ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरता अपने ज्ञानका पसारा । तथा पीटता सु-कृतका ढिंढोरा । करता सदा प्रतिष्ठा विचार । बढानेका ॥ ५९ ॥ करता है स्नान देहार्चन । प्राणियोंकी पूजासे वंचन । वह आज्ञानकी खान जान । सदैव, पार्थ ॥ ६६० ॥ ३ अज्ञानका लक्षण, हिंसा— होता जब वनमें अग्नि-संचार । जलते हैं तब जंगम-स्थावर । वैसे ही होते हैं उनके उपचार । जन दुःखके कारण ॥ ६१ ॥ सहज ही करता जो भाषण । होता है सबरीसे भी तीक्ष्ण । विषसे भी करता है मारण । अधिक संकल्प ॥ ६२ ॥ उसका अति अज्ञान । अज्ञानका है निधान । तथा हिंसाका सदन । जीवन उसका ॥ ६३ ॥ ४ अज्ञानका लक्षण, अशांति— धौंकनी जब है फूंकती । फूलती और सिकुड़ती । संयोग-वियोगमें होती । वैसी स्थिति उसकी ॥ ६४ ॥ जिस भांति बवंडरमें धूल । पहुंचती गगनमें सरल । फूलता वह स्तुतिसे बहुल । अपनी पार्थ ॥ ६५ ॥ अल्पांश भी निंदा सुनकर । पकड़कर बैठता शिर । सुखाती हवा गळता नीर । कीचडको जैसे ॥ ६६ ॥ मानापमानमें वैसे होता । कोई भी ऊर्मी नहीं सहता । जान लेना उसमें तू पार्थ । अज्ञान पूरा ॥ ६७ ॥ ५ अज्ञानका लक्षण, कुटिलता— उसके मनमें होता भिन्न । तथा वाचा बोलती है भिन्न । देता किसीको कुछ वचन । सहायता तीसरेको ॥ ६८ ॥ जैसे व्याधका चारा डालना । सरळताका स्वांग रचना । सज्जनोंका हृदय जीतना । ऐसे शत्रु-भावसे ॥ ६९ ॥ ४८५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग