भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 554

ऐसे ही मनुष्योंमें ज्ञान । रहता निःसंशय जान । ऐसा ही मन-ज्ञान-लीन । होता है मद्रूप ॥ २२ ॥ बैठनेके बाद होनेका जो हो जाता । वह सब बैठते ही नहीं होता । किंतु ज्ञानमें मन स्थिर हो जाता । बनता ज्ञानी वह ॥ २३ ॥ तथा तत्व-ज्ञान निर्मल । फलता जो एक ही फल । ज्ञेय पर ही जो सरल । जम जाती दृष्टि ॥ २४ ॥ वैसे बोध हुवा जो ज्ञान । हुवा नही ज्ञेय दर्शन । नहीं मिला उसको ज्ञान । ऐसे मानते हम ॥ २५ ॥ अंधेके हाथमें दीप देनेसे । क्या लाभ होगा उसको उससे । कुछ न दीखता जिस दीपसे । लाभ ही क्या भला ॥ २६ ॥ अजी ! प्रकाश जब ज्ञानका । न कराता दर्शन ज्ञेयका । उससे क्या लाभ है किसका । निरर्थक-बुद्धि ॥ २७ ॥ जिससे-ज्ञेय दर्शन । करता सर्वत्र मन । वही शुद्ध-बुद्धि जान । धनंजय ॥ २८ ॥ ˙वही है निर्दोष ज्ञान । जिससे ज्ञेय दर्शन । वही है ज्ञान-संपन्न । हुवा पार्थ ॥ २९ ॥ जितनी ज्ञानकी वृद्धि । उतनी है उसकी बुद्धि । उसको शब्दसे सिद्धि । करना व्यर्थ ॥ ६३० ॥ ज्ञान प्रकाशके साथ । बुद्धि ज्ञेयसे सतत । चिपकती वही पार्थ । पाता पर-तत्व ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरकी सहज काव्य स्फूर्ति— उसीको मैं यदि ज्ञान कहता । इसमें विस्मय क्या पांडुसुत । अजी ! सविताको कहो सविता । नहीं कहें क्या ॥ ३२ ॥ तब कहते हैं सब श्रोता । विस्तार न कर ज्ञानी-वार्ता । ग्रंथार्थमें यह बाधा लाता । क्यों भला व्यर्थकी ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४८२