भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 553

शैल-कक्षाके गह्वर । जलाशय परिसर । किंतु न चाहे शहर । रहनेके लिये ॥ १२ ॥ एकांत पर उसकी प्रीति । जन-संगमें है अ-प्रवृति । जान तू मनुष्याकार-मूर्ति । ज्ञानकी वह ॥ १३ ॥ कहता ज्ञानके लक्षण । और भी मैं तुझे अर्जुन । तू है अत्यंत बुद्धिमान । सुनो इसे ॥ १४ ॥ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥ १७-१८ ज्ञानका लक्षण, अध्यात्म-ज्ञान, ज्ञेय-दर्शन-- अजी ! परमात्म ऐसे । वस्तु होती है जिससे । दर्शन होता है उसे । कहते हैं ज्ञान ॥ १५ ॥ इस एक ज्ञानके बिन । स्वर्ग-दायक आदि ज्ञान । मानना है वह अज्ञान । निश्चय-पूर्वक ॥ १६ ॥ स्वर्गकी बात वह छोडता । संसारसे नाता ही छोडता । अध्यात्म-ज्ञानमें डूब जाता । सद्भावकासे ॥ १७ ॥ पथिक जैसे चौराहे पर । दूसरे पथोंको तज कर । चलता अपने पथ पर । वैसे ही वह ॥ १८ ॥ कर ज्ञान मात्रका निरीक्षण । दूसरे सबका निराकरण । स्वीकार करता केवल आत्म-ज्ञान । अपने मन-बुद्धिसे ॥ १९ ॥ कहता है सही यह एक । अन्य सभी है भ्रांति-मूलक । ऐसी मति कर स्थिर देख । रहता मेरु-सा ॥ ६२० ॥ ऐसा निश्चय जिसका । आत्म-ज्ञान विषयका । ध्रुव जैसा गगनका । वैसा रहता ॥ २१ ॥ अध्यात्म-ज्ञानमें श्रध्दा तत्वत' ज्ञेय-दर्शन । कहा है इसको ज्ञान अज्ञान विपरीत जो ॥ ११ ॥ ४८१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (61)