भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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हमें यह तेरा मधुर । वक्तृत्वका पाहुनाचार । ज्ञानका कराया साकार । शब्द-दर्शन ॥ ३४ ॥ रस होना है अति मात्र । लिया है तूने कवि मंत्र । बुलाके हमें यह तंत्र । करता क्यों शत्रुताका ॥ ३५ ॥ प्रेमसे भोजनमें बुलाया । सजाके पंगतमें बिठाया । और सभी पकवान्न भगाया । इससे मिला क्या ॥ ३६ ॥ गाय है सुंदर पुष्ट बछडा साथ । काह्यमें हाथ लगाते मारती लाथ । कौन पालेगा कहो उसे समर्थ । व्यर्थ ही घरमें ॥ ३७ ॥ वैसे ज्ञानमें मति नहीं प्रकाशती । जल्पोंमें व्यर्थ स-कौतुक दौडती । वैसे तूने अन्य कवि-गणकी भांति । तिहीं किया निरूपण ॥ ३८ ॥ पानेके लिये जो कुछ ज्ञानांश । करता योग-यागादि सायास । उस ज्ञानका तूने किया स-उल्हास । योग्य-निरूपण ॥ ३९ ॥ अमृत मिला जैसे सतत । इससे ऊबेगा कोई तात । या सुखके दिनका गणित । करेगा क्या कोई ॥ ४० ॥ या पूर्ण चंद्रकी रात । आयेगी युग-पर्यंत । कहेगा उसे क्या व्यर्थ । कभी चकोर ॥ ४१ ॥ वैसे हैं ज्ञानके बोल । वह भी ऐसे रसाल । कौन कहेगा अकुशल । हुवा बहु ॥ ४२ ॥ आता जब भाग्यशाली अतिथि । परोसती गृहिणी दैववती । रसौयी चुक न जाये चाहती । मती-मनुष्यकी ॥ ४३ ॥ ऐसे ही आया अब प्रसंग । ज्ञानमें हमको अति-राग । तेरा भी उसीमें अनुराग । इससे यहां ॥ ४४ ॥ इसीलिये यह प्रवचन । खिला है भक्तिसे शत-गुण । तभी ज्ञानमें तू है संपूर्ण । कैसे न कहे हम ॥ ४५ ॥ अब यहां इसपर । ज्ञानकी पिछली ओर । पद है वह स्पष्ट कर । निरूपणसे ॥ ४६ ॥ ४८३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग