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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

ऐसे ही मनुष्योंमें ज्ञान । रहता निःसंशय जान । ऐसा ही मन-ज्ञान-लीन । होता है मद्रूप ॥ २२ ॥ बैठनेके बाद होनेका जो हो जाता । वह सब बैठते ही नहीं होता । किंतु ज्ञानमें मन स्थिर हो जाता । बनता ज्ञानी वह ॥ २३ ॥ तथा तत्व-ज्ञान निर्मल । फलता जो एक ही फल । ज्ञेय पर ही जो सरल । जम जाती दृष्टि ॥ २४ ॥ वैसे बोध हुवा जो ज्ञान । हुवा नही ज्ञेय दर्शन । नहीं मिला उसको ज्ञान । ऐसे मानते हम ॥ २५ ॥ अंधेके हाथमें दीप देनेसे । क्या लाभ होगा उसको उससे । कुछ न दीखता जिस दीपसे । लाभ ही क्या भला ॥ २६ ॥ अजी ! प्रकाश जब ज्ञानका । न कराता दर्शन ज्ञेयका । उससे क्या लाभ है किसका । निरर्थक-बुद्धि ॥ २७ ॥ जिससे-ज्ञेय दर्शन । करता सर्वत्र मन । वही शुद्ध-बुद्धि जान । धनंजय ॥ २८ ॥ ˙वही है निर्दोष ज्ञान । जिससे ज्ञेय दर्शन । वही है ज्ञान-संपन्न । हुवा पार्थ ॥ २९ ॥ जितनी ज्ञानकी वृद्धि । उतनी है उसकी बुद्धि । उसको शब्दसे सिद्धि । करना व्यर्थ ॥ ६३० ॥ ज्ञान प्रकाशके साथ । बुद्धि ज्ञेयसे सतत । चिपकती वही पार्थ । पाता पर-तत्व ॥ ३१ ॥ ज्ञानेश्वरकी सहज काव्य स्फूर्ति— उसीको मैं यदि ज्ञान कहता । इसमें विस्मय क्या पांडुसुत । अजी ! सविताको कहो सविता । नहीं कहें क्या ॥ ३२ ॥ तब कहते हैं सब श्रोता । विस्तार न कर ज्ञानी-वार्ता । ग्रंथार्थमें यह बाधा लाता । क्यों भला व्यर्थकी ॥ ३३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४८२

हमें यह तेरा मधुर । वक्तृत्वका पाहुनाचार । ज्ञानका कराया साकार । शब्द-दर्शन ॥ ३४ ॥ रस होना है अति मात्र । लिया है तूने कवि मंत्र । बुलाके हमें यह तंत्र । करता क्यों शत्रुताका ॥ ३५ ॥ प्रेमसे भोजनमें बुलाया । सजाके पंगतमें बिठाया । और सभी पकवान्न भगाया । इससे मिला क्या ॥ ३६ ॥ गाय है सुंदर पुष्ट बछडा साथ । काह्यमें हाथ लगाते मारती लाथ । कौन पालेगा कहो उसे समर्थ । व्यर्थ ही घरमें ॥ ३७ ॥ वैसे ज्ञानमें मति नहीं प्रकाशती । जल्पोंमें व्यर्थ स-कौतुक दौडती । वैसे तूने अन्य कवि-गणकी भांति । तिहीं किया निरूपण ॥ ३८ ॥ पानेके लिये जो कुछ ज्ञानांश । करता योग-यागादि सायास । उस ज्ञानका तूने किया स-उल्हास । योग्य-निरूपण ॥ ३९ ॥ अमृत मिला जैसे सतत । इससे ऊबेगा कोई तात । या सुखके दिनका गणित । करेगा क्या कोई ॥ ४० ॥ या पूर्ण चंद्रकी रात । आयेगी युग-पर्यंत । कहेगा उसे क्या व्यर्थ । कभी चकोर ॥ ४१ ॥ वैसे हैं ज्ञानके बोल । वह भी ऐसे रसाल । कौन कहेगा अकुशल । हुवा बहु ॥ ४२ ॥ आता जब भाग्यशाली अतिथि । परोसती गृहिणी दैववती । रसौयी चुक न जाये चाहती । मती-मनुष्यकी ॥ ४३ ॥ ऐसे ही आया अब प्रसंग । ज्ञानमें हमको अति-राग । तेरा भी उसीमें अनुराग । इससे यहां ॥ ४४ ॥ इसीलिये यह प्रवचन । खिला है भक्तिसे शत-गुण । तभी ज्ञानमें तू है संपूर्ण । कैसे न कहे हम ॥ ४५ ॥ अब यहां इसपर । ज्ञानकी पिछली ओर । पद है वह स्पष्ट कर । निरूपणसे ॥ ४६ ॥ ४८३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

सुनके संत-वचन ऐसे । कहे निवृत्ति-दास सबसे । मेरा भी मनोगत था ऐसे । निरूपणका ॥ ४७ ॥ अब तो यहां हैं आप । आज्ञा देते हैं सकृप । व्यर्थका शब्द मैं आप । न करूं यहां ॥ ४८ ॥ जैसे आपने सुना । पार्थसे कृष्णका कहना । ज्ञानके लक्षण संपूर्ण । अष्टादश ॥ ४९ ॥ फिर कहते हैं हरि अर्जुन । वह है ज्ञानका वसति-स्थान । यह मेरा मत है जो संपूर्ण । ज्ञानी भी यही कहते ॥ ६५० ॥ करतल पर है गोल । फिर रहा जैसे आमला । ज्ञान तुझको हे निर्मल । दिखाया मैने ॥ ५१ ॥ अज्ञानके लक्षण- सुन तू महामति पार्थ । अज्ञान जो है कहलाता । वह मैं तुझसे कहता । स-लक्षण ॥ ५२ ॥ जब होता है ज्ञानका भान । जानना सहज है अज्ञान । अजी ! जो नहीं होता है ज्ञान । अज्ञान ही रहा ॥ ५३ ॥ दिवस होता है जब समाप्त । रहती है केवल-मात्र रात । तीसरा अन्य नहीं होता पार्थ । उसी भांतिसे ॥ ५४ ॥ जहां नहीं होता ज्ञान । वहां देख तू अज्ञान । तो भी कहता हूं सुन । लक्षण उसके ॥ ५५ ॥ १ अज्ञानका लक्षण, अभिमान- मौका देखता स्व-प्रतिष्ठाका । प्रतीक्षा करता सम्मानका । होता जब सत्कार उसका । खिलता संतोषसे ॥ ५६ ॥ गर्व-पर्वतके शिखर । बढ़ते जाता महत्व पर । उसमें तू पांडुकुमार । अज्ञान जान ॥ ५७ ॥ २ अज्ञानका लक्षण, दंभ- जैसे स्वधर्मका मंगल । बांधता वाचाका पीपल । तथा खडा किया देवल- । में मानो कूंबा ॥ ५८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४८४

करता अपने ज्ञानका पसारा । तथा पीटता सु-कृतका ढिंढोरा । करता सदा प्रतिष्ठा विचार । बढानेका ॥ ५९ ॥ करता है स्नान देहार्चन । प्राणियोंकी पूजासे वंचन । वह आज्ञानकी खान जान । सदैव, पार्थ ॥ ६६० ॥ ३ अज्ञानका लक्षण, हिंसा— होता जब वनमें अग्नि-संचार । जलते हैं तब जंगम-स्थावर । वैसे ही होते हैं उनके उपचार । जन दुःखके कारण ॥ ६१ ॥ सहज ही करता जो भाषण । होता है सबरीसे भी तीक्ष्ण । विषसे भी करता है मारण । अधिक संकल्प ॥ ६२ ॥ उसका अति अज्ञान । अज्ञानका है निधान । तथा हिंसाका सदन । जीवन उसका ॥ ६३ ॥ ४ अज्ञानका लक्षण, अशांति— धौंकनी जब है फूंकती । फूलती और सिकुड़ती । संयोग-वियोगमें होती । वैसी स्थिति उसकी ॥ ६४ ॥ जिस भांति बवंडरमें धूल । पहुंचती गगनमें सरल । फूलता वह स्तुतिसे बहुल । अपनी पार्थ ॥ ६५ ॥ अल्पांश भी निंदा सुनकर । पकड़कर बैठता शिर । सुखाती हवा गळता नीर । कीचडको जैसे ॥ ६६ ॥ मानापमानमें वैसे होता । कोई भी ऊर्मी नहीं सहता । जान लेना उसमें तू पार्थ । अज्ञान पूरा ॥ ६७ ॥ ५ अज्ञानका लक्षण, कुटिलता— उसके मनमें होता भिन्न । तथा वाचा बोलती है भिन्न । देता किसीको कुछ वचन । सहायता तीसरेको ॥ ६८ ॥ जैसे व्याधका चारा डालना । सरळताका स्वांग रचना । सज्जनोंका हृदय जीतना । ऐसे शत्रु-भावसे ॥ ६९ ॥ ४८५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

जैसे कायीसे लीपती शिला । अथवा पका निंबौला पीला । वैसे दीखता उसका भला । बाह्य-आचार ॥ ६७० ॥ उसमें भरा है अज्ञान । बसता है जान अर्जुन । इस बोलसे नहीं भिन्न । दूसरा सत्य ॥ ७१ ॥ ६ अज्ञानका लक्षण, गुरुद्रोह-- गुरु-भक्तिमें मानता लांछन । गुरु-सेवामें माने अपमान । गुरुसे मिली है विद्या महान । मानता नहीं यह ॥ ७२ ॥ करना उसका नामोच्चरण । चांडालका अन्न खाना ही मान । कहनेमें अज्ञानका लक्षण । बोलना पडा मुझे ॥ ७३ ॥ अब गुरु-सेवकका नाम लेगा । जिससे वाचाका प्रायश्चित्त होगा । गुरु-भक्तके नामसे दूर होगा । जैसे तम सूर्यसे ॥ ७४ ॥ इससे ही सब पापका । दूर होगा दोष वाचाका । जो आया गुरु-निंदाका । नाम लेनेसे ॥ ७५ ॥ गुरु-भक्तका नामोच्चार । उस बातका भय हर । अब सुनो चित्त देकर । अन्य लक्षण ॥ ७६ ॥ ७ अज्ञानका लक्षण, अशौच-- स्वयं होता है जो कर्म-विरत । मनमें सदा विकल्प भरित । रहता कांटे कीचड सहित । वनका कुवास ॥ ७७ ॥ ऊपर झाड झंकाड । अंदर भरे है हाड । अशुचिका भरा आड । अंदर बाहर ॥ ७८ ॥ जिस भांति बुभुक्षित कुत्ता । खुला या ढका नहीं जानता । अपना पराया न देखता । वैसे द्रव्यार्थ जो ॥ ७९ ॥ इन ग्राम-सिंहमें जैसे । मिलन निषेध ना वैसे । स्त्रियोंके विषयमें वैसे । विचार करते नहीं ॥ ६८० ॥ कर्मका समय वे चुकाते । नित्य-नैमित्तिक है टालते । इससे वे नहीं पछताते । मनमें कभी ॥ ८१ ॥ ज्ञानेश्वरी ४८६

पापके वे सदा संग । पुण्यमें होते असंग । जिनके मनमे वेग । सदा विकल्पके ॥ ८२ ॥ जान तू वह संपूर्ण । अज्ञान है मूर्तिमान । मूंदता सदा नयन । वित्ताशासे ॥ ८३ ॥ ८ अज्ञानका लक्षण, चांचल्य- अल्प स्वार्थसे होता चंचल । स्थिरतासे होता है विचल । जैसे तृणांकुर जाता ढल । चींटीसे भी ॥ ८४ ॥ पैर भी पडनेसे जैसे । डबरे गंदलाते वैसे । भयके नाम सुननेसे । घबडाता जो ॥ ८५ ॥ मनोरथके प्रवाहमें । बहता जाता जो मनमें । कुझडा जैसे प्रवाहमें । बहता जाता ॥ ८६ ॥ जैसे है वायुके साथ । धूम्र फैलता दिगंत । होती है दुखःकी बात । उसको वैसी ॥ ८७ ॥ जैसे होता बवंडर । होता नहीं कहीं स्थिर । तीर्थक्षेत्र और पुर । न करता स्थान ॥ ८८ ॥ जैसे है गिरगिट उन्मत्त । चढने उतरनेमें रत । रहता है सदा ही व्यर्थ । उसी प्रकार ॥ ८९ ॥ जैस बिन पेंदीका जो घडा । बिन गाडे न रहता खडा । वैसे नींदमें रहता पडा । नहीं तो भटकता ॥ ६९० ॥ उसमें रहता बहुत । अज्ञान भंडार विस्तृत । चांचल्य में लघुभ्रात । मर्कटका जो ॥ ९१॥ ९ अज्ञानका लक्षण, स्वैराचार- और सुन तू धनुर्धर । न छूता उसका अंतर । संयमका गंध संस्कार । नाम मात्रको ॥ ९२ ॥ अजी ! जब नालेमें आता पूर । उसे न रोकता बालूका घेरा । शास्त्र-निषेधका उसपर । होता नहीं प्रभाव ॥ ९३ ॥ ४८७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

करता व्रतोंका अवहेलन । वैसे ही स्वधर्मका उल्लंघन । यम-नियम मर्यादा खंडन । करता वह ॥ ९४॥ पापसे वह नहीं उकताता । नहीं उसको पुण्यमें भी आस्था । वैसे ही लोक-लाजकी खो देता । सीमा रेखा ॥ ९५ ॥ कुल-धर्म नहीं पहचानता । वेदोंकी आज्ञाको नहीं जानता । भला-बुराका ध्यान नहीं देता । कभी वह पार्थ ॥ ९६ ॥ सांडसा वह अनिर्बन्ध । आंधीसा होता अमर्याद । टूटा हुवा नदका बांध । निर्जनमें कहीं ॥ ९७ ॥ जैसे अंधा गज मदसे मत्त । या जलता हुआ वन पर्वत । वैसे विषयोंमें होता उन्मत्त । चित्त उसका ॥ ९८ ॥ घूरेपर कब कौन क्या न डालते । ग्राम द्वार देहरी कौन न लांघते राहके सांडको कहो कौन बांधते । पांडुकुमार ॥ ९९ ॥ जैसे अन्न-छत्रमें सभी जाते । या सामान्य अधिकार जताते । या सारायीमें कोई घुसते । वैसे ही सदा ॥ ७०० ॥ रहता जिसका अंतःकरण । उसमें होता संचार संपूर्ण । अज्ञानमें वहां है निशिदिन । रहती बुद्धि ॥ १ ॥ १० अज्ञानका लक्षण भोगलिप्सा-- विषयोंकी जो है उसकी आस । जीने मरनेमें न होती नास । स्वर्गमें भी उसीके आशापाश । ले चलता वह ॥ २ ॥ करता भोगका अखंड जतन । काम्य-क्रियाका है जिसका व्यसन । विरक्तका कर मुखावलोकन । करता शबैल ॥ ३ ॥ विषय है उनसे उकताने । ये न उकताने सावध होते । सडे हुये हाथोंसे जैसे खाते । महारोगी ॥ ४ ॥ जैसे गर्दभी नहीं आने देती । लातोंसे खरका नाक तोडती । फिर भी गर्दभ है सआसक्ति । न लौटना पीछे ॥ ५ ॥ वैसे ही जो विषयोंमें रत । कूदते स्थानमें ज्वाला-ग्रस्त । व्यसनमें होकर वे लिप्त । मानते यह भूषण ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४८८

यदि मृग टूट भी गिरता । अपनी दौड बढाता जाता । किंतु असत्य नहीं मानता । मृगजलका भ्रम ॥ ७ ॥ वैसे जन्मसे मृत्यु पर्यंत । विषयोंमें हो सदैव त्रस्त । फिर भी अधिक हो आसक्त । करता मोह ॥ ८ ॥ पहले होती बालदशा । माता पिता इसीकी आशा । फिर स्त्री-शरीरका नशा । भुलाता सब ॥ ९ ॥ स्त्री-भोगमें तब काल हरण । होता है वार्धक्यका आगमन । तथा बनते अनुराग-स्थान । अपने बालक ॥ ७१० ॥ जन्मांध जैसे अपना घर । नहीं छोड़ता जीवन-भर । बच्चोंके विषय तिरस्कार । कभी नहीं होता ॥ ११ ॥ उसमें जान धनुर्धर । अज्ञान रहता अपार । सुन अब अन्य प्रकार । अज्ञानके ॥ १२ ॥ ११ अज्ञानका लक्षण, देहाभिमान— यह देह ही है आत्मा । बनाकर मनोधर्म । करता रहता कर्म । दिनरात ॥ १३ ॥ कभी कोई कर्माचरण । होता कम अधिक मान । तब वह स-अभिमान । फूलता सूखता ॥ १४ ॥ सिरपर देव-मूर्तिके बोझसे । अकडकर चलता पूजारी जैसे । विद्या धन वयादि अभिमानसे । अकड चलता वह ॥ १५ ॥ मैं ही हूं महा-धनवान । मेरे घरमें गुण-धन । मेरे घरका आचरण । मिलता कहां ? ॥ १६ ॥ कोई नहीं है मेरे समान । मैं ही धन-गुण विद्यावान । ऐसे गर्व-तुष्टी मान लीन । हो फिरता वह ॥ १७ ॥ व्याधिग्रस्त मनुष्य जैसे । नहीं सहता भोग वैसे । अन्योंकी भलाई उससे । सही नहीं जाती ॥ १८ ॥ ४८९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (62)

गुण सारा खाता ही जाता । स्नेह सब जला डालता । रखा वहां काला करता । जैसे दीप ॥१९॥ जीवन स्पर्शता तो तडतडता । हवा लगनेसे प्राण ही तजता । जहां लगता राख कर रखता । सर्वस्वका ही ॥२०॥ अल्पस्वल्प प्रकाश देता । वैसा ही वह उष्मा देता । ऐसे दीपक-भांति होता । वह सुविद्य ॥२१॥ औषध मान दिया भी दूध । नव-ज्वरमें करता बाध । पीता है जब वह एकाधा । बनता गरल ॥२२॥ वैसे सद्गुणीका मत्सर । व्युत्पत्तिमें जो अहंकार । तप ज्ञानका है अपार । अकड उसको ॥२३॥ बिठाया पंचमको राज्यपर । या निगला खांबको अजगर । तब जैसे फूलता स-शरीर । ऐसे वह मानंस ॥२४॥ बेलन जैसे नहीं झुकता । पत्थर जैसे नहीं द्रवता । फुरसे जैसे न उतरता । मदारीके मंत्रसे ॥२५॥ ऐसा जो मनुष्य है जान । उसमें बढता अज्ञान । यह है निश्चित अर्जुन । कहता हूँ मैं ॥२६॥ १२ अज्ञानका लक्षण, अविचार- वैसे ही वह पांडुकुमार । नहीं करता कोई विचार । गृह-देह-जन्म-मृत्यू पर । अपने कभी ॥२७॥ कृतघ्न पर किया उपकार । या चोरको कर दिया व्यापार । या निर्लज्जकी की स्तुति अपार । वे भूलते जैसे ॥२८॥ उठल्लू कुत्तेको जैसे । पूंछ काट भगानेसे । फिर वहीं आता वैसे । गीली पूंछ ले ॥२९॥ मेंढक सापके मुखके अंदर । जाता है अपना सर्वस लेकर । पकडे रखता मुखमें शिकार । अपनी न सोचता ॥ ७३०॥ ज्ञानेश्वरी ४९०

वैसे हैं स्रवते नव-द्वार । त्वचा-रोगसे गला शरीर । चितमें उसका जो विचार । नहीं करता ॥ ३१ ॥ माताके उदर गह्वरमें । पचके मलके गर्तमें । नव माह तक जठरमें । ऊबा था जो ॥ ३२ ॥ गर्भकी थी जो वह व्यथा । जन्मके बाद वही कथा । यह सब ही है सर्वथा । भूलके बैठा ॥ ३३ ॥ मल मूत्र लिप्त बालक । गोदमें देख स-कौतुक । न घिनता सोचके शोक । करता अपना ॥ ३४ ॥ कलका जन्म जो गया । आजका भी जन्म आया । सोच नहीं आया गया । इसका कभी ॥ ३५ ॥ वैसे ही सुन तू अर्जुन । तारुण्यका कर दर्शन । न सोचता उसका मन । मृत्युकी बात ॥ ३६ ॥ जीवनका अति विश्वास । मृत्युके अस्तित्वका भास । सदैव उसका मानस । भूलता जाता ॥ ३७ ॥ होते हैं डबरेके मीन जैसे । यह नहीं सूखेगा मान ऐसे । उसीमें पडे रहते हैं वैसे । न जाते गहरेमें ॥ ३८ ॥ सुनकर किरातका गान । मृग करते व्याध-दर्शन । आमिष लोभसे जैसे मीन । निगलता कांटा ॥ ३९ ॥ जैसे देख ज्योतिका जगमग । जला लेता अपनेको पतंग । नहीं जानता है जलेगा अंग । मोहमें वैसे ॥ ७४० ॥ निद्रा-सुखमें जैसे गंवार । नहीं देखता जलता घर । नहीं जान अन्नमें जहर । खाता अज्ञ ॥ ४१ ॥ वैसे जीवनका रूप लेकर । आयी मृत्यू यह न जानकर । पडता विषय-सुख भंवर । मस्त हो क्षणिक ॥ ४२ ॥ दिन-रात जो खपता । शरीरको है बढाता । सुख वैभव मानता । विषयका सत्य ॥ ४३ ॥ ४९१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

बेचारा यह न जानता । बेश्याकी सर्वस्व-दातृता । वही सही कारण होता । सर्व-नाशका ॥ ४४ ॥ मित्रता चोरके साथ । प्राण लेती है निश्चित । धोना चित्रको सतत । उसीमें नाश ॥ ४५ ॥ पांडु-रोगीकी देह फूलना । जैसे उसका नाम मिटना । वैसे किसीका है भूलना । आहार-निद्रा ॥ ४६ ॥ सम्मुख देखकर शूल । चलता जो पैरसे चपल । प्रति पगमें मृत्यु निश्चल । लाना पास ॥ ४७ ॥ जैसे देह बढती जाती । वैसे आयु घटती जाती । औ' विषय-भोगकी होती । समृद्धि नित्य ॥ ४८ ॥ तथा आती है अधिकाधिक । मृत्यु जीवनके नजदीक । जैसे मिटते जाता नमक । पानीसे सतत ॥ ४९ ॥ ऐसे जीवन गलता जाता । मरण नित समीप आता । इस बातको जो न देखता । प्रत्यक्ष रूपसे ॥ ७५० ॥ अथवा जान तू अर्जुन । मृत्यूसे लीपा यह तन । न होता उसका दर्शन । विषय-भ्रांतिसे ॥ ५१ ॥ अज्ञान देशका भूप । जान तू उसको आप । यह अपनेमें आप । निश्चित बात ॥ ५२ ॥ १३ अज्ञानका लक्षण, वृद्धावस्थासे अनजान -- जीवनके संतोषसे जैसे । नहीं देखता है मृत्यू वैसे । तरुणायीके नशामें उसे । न दीखाता वार्धक्य ॥ ५३ ॥ गाडी कगारसे फिसली हुयी । शिला-शिखरसे जो छूटी हुयी । आगे न देखते गढा या खायी । वैसे वह वार्धक्य ॥ ५४ ॥ वनके नालेमें पानी चढा । या भैंसेसे जाके भैंसा भिडा । वैसे तारुण्यका नशा चढा । जिसको उसे ॥ ५५ ॥ ज्ञानेश्वरी ४९२

पुष्टि बिगडती । कांति उतरती । मान भी कांपती । अस्थिरतासे ॥ ५६ ॥ बाल सब पकते । अंगांग भी कांपते । तो भी फंसे रहते । माया-जालमें ॥ ५७ ॥ सामनेका जब नहीं टकराता । तब तक अंधा कुछ न जानता । अथवा आंखोंके नशा पर होता । आलसी संतुष्ट ॥ ५८ ॥ भोगता वैसे ही आजका यौवन । तो आ पहुंचता वार्धक्य दारुण । नहीं देखता इसको जो अज्ञान । कहलाता पार्थ ॥ ५९ ॥ दुबला कुबडा देखकर । चिढाता है अकडकर । कल होगा अपना शरीर । ऐसा यह न जानता ॥ ७६० ॥ शरीरमें वार्धक्य दीखता । जो है मृत्यूका संदेश देता । किंतु वह भ्रममें रहता । अपने तारुण्यके ॥ ६१ ॥ वह है अज्ञानका आगार । और भी सुन लक्ष देकर । और भी लक्षण धनुर्धर । कहता हूं मैं ॥ ६२ ॥ १४ अज्ञानका लक्षण, रोगसे असावधान— जैसे कभी व्याघ्र वनसे । चरके लौटा जो दैवसे । फिर जाता है ढिटायीसे । जैसे सांड ॥ ६३ ॥ अथवा घरसे सांपके । द्रव्य अचानक उठाके । लाता जो मानता सांपके । नहीं होते दांत ॥ ६४ ॥ वैसे ही कभी अकस्मात । होता है एक दो घटित । मानता है वह निश्चित । नहीं है रोग ॥ ६५ ॥ देखकर जो शत्रू सोया । मानता वैर मिट गया । उसने सर्वस्व ही खोया । अपना जैसे ॥ ६६ ॥ वैसे आहार निद्राका व्यवस्थित । चलते हैं व्यवहार नियमित । तब तक है व्याधिसे निश्चित । रहता जो ॥ ६७ ॥ ४९३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

तथा स्त्री-पुत्रके साथ । भोगता है संपदा पार्थ । रजसे होता है उन्मत्त । विषयोंमें जो ॥ ६८ ॥ इसके साथ वियोग भी होगा । वैसे ही कोयी संकट आयेगा । इस भांति वह नहीं देखेगा । विचारसे ॥ ६९ ॥ उसीको अज्ञानी जान । तथा वही अर्जुन । देता है यथेच्छ अन्न । इंद्रियोंको ॥ ७० ॥ तारुण्य मदमें न देखता । संपत्तिके साथ ही बहता । सेव्य असेव्य नहीं मानता । ऐसा कभी ॥ ७१ ॥ करना नहीं वही करता । असंभाव्य मनमें धरता । अ-सोचका चिंतन करता । जिसका मन ॥ ७२ ॥ नहीं घुसना वहीं घुसता । जो न चाहना वही मांगता । नहीं छूना उसीसे मिलता । जिसका मन अंग ॥ ७३ ॥ नहीं जाना वहीं है जाता । न देखना वह देखता । नहीं खाना वही खाता । संतोषसे जो ॥ ७४ ॥ न करना उसका संग । नहीं भोगना वही भोग । नहीं चलना वही मार्ग । चलता वह ॥ ७५ ॥ नहीं सुनना वही सुनता । नहीं बोलना वही बकता । इतने पर भी न देखता । इसमें दोष ॥ ७६ ॥ तन-मनको जो रुचता । कृत्य-अकृत्य न देखता । कर्तव्य मानके करता । असंगत सारा ॥ ७७ ॥ इससे पाप भी होगा । नरक-क्लेश भी होगा । यह कुछ न देखेगा । भविष्यका जो ॥ ७८ ॥ इसके संगतिसे अज्ञान । होता है इतना बलवान । ज्ञानसे जो उतरता जान । संघर्ष रत हो ॥ ७९ ॥ रहने दो अब यह अर्जुन । दिखाता हूं अज्ञान मूर्तिमान । इससे मानेगा तू वह पूर्ण । सही रूपसे ॥ ७८० ॥ ज्ञानेश्वरी ४९४

१५ अज्ञानका लक्षण, सदा विषय-सेवन— अनुराग जिसका संपूर्ण । उलझा हुवा घरमें जान । जिस भांति भ्रमर अर्जुन । नवगंध केसरमें ॥ ८१ ॥ देख जैसा शर्कराका ढेर । न उठे मक्षिका बैठकर । वैसे रमणीमें रमकर । न उठे चित्त ॥ ८२ ॥ जैसे पानीमें मेंढक । तथा श्लेष्ममें मशक । कीचड़में फंसा देख । चौपाये जैसे ॥ ८३ ॥ वैसे घरसे कभी निकलना । नहीं करता जीव मन प्राण । जैसे सांप बेंबीमें दे आसन । बैठा ही रहता ॥ ८४ ॥ जैसे प्रमदा बन कंठहार । पकड बैठती है प्रियकर । वैसे अपनी कुटियाका द्वार । पकड बैठता यह ॥ ८५ ॥ मधुर रसके उद्देश्यसे । खपता है मधुकर जैसे । गृह-संगोपनमें भी वैसे । रहता है यह ॥ ८६ ॥ जब बुढापेमें है होता । दैवसे पुत्र इकलौता । उससे जैसे प्रेम होता । माता-पिताका ॥ ८७ ॥ उसी प्रेमसे होती पार्था । घरमें उसकी जो आस्था । बिना स्त्रीके वह सर्वथा । न जाने कुछ ॥ ८८ ॥ जैसे स्त्री-देहमें वह जीव । भजता रहता सर्व-भाव । कौन मैं कर्तव्य क्या स्वभाव । भूलता है ॥ ८९ ॥ महा पुरुषका जो चित्त । बनके ऐसा वस्तुगत । भूलता व्यवहार-जात । उसी भांति ॥ ८९० ॥ हानि लाज नहीं देखता । परापवाद नहीं सुनता । सर्वेंद्रियोंसे जो रमता । स्त्रीमें एकाग्र हो ॥ ९१ ॥ चित्त करता है स्त्री-आराधन । तथा उसकी धुनमें नर्तन । जैसे मर्कट हो आज्ञाधीन । मदारीके जैसे ॥ ९२ ॥ ४९५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

जैसे अपनेको थकाता । जो है दूसरोंका दुखाता । कवडी कवडी गिनता । लोभी जैसा ॥ ९३ ॥ दान-पुण्यको धता बताता । इष्ट-मित्रोंको सदा फंसाता । स्त्रीकी बात है पूरी करता । नहीं करता न्यून ॥ ९४ ॥ देवतोंसे समझौता । गुरुजनोंको छकाता । मां-बापको न कहता । सदैव ही ॥ ९५ ॥ किंतु वह स्त्रीके हेतु । लाता सभी भोग-वस्तु । भरता उससे वास्तु । जहां जो देखी ॥ ९६ ॥ प्रेमसे जैसे भजता भक्त । सदा अपना कुल-दैवत । वैसे हो वह एकाग्र-चित्त । पूजता स्त्रीको ॥ ९७ ॥ स्त्रीके लिये भला पूरा । ला देता है सदा सारा । औरोंको सभी प्रकार । छकाता रहता ॥ ९८ ॥ उसको कोयी देखेगा । तथा कोयी बिगडेगा । जग ही डूब जायेगा । ऐसा मानता ॥ ९९ ॥ जैसे कभी खसरा होगा । नाग मनौती न तोडेगा । वैसे स्त्रीकी पूरी करेगा । सभी मांग ॥ ८०० ॥ स्त्री ही सर्वस्व है जिसका । अन्य कुछ न है उसका । आप्तोंसे स्नेह भी उसका । उसीके लिये ॥ १ ॥ जो है अन्य भी समस्त । उसीका संपत्ति-जात । जीबसे भी वह आप्त । मानता जो ॥ २ ॥ अज्ञानका है वही मूल । अज्ञानको उसीसे बल । रहता है वह केवल । अज्ञान-रूप ॥ ३ ॥ उफान-भरे सागर पर । नाव जैसे बिन-पतवार । हिलोरे लेती लहर पर । वैसे चित्त ॥ ४ ॥ जब वह प्रिय-वस्तु पाता । अति-सुखसे गगन छूता । तथा अप्रियसे पहुंचता । रसातलको ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ४९६

ऐसा जिसका चित्त । विषम होता पार्थ । होके भी बुध्दिवंत । अज्ञानी वह ॥ ६ ॥ फलमें रखके आसक्ति । करता वह मेरी भक्ति । जैसे करते हैं धनार्थी । विरक्तिका स्वांग ॥ ७ ॥ अथवा पतिके मनमें घुसकर । उसका विश्वास संपूर्ण पाकर । यत्न करती जाना जारके घर । स्वैरणी जैसे ॥ ८ ॥ जैसे मेरी उपासना । मनमें भोग-कामना । करता है वह अर्जुना । विषयार्थी हो ॥ ९ ॥ ऐसी भक्ति करने पर । फलको नहीं प्राप्त कर । छोड़ता है सब सत्वर । निरर्थक मान ॥ ८१० ॥ नित नयी भूमी किसान । बुआयी करता अर्जुन । ऐसे वह देवतार्चन । करता सदैव ॥ ११ ॥ देख किसी गुरुकी शान-मान । करता उसका मार्गानुगमन । तथा अन्योंको अति-क्षुद्र मान । उसका मंत्र लेता ॥ १२ ॥ प्राणि-जातसे जो निष्ठुर । पूजता है मूर्ति-स्थावर । ऐसी भक्ति तो अपार । निष्ठा कहीं नहीं ॥ १३ ॥ मेरी मूर्ति है बनवातां । घरके कोनमें रखता । आप यात्रामें है जाता । तीर्थ-क्षेत्रकी ॥ १४ ॥ प्रति-दिन मेरा आराधन । कार्यमें कुलदेवतार्चन । करता अन्य-देव पूजन । पर्व विशेषमें ॥ १५ ॥ घरमें है मेरा अधिष्ठान । अभिष्ठयर्थ अन्यका पूजन । पित्र-कार्यमें होता तर्पण । पितरोंका भी ॥ १६ ॥ जैसे एकादशीका पूजन । होता वैभवसे मेरा जान । वैसे नगापंचमीके दिन । नागोंका भी ॥ १७ ॥ गणेश-चतुर्थी देवता । गणेशका भक्त बनता । चतुर्दशी देख कहता । जै दुर्गे तेरा मै ॥ १८ ॥ ४९७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (63)

नवमीमें है मंडन । नव-चंडीका पूजन । रविवारमें भोजन । भैरवका ॥ १९॥ जब आता है सोमवार । दौड जाता शिव-मंदिर । करे तुष्ट इस प्रकार । सबको वह ॥ ८२०॥ करता अखंड भजन । क्षण भी न रहता मौन । जैसी है ग्राम-सुहागन । रहती है वैसे ॥ २१ ॥ ऐसा होता यह भगत । सभीके पूजामें है रत । जान अज्ञान मूर्तिमंत । अवतरा है ॥ २२ ॥ १६-१७ अज्ञानका लक्षण, एकांतमें अरुचि जनसंगमें प्रीति— शुचि सु-चित एकांत सुंदर । तपोबन या तीर्थ देखकर । मुरझाता मनमें निरंतर । अज्ञानरूप जो ॥ २३ ॥ जन-संगमें जिसको सुख । भाता है अतिशय लौकिक । गडबडमें जो स-कौतुक । रहता सदैव ॥ २४ ॥ जिससे आत्मा होती है गोचर । उस विद्याका नाम सुनकर भाग जाता है गडबडाकर । ऐसा विद्वान वह ॥ २५ ॥ उपनिषद नहीं पढता । योग-शास्त्र उसे न रुचता । अध्यात्म-ज्ञानमें न पैठता । चित्त उसका ॥ २६ ॥ आत्म-चर्चाका नाम सुनकर । भागता जैसा रस्सी तोडकर । चौपाया वैसे वह चौंककर । लांघ श्रद्धा-सीमा ॥ २७ ॥ कर्म-कांड वह सब जानता । पुराण सब मुखोद्गत गाता । ज्योतिषयमें जो प्रवीण बनता । पारंगत जैसे ॥ २८ ॥ शिल्पमें अति निपुण । पाक-कर्ममें प्रवीण । जानता है अथर्वण । विधि समस्त ॥ २९ ॥ काम-शास्त्रमें मति सिद्ध । भारत पाठ तो प्रसिद्ध । आगम-शास्त्रमें विशुद्ध । किया अपनासा ॥ ८३० ॥ ज्ञानेश्वरी ४९८

अध्याय १०: विभूतियोग

जानता है सभी नीति । वैद्यकमें खासी गति । काव्यमें है पक्व-मति । तथा न्यायमें भी ॥ ३१ ॥ होता स्मृतियोंका तज्ञ । गारुडी विद्याका मर्मज्ञ । शब्दकोशका महा-प्राज्ञ । माना कोश है दास ॥ ३२ ॥ व्याकरण-ज्ञानमें अगाध । तर्क-शास्त्रका है पूर्ण बोध । किंतु आत्म-ज्ञानमें जन्मांध । होता है धनंजय ॥ ३३ ॥ इस एकके बिन जो सभी शास्त्र । जानता वह मूल सिद्धांत-सूत्र । जलने दो लगा है मूला नक्षत्र । न देखो वह ॥ ३४ ॥ मोर-पंखके शरीर पर । उसपे होती आंख सुंदर । दृष्टि नहीं होती एक पर । वैसा है यह ॥ ३५ ॥ अध्यात्म-ज्ञानके बिन सब व्यर्थ— यदि परमाणु जितना । संजीवनी जड पा जाना । अन्य औषध क्या करना । ढेरोंका जो ॥ ३६ ॥ आयुष्य बिन सब लक्षण । अथवा शरीर बिन आभूषण । बरात जैसे वैभव-पूर्ण । दूल्हा बिन निंदित ॥ ३७ ॥ सब शास्त्र वैसे ज्ञान । सर्वथा है अप्रमाण । अध्यात्म ज्ञान बिन । स्वयंपूर्ण जो ॥ ३८ ॥ इसीलिये जान तू अर्जुन । जो है अध्यात्म-बोध विहीन । उसको कहते प्राज्ञ जान । शास्त्र-मूढ ॥ ३९ ॥ मानो उसका जो शरीर । अज्ञान-बीजका अंकुर । उसका हुवा जो विस्तार । अज्ञान-वृक्ष ॥ ८४० ॥ होते हैं उसके सभी बोल । आज्ञानके खिले हुये फूल । फले तो उसके पुण्य-फल । अज्ञानके ही ॥ ४१ ॥ अध्यात्ममें जिसे रस नहीं । उसको ज्ञेय दीखता नहीं । यह कहना अवश्य नहीं । जान तू यह ॥ ४२ ॥ ४९९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

इस तीरको भी जो न पाता । तीर देखके भी भाग जाता । पैल तीरकी वह क्या वार्ता । जानेगा भला ॥ ४३ ॥ या देहरी पर ही उसका सिर । दबाया कंगूरमें जकडकर । देखेगा कैसा वह पांडुकुमार । अंर्तगृहकी बात ॥ ४४ ॥ आत्म-ज्ञानकी पहचान । नहीं है उसको अर्जुन । जानेगा कैसा सत्य-ज्ञान । विषय भी वह ॥ ४५ ॥ तभी इसमें विशेष । तत्व नहीं है देख । कहना तुझे शेष । रहा ही क्या ॥ ४६ ॥ जैसे स-गर्भाको पगेसा अन्न । उससे बढता गर्भका तन । पिछले पदमें किया वर्णन । वही है सब ॥ ४७ ॥ अंधेको दिया जब निमंत्रण । उसके संग आता स-नयन । जाने है अज्ञान लक्षण । ज्ञान भी आया ॥ ४८ ॥ ज्ञेयकी पूर्व-पीठिका— तभी तो यहां अर्जुन । कहे अज्ञान लक्षण । अमानित्वादिके जान । हैं विरुद्ध जो ॥ ४९ ॥ ज्ञानके जो अठराह लक्षण । उसके उलटकर दर्शन । करनेसे दीखेगा अज्ञान । सहज भावसे ॥ ८५० ॥ पीछे श्लोकार्धमें एक । कहा है श्रीकृष्णने देख । उलटके ज्ञानको देख । वही है अज्ञान ॥ ५१ ॥ तभी इस पद्धतिको स्वीकार । किया है उस अर्थका विस्तार । न तो दूधमें मिलाकर नीर । न फैलाता ऐसे ॥ ५२ ॥ वैसे दिखायी नहीं वाचालता । शब्दकी सीमामें हूं मैं स्पष्टता । बना मूल-ध्वनिके विस्तारार्थ । निमित्तमात्र ॥ ५३ ॥ तब कहते हैं श्रोता जन । अनावश्यक स्व-समर्थन । विस्तार भीति है अकारण । कवि पोषक अपनी ॥ ५४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५००

आज्ञा देता है धरणीधर । मेरा अभिप्राय स्पष्ट कर । छिपा रखा शब्दके भीतर । हमने यहां ॥ ५५ ॥ परमात्माका मनोरथ । हमें दिखाता है तू मूर्त । यह कहने पर चित्त । उमड आयेगा ॥ ५६ ॥ इसलिये यह नहीं कहते । किंतु कहनेसे नहीं रहते । श्रवण-सुखसे हैं हम पाते । ज्ञान-नौका यहां ॥ ५७ ॥ अब तू इस पर । कहता जो श्रीधर । हमें कह सत्वर । जो यथार्थ ॥ ५८ ॥ सुन कर यह संतोंका बचन । बोले निवृत्तिदास मुदित मन । करो ध्यानसे चित्त देके श्रवण । कहा जो श्रीहरिने ॥ ५९ ॥ कहते हैं तुझको अर्जुन । यह चिन्ह समुच्चय पूर्ण । श्रवण किया यह अज्ञान । मूर्ति रूप था ॥ ८६० ॥ अज्ञानसे मुडकर । ज्ञानमें पांडुकुमार । निश्चय कर सत्वर । दृढतासे तू ॥ ६१ ॥ उस ज्ञानसे अर्जुन । होगा ज्ञेयका दर्शन । सुन अर्जुनका मन । करता जिज्ञासा ॥ ६२ ॥ तब वह सर्वज्ञ-श्रेष्ठ । जानके यह भाव स्पष्ट । अभिप्राय कहके तुष्ट । करेगा ज्ञेयका ॥ ६३ ॥ ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ १२ ॥ ज्ञेयका स्वरूप- जिसको यह ज्ञेय कहना । उसका कारण है इतना । वह जो कभी ज्ञानके बिना । जाना नहीं जाता ॥ ६४ ॥ कहूँगा ज्ञेय मैं सारा पानेसे अमृतत्व है । अनादि जो पर ब्रह्म है परे अस्तिनास्तिके ॥ १२ ॥ ५०१ क्षेत्र--क्षेत्रज्ञयोग