भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 559

पापके वे सदा संग । पुण्यमें होते असंग । जिनके मनमे वेग । सदा विकल्पके ॥ ८२ ॥ जान तू वह संपूर्ण । अज्ञान है मूर्तिमान । मूंदता सदा नयन । वित्ताशासे ॥ ८३ ॥ ८ अज्ञानका लक्षण, चांचल्य- अल्प स्वार्थसे होता चंचल । स्थिरतासे होता है विचल । जैसे तृणांकुर जाता ढल । चींटीसे भी ॥ ८४ ॥ पैर भी पडनेसे जैसे । डबरे गंदलाते वैसे । भयके नाम सुननेसे । घबडाता जो ॥ ८५ ॥ मनोरथके प्रवाहमें । बहता जाता जो मनमें । कुझडा जैसे प्रवाहमें । बहता जाता ॥ ८६ ॥ जैसे है वायुके साथ । धूम्र फैलता दिगंत । होती है दुखःकी बात । उसको वैसी ॥ ८७ ॥ जैसे होता बवंडर । होता नहीं कहीं स्थिर । तीर्थक्षेत्र और पुर । न करता स्थान ॥ ८८ ॥ जैसे है गिरगिट उन्मत्त । चढने उतरनेमें रत । रहता है सदा ही व्यर्थ । उसी प्रकार ॥ ८९ ॥ जैस बिन पेंदीका जो घडा । बिन गाडे न रहता खडा । वैसे नींदमें रहता पडा । नहीं तो भटकता ॥ ६९० ॥ उसमें रहता बहुत । अज्ञान भंडार विस्तृत । चांचल्य में लघुभ्रात । मर्कटका जो ॥ ९१॥ ९ अज्ञानका लक्षण, स्वैराचार- और सुन तू धनुर्धर । न छूता उसका अंतर । संयमका गंध संस्कार । नाम मात्रको ॥ ९२ ॥ अजी ! जब नालेमें आता पूर । उसे न रोकता बालूका घेरा । शास्त्र-निषेधका उसपर । होता नहीं प्रभाव ॥ ९३ ॥ ४८७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग