भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 556

सुनके संत-वचन ऐसे । कहे निवृत्ति-दास सबसे । मेरा भी मनोगत था ऐसे । निरूपणका ॥ ४७ ॥ अब तो यहां हैं आप । आज्ञा देते हैं सकृप । व्यर्थका शब्द मैं आप । न करूं यहां ॥ ४८ ॥ जैसे आपने सुना । पार्थसे कृष्णका कहना । ज्ञानके लक्षण संपूर्ण । अष्टादश ॥ ४९ ॥ फिर कहते हैं हरि अर्जुन । वह है ज्ञानका वसति-स्थान । यह मेरा मत है जो संपूर्ण । ज्ञानी भी यही कहते ॥ ६५० ॥ करतल पर है गोल । फिर रहा जैसे आमला । ज्ञान तुझको हे निर्मल । दिखाया मैने ॥ ५१ ॥ अज्ञानके लक्षण- सुन तू महामति पार्थ । अज्ञान जो है कहलाता । वह मैं तुझसे कहता । स-लक्षण ॥ ५२ ॥ जब होता है ज्ञानका भान । जानना सहज है अज्ञान । अजी ! जो नहीं होता है ज्ञान । अज्ञान ही रहा ॥ ५३ ॥ दिवस होता है जब समाप्त । रहती है केवल-मात्र रात । तीसरा अन्य नहीं होता पार्थ । उसी भांतिसे ॥ ५४ ॥ जहां नहीं होता ज्ञान । वहां देख तू अज्ञान । तो भी कहता हूं सुन । लक्षण उसके ॥ ५५ ॥ १ अज्ञानका लक्षण, अभिमान- मौका देखता स्व-प्रतिष्ठाका । प्रतीक्षा करता सम्मानका । होता जब सत्कार उसका । खिलता संतोषसे ॥ ५६ ॥ गर्व-पर्वतके शिखर । बढ़ते जाता महत्व पर । उसमें तू पांडुकुमार । अज्ञान जान ॥ ५७ ॥ २ अज्ञानका लक्षण, दंभ- जैसे स्वधर्मका मंगल । बांधता वाचाका पीपल । तथा खडा किया देवल- । में मानो कूंबा ॥ ५८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४८४