्ञान ॥२॥ मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥ १५ ज्ञानका लक्षण, निष्काम एकनिष्ठ भक्ति— वैसे ही बिना मेरे कहीं । श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं । ऐसा दृढ निश्चय सही । जिसने किया ॥ ३ ॥ काया-वाचा तथा मनसे । कृत-निश्चय किया ऐसे । मेरे बिना दूसरा ऐसे । नहीं देखते ॥ ४ ॥ या जिसने अपना मन । किया पूर्ण मुझमें लीन । एकत्वमें शय्या-समान । कर लिया है ॥ ५॥ चितामें जाते समय सती । अन्य न सोचती बिना-पति । ऐसे उसकी केवल गति । एकमात्र मैं हूं ॥ ६॥ मिल कर भी जो मिलता रहता । सागरसे नित प्रवाह सरिता । मैं बन कर भी मुझको भजता । वैसे वह सदैव ॥ ७ ॥ जैसे सूर्यके साथ उदय होता । वैसे उसके साथ अस्त होता । यह पारतंत्र्य ही जैसे शोभता । प्रभाको सदैव ॥ ८ ॥ पानीकी सतह पर । उठता है पानी सुंदर । उसे कहते लहर । वैसे वह पानी ही ॥ ९ ॥ अनन्य जो इस प्रकार । हुवा है नित मुझपर । मूर्तिमंत है धनुर्धर । ज्ञान-रूप जो ॥ ६१० ॥ १६ ज्ञानका लक्षण, सदा एकांतमें प्रीति— होती सदा चाह उसकी । तीर्थ-क्षेत्रोंमें रहनेकी । वन-गुहामें एकांतकी । धनंजय ॥ ११ ॥ मुझमें हो अनन्यत्व भक्ति निष्काम निश्चल । एकांतमें रहे प्रीति अरुचि जन-संगमें ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ४८०