भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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करता व्रतोंका अवहेलन । वैसे ही स्वधर्मका उल्लंघन । यम-नियम मर्यादा खंडन । करता वह ॥ ९४॥ पापसे वह नहीं उकताता । नहीं उसको पुण्यमें भी आस्था । वैसे ही लोक-लाजकी खो देता । सीमा रेखा ॥ ९५ ॥ कुल-धर्म नहीं पहचानता । वेदोंकी आज्ञाको नहीं जानता । भला-बुराका ध्यान नहीं देता । कभी वह पार्थ ॥ ९६ ॥ सांडसा वह अनिर्बन्ध । आंधीसा होता अमर्याद । टूटा हुवा नदका बांध । निर्जनमें कहीं ॥ ९७ ॥ जैसे अंधा गज मदसे मत्त । या जलता हुआ वन पर्वत । वैसे विषयोंमें होता उन्मत्त । चित्त उसका ॥ ९८ ॥ घूरेपर कब कौन क्या न डालते । ग्राम द्वार देहरी कौन न लांघते राहके सांडको कहो कौन बांधते । पांडुकुमार ॥ ९९ ॥ जैसे अन्न-छत्रमें सभी जाते । या सामान्य अधिकार जताते । या सारायीमें कोई घुसते । वैसे ही सदा ॥ ७०० ॥ रहता जिसका अंतःकरण । उसमें होता संचार संपूर्ण । अज्ञानमें वहां है निशिदिन । रहती बुद्धि ॥ १ ॥ १० अज्ञानका लक्षण भोगलिप्सा-- विषयोंकी जो है उसकी आस । जीने मरनेमें न होती नास । स्वर्गमें भी उसीके आशापाश । ले चलता वह ॥ २ ॥ करता भोगका अखंड जतन । काम्य-क्रियाका है जिसका व्यसन । विरक्तका कर मुखावलोकन । करता शबैल ॥ ३ ॥ विषय है उनसे उकताने । ये न उकताने सावध होते । सडे हुये हाथोंसे जैसे खाते । महारोगी ॥ ४ ॥ जैसे गर्दभी नहीं आने देती । लातोंसे खरका नाक तोडती । फिर भी गर्दभ है सआसक्ति । न लौटना पीछे ॥ ५ ॥ वैसे ही जो विषयोंमें रत । कूदते स्थानमें ज्वाला-ग्रस्त । व्यसनमें होकर वे लिप्त । मानते यह भूषण ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४८८